Sunday, 9 August 2020

बंगाली कवि क़ाज़ी नज़रुल इस्लाम की एक कविता



हिंदू और मुसलमान दोनों ही सहनीय है 
लेकिन उनकी चोटी और दाढ़ी असहनीय है 
क्योंकि यही दोनों विवाद कराती हैं 
चोटी में हिंदुत्व नहीं शायद पांडित्य है 
जैसे की दाढ़ी में मुसलमानत्व नहीं शायद मौलवित्य है
और इस पांडित्य और इस मौलवित्य के चिन्हो को बालों 
को लेकर दुनिआ बाल की खाल का खेल खेल रही है 
आज जो लड़ाई छिड़ती है 
वो हिन्दू और मुसलमान की लड़ाई नहीं 
वो तो पंडित और मौलवी की विपरीत विचारधारा का संघर्ष है 
रोशनी को लेकर कोई इंसान नहीं लड़ा 
इंसान तो सदा लड़ा गाय बकरे को लेकर 

(रूद्र मंगल रचनावली प्रथम भाग पृष्ठ ७०७ )

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