उर्दू ही वह ज़ुबान है जिसने अंग्रेजों को सबसे पहले बुलंद आवाज में ललकारा और मौलाना मोहम्मद बाक़ीर को पैदा किया :)
* मौलाना मोहम्मद बाक़ीर देश के पहले और शायद आखिरी पत्रकार थे, जिन्होंने 1857 में स्वाधीनता के पहले संग्राम में अपने प्राण की आहुति दी थी। मौलाना साहब अपने समय के बेहद निर्भीक पत्रकार रहे थे। वे उस दौर के लोकप्रिय 'उर्दू अखबार दिल्ली' के संपादक थे.
दिल्ली और आसपास अंग्रेजी साम्राज्यवाद के खिलाफ जनमत तैयार करने में इस अखबार की बड़ी भूमिका रही थी। मौलाना साहब अपने अखबार में अंग्रेजों की विस्तारवादी नीति के विरुद्ध और उनके खिलाफ लड़ रहे सेनानियों के पक्ष में लगातार लिखते रहे। अंग्रेजों ने उन्हें बड़ा ख़तरा मानकर गिरफ्तार किया और सज़ा-ए-मौत दे दी। उन्हें तोप के मुंह पर बांध कर उडा दिया गया जिससे उनके वृद्ध शरीर के परखचे उड़ गए।
इस वाक़िये पर अकबर इलाहाबादी ने एक तंज़िया शेर लिखा था :-
यही फ़रमाते रहे 'तेग़' से फैला इस्लाम,
ये ना इरशाद हुआ 'तोप' से क्या फैला है ??
* उर्दु ने ही बहादुर शाह ज़फ़र को अपनी गोद मे पाला जिन्होने हिन्दुस्तान की पहली जंगे आज़ादी मे हमारी क़ियादत की थी :)
दम-दमें में दम नही ख़ैर मांगो जान की,
अए ज़फ़र ठण्डी हुई शमशीर हिन्दुस्तान की.
ग़ज़ीयो में बु रहेगी जब तक इमान की,
तब तो लंदन तक चलेगी तेग़ हिन्दुस्तान की.
#BahadurShahZafar
* नेताजी सुभाषचंद्र बोस उर्दू के अच्छे जानकार थे। बांग्ला उनकी मादरी ज़ुबान थी। वहीं, वे हिंदी, अंग्रेजी के अलावा उर्दू भी बोलते थे। आजाद हिंद फौज का नाम उर्दू से मुतास्सिर है। उसके नारों में उर्दू के अनेक लफज़ों का उपयोग किया गया है। आजादी के आंदोलन में उर्दू का महान योगदान है।
#AzadHindFauj
* उर्दु ने ही मौलाना हसरत मोहानी को पैदा किया जिन्होने इंकलाब जिंदाबाद का नारा दिया। भगत सिंह और अनेक बलिदानी इंकलाब जिंदाबाद कहते हुए फांसी के फंदे पर झूल गए।
#HasratMohani
* उर्दु ने ही बिसमिल अज़ीमाबादी को पाला जिन्होने 'सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल मे है' जैसी इंक़लाबी ग़ज़ल लिख दिया। राम प्रासाद बिसमिल और अनेक बलिदानी इस ग़ज़ल को गाते हुए फांसी के फंदे पर झूल गए।
खेँच कर लाई है सब को क़त्ल होने की उमीद,
आशिक़ोँ का आज जमघट कूचा-ए-क़ातिल में है.
यूँ खड़ा मक़्तल में क़ातिल कह रहा है बार-बार,
क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है.?
#BismilAzimabadi
राम प्रसाद 'बिस्मिल' और अशफाक उल्ला खाँ भी बहुत अच्छे उर्दु शायर थे। इन दोनों की शायरी की अगर तुलना की जाये तो रत्ती भर का भी फर्क आपको नजर नहीं आयेगा।
"बहे बहरे-फना में जल्द या रब! लाश 'बिस्मिल' की।
कि भूखी मछलियाँ हैं जौहरे-शमशीर कातिल की।।"
#RamPrasadBismil
"जिगर मैंने छुपाया लाख अपना दर्दे-गम लेकिन।
बयाँ कर दी मेरी सूरत ने सारी कैफियत दिल की।।"
#AshFaqueUllahKhan
अगर उर्दू नापाक और बदमाशों की भाषा होती तो वे लोग कम से कम अपनी जिंदगी के आखिरी लमिहो में तो इसका उपयोग नहीं करते। इससे साबित होता है कि उस समय उर्दू का हिन्दुस्तानी अवाम पर जबर्दस्त प्रभाव था।
* इक़बाल का लिखा "तराना-ए-हिन्दी" तो याद होगा ही ??
सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्ताँ हमारा।
अगर याद नही है तो किसी भी ट्रेन पर चढ़ जाईये हर दरवाज़े के ऊपर " हिन्दी हैं हम, वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा।। सारे..." लिखा हुआ मिल जाएगा ;) इन्हे भी उर्दु ने ही पाला था.
"वतन की फिक्र कर नादां मुसीबत आने वाली है,
तेरी बर्बादियों के मशवरे हैं आसमानों में..
न समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिंदोस्तां वालो,
तुम्हारी दास्तां तक भी न होगी दास्तानों में"
या फिर
गुलामी में न काम आती हैं तदबीरें तकदीरें
जो हो जौक ए यकीं पैदा तो कट जाती हैं जंजीरें
गुर्बत में हो अगर हम रहता है दिल वतन में।
समझो वहीं हमें भी दिल है जहाँ हमारा
ऐ आब रूद-ए गंगा वो दिन है याद तुझको
उतरा तिरे किनारे जब कारवाँ हमारा ।
यूनान – ओ- मिस्र-ओ-रूमा सब मिट गये जहाँ से
अब तक मगर है बाकी नाम – ओ- निशां हमारा
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
सदिओं रहा हैं दुश्मन दौर-ए-जमां हमारा
#AllamaIqbal
* उर्दु ने ही पंडित बृज नारायण चकबस्त को पैदा किया जिसने अपनी इंक़लाबी गज़लो से अवाम मे एक नया जोश ड़ाल दिया :)
वतनपरस्त शहीदों की ख़ाक लाएँगे,
हम अपनी आँख का सुरमा उसे बनाएँगे..
#BrijNarayanChakbast
कभी था नाज़ ज़माने को अपने हिन्द पे भी
पर अब उरूज वो इल्मो कमालो फ़न में नहीं ।
रगों में ख़ून वही दिल वही जिगर है वही
वही ज़बाँ है मगर वो असर सख़ुन में नहीं ।
वही है बज़्म वही शम्-अ है वही फ़ानूस
फ़िदाय बज़्म वो परवाने अंजुमन में नहीं ।
वही हवा वही कोयल वही पपीहा है
वही चमन है पर वो बाग़बाँ चमन में नहीं ।
ग़ुरूरों जहल ने हिन्दोस्ताँ को लूट लिया
बजुज़ निफ़ाक़ के अब ख़ाक भी वतन में नहीं ।
* उर्दु ने ही साहिर लुधानवी को अपनी गोद मे पाला जिसने अपनी इंक़लाबी गज़लो से नेताओं को आईना दिखाया और आम अवाम को बताया कि "ये किसका लहु है कौन मरा" ...
ज़रा मुल्क के रहबरों को बुलाओ
ये कुचे, ये गलियाँ, ये मंजर दिखाओ
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर उनको लाओ
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं
#SahirLudhanvi
* कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद उर्दू में भी लिखते थे। उनके साहित्यिक जीवन की शुरुआत उर्दू से हुई।
* उर्दु ने ही रघुपति सहाय को फ़राक़ गोरखपुरी बना दिया
दयारे-गै़र में सोज़े-वतन की आँच न पूछ,
ख़जाँ में सुब्हे-बहारे-चमन की आँच न पूछ.
फ़ज़ा है दहकी हुई रक़्स में है शोला-ए-गुल,
जहाँ वो शोख़ है उस अंजुमन की आँच न पूछ.
#FiraqGorakhpuri
उर्दु ने ही कैफ़ी को कैफी आज़मी बनाया जिसने लिखा तो सबने पढ़ा :)
कर चले हम फ़िदा जानो-तन साथियो
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो
साँस थमती गई, नब्ज़ जमती गई
फिर भी बढ़ते क़दम को न रुकने दिया
कट गए सर हमारे तो कुछ ग़म नहीं
सर हिमालय का हमने न झुकने दिया
#KaifiAzmi
उर्दु ने ही दुष्यंत कुमार को एक अलग मोक़ाम दिया और उनकी उर्दु मे लिखी एक ग़ज़ल ने पुरे ख़ित्ते मे इंक़लाब बपा कर दिया :)
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।
#DushyantKumar
तो अब ठेठ मे सुनो कि उर्दु है क्या .?
उर्दु सरफ़रशोँ की ज़ुबान है ..
उर्दु इंक़लाब वालोँ की ज़ुबान है ..
उर्दु ख़ुद्दारोँ की ज़ुबान है ..
उर्दु शोहदाओँ की ज़ुबान है ..
उर्दु हिन्दुसतान की ज़ुबान है ..
पर अब भी ये मुसलमान की ज़ुबान नही है ..
घर क्या बंटा, बेटी अनजान बन गई।
मुल्क क्या बंटा, उर्दू मुसलमान हो गई।
जब जब ज़ुल्म की इंतेहा होगी उर्दु अपना जलवा दिखाएगा . इंक़लाब लाएगा . चाहे इमरजेँसी के दौर मे कलीम आज़िज़ ही क्योँ ना हो .!
दिन एक सितम, एक सितम रात करे हो,
वो दोस्त हो, दुश्मन को भी मात करो हो..
दामन पे कोई छींट, न खंजर पे कोई दाग,
तुम कत्ल करे हो, के करामात करो हो..
#KalimAjiz
उर्दु हिन्दुस्तान का आईना है जो आपको आपका असल चेहऱा दिखाएगा .. उर्दु पर नकेल कस आप ख़ुद को अंग्रेज़ो के फ़ेहरिस्त मे खड़ा कर रहे हैँ..
आखि़र मे अकबर अलाहबादी की लिखी हुई ये दो लाईन के साथ फ़िलहील के लिए मै अपनी बात को ख़त्म करता हुं :-
खींचो न कमानो को, न तलवार निकालो,
जब तोप हो मुकाबिल तो अखबार निकालो..
#AkbarAllahabadi
प्रेरणा स्रोत :- Rajeev Sharma Kolsiya जिनकी लिखी हुई एक मज़मुन ने मुझसे इत्ता लिखवा डाला :)
नोट- अब मुझे कोई हिन्दी विरोधी मत कह देना क्योंके मैने उर्दु के हक़ के लिए हिंदी कि मदद ली है :)
Me. Kumar Ashraf के बाल से
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