Saturday, 29 August 2020

मार्क्सवाद के तीन स्रोत तथा तीन संघटक अंग – वी.आई. लेनिन


पूरे सभ्य जगत में मार्क्स की शिक्षा अपने प्रति उन सभी बुर्जुआ विज्ञानों (सरकारी भी और उदारतावादी भी) की जबर्दस्त शत्रुता और घृणा उत्पन्न करती है, जो मार्क्सवाद को एक "हानिकारक पंथ" के अतिरिक्त और कुछ नहीं समझते। इसके अतिरिक्त और किसी रवैये की आशा भी नहीं की जा सकती, क्योंकि वर्ग संघर्ष पर आधारित समाज में "निष्पक्ष" सामाजिक विज्ञान हो ही नहीं सकता। समस्त सरकारी तथा उदारतावादी वि

पूरे सभ्य जगत में मार्क्स की शिक्षा अपने प्रति उन सभी बुर्जुआ विज्ञानों (सरकारी भी और उदारतावादी भी) की जबर्दस्त शत्रुता और घृणा उत्पन्न करती है, जो मार्क्सवाद को एक "हानिकारक पंथ" के अतिरिक्त और कुछ नहीं समझते। इसके अतिरिक्त और किसी रवैये की आशा भी नहीं की जा सकती, क्योंकि वर्ग संघर्ष पर आधारित समाज में "निष्पक्ष" सामाजिक विज्ञान हो ही नहीं सकता। समस्त सरकारी तथा उदारतावादी विज्ञान किसी न किसी ढंग से उजरती गुलामी की रक्षा करता है, जबकि मार्क्सवाद ने इस गुलामी के ख़िलाफ़ निर्मम युद्ध की घोषणा की है। उजरती ग़ुलामी वाले समाज में निष्पक्ष विज्ञान की आशा करना उतना ही मूर्खतापूर्ण भोलापन है, जितना मिल-मालिकों से इस प्रश्न पर निष्पक्षता की आशा करना कि क्यों न पूंजी के मुनाफ़े में कमी करके मज़दूरों की मजदूरी बढ़ा दी जाये।

परंतु बात इतनी ही नहीं है। दर्शनशास्त्र का इतिहास और सामाजिक विज्ञान का इतिहास पूर्ण स्पष्टता के साथ प्रकट करते हैं कि मार्क्सवाद के अंदर "पंथवादिता" जैसी कोई चीज़ नहीं है, इस अर्थ में कि वह कोई ऐसा रूढ़िबद्ध, जड़ मत हो, जो विश्व सभ्यता के विकास के प्रशस्त मार्ग से हटकर कहीं अलग से उत्पन्न हुआ हो। इसके विपरीत मार्क्स की प्रतिभा इसी बात में निहित है कि उन्होंने उन प्रश्नों के उत्तर उपलब्ध किये, जिन्हें मानवजाति के प्रमुखतम विचारक पहले ही उठा चुके थे। दर्शनशास्त्र, राजनीतिक अर्थशास्त्र तथा समाजवाद के महानतम प्रतिनिधियों की शिक्षाओं के प्रत्यक्ष तथा सीधे क्रम के रूप में ही उनकी शिक्षा का जन्म हुआ। मार्क्स की शिक्षा सर्वशक्तिमान है, क्योंकि वह सत्य है। वह व्यापक तथा सुसंगत है और मनुष्य को एक ऐसा अखंड विश्वदृष्टिकोण प्रदान करती है, जो किसी भी प्रकार के अंधविश्वास, प्रतिक्रियावादी प्रवृत्ति या बुर्जुआ उत्पीड़न की किसी भी वकालत की कट्टर विरोधी है। 19वीं शताब्दी में जर्मन दर्शनशास्त्र, आंग्ल राजनीतिक अर्थशास्त्र तथा फ्रांसीसी समाजवाद के रूप में मानवजाति ने जो भी सर्वश्रेष्ठ निर्मित किया है, मार्क्सवाद उनका ही क़ानूनी उत्तराधिकारी है।

मार्क्सवाद के इन्हीं तीन स्रोतों पर, जो साथ ही उसके संघटक अंग भी हैं, हम संक्षेप में विचार करेंगे।

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मार्क्सवाद का दर्शन भौतिकवाद है। यूरोप के पूरे आधुनिक इतिहास में और विशेष रूप से 18वीं शताब्दी के अंत में फ्ऱांस के अंदर, जहां हर प्रकार के मध्ययुगीन कचरे के विरुद्ध, संस्थाओं तथा विचारों में भूदासता के ख़िलाफ़ निर्णायक संघर्ष चलाया गया, भौतिकवाद एकमात्र ऐसा सुसंगत दर्शन सिद्ध हुआ है, जो प्राकृतिक विज्ञानों की समस्त शिक्षाओं की कसौटी पर खरा उतरा और अंधविश्वास, पाखंड, आदि का विरोधी निकला। इसलिए जनवाद के शत्रुओं ने भौतिकवाद का "खंडन करने", उसकी जड़ खोदने और उसे कलंकित करने की पूरी चेष्टा की और भाववादी दर्शन के विविध रूपों की वकालत की, जिसका अर्थ हमेशा किसी न किसी रूप में धर्म की वकालत या उसका समर्थन होता है।

मार्क्स तथा एंगेल्स ने अत्यंत दृढ़तापूर्वक भौतिकवादी दर्शन की हिमायत की और बार-बार इस बात को समझाया कि इस आधार से किसी भी प्रकार का विचलन कितनी भारी भूल है। उनके विचारों की अत्यंत सुस्पष्ट तथा पूर्ण व्याख्या एंगेल्स की 'लुडविग फ़ायरबाख' तथा 'ड्यूहरिंग मतखंडन' नामक रचनाओं में की गयी है, जो 'कम्युनिस्ट घोषणापत्र' की तरह ही हर वर्ग-चेतन मजदूर के लिए मार्क्सवाद के गुटके हैं।

परंतु मार्क्स 18वीं शताब्दी के भौतिकवाद पर आकर रुक नहीं गये, उन्होंने दर्शन को आगे बढ़ाया। उन्होंने उसे जर्मन क्लासिकीय दर्शन की, विशेषतः हेगेल की उस दर्शन-पद्धति की उपलब्धियों से समृद्ध किया, जिसका परिणाम फ़ायरबाख़ का भौतिकवाद था। इन उपलब्धियों में सबसे मुख्य द्वंद्ववाद है, अर्थात अपने पूर्णतम, गहनतम, एकांगीपन से मुक्त रूप में विकास की शिक्षा, मानव ज्ञान की सापेक्षता की शिक्षा, जिसमें हमें सतत विकासमान भूतद्रव्य का प्रतिबिंब मिलता है। बुर्जुआ दार्शनिकों की शिक्षाओं के बावजूद, जो "नये सिरे से" पुराने और सडे़ हुए भाववाद की ओर लौट रहे हैं, प्राकृतिक विज्ञान की नवीनतम खोजों – रेडियम, इलेक्ट्रोन, मूल तत्वों के रूपांतरण – से मार्क्स के द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की अद्भुत रूप से पुष्टि हुई है।

मार्क्स ने भौतिकवादी दर्शन को पूरी गहराई दी तथा पूर्णतः विकसित किया और उसके प्रकृति-संज्ञान को मानव समाज के संज्ञान पर लागू किया। मार्क्स का ऐतिहासिक भौतिकवाद वैज्ञानिक चिंतन की महान सिद्धि था। पहले इतिहास तथा राजनीति से संबंधित विचारों के क्षेत्र में जो गड़बड़ी और मनमानी फैली हुई थी, उसके स्थान पर आश्चर्यजनक रूप से पूर्ण तथा क्रमबद्ध वैज्ञानिक सिद्धांत की स्थापना हुई, जो बताता है कि किस प्रकार उत्पादक शक्तियों के विकास के फलस्वरूप सामाजिक जीवन की एक व्यवस्था में से एक दूसरी और उच्चतर व्यवस्था का विकास होता है – उदाहरण के लिए, भूदास व्यवस्था में से किस प्रकार पूंजीवादी व्यवस्था विकसित होती है।

जिस प्रकार मनुष्य का संज्ञान उससे स्वतंत्र अस्तित्व रखनेवाली प्रकृति, अर्थात विकासमान भूतद्रव्य को प्रतिबिंबित करता है, उसी प्रकार मनुष्य का सामाजिक संज्ञान (अर्थात उसके विविध विचार तथा मत-दार्शनिक, धार्मिक, राजनीतिक, आदि) समाज की आर्थिक व्यवस्था को प्रतिबिंबित करता है। राजनीतिक संस्थाएं आर्थिक नींव पर खड़ा ऊपरी ढांचा होती हैं। उदाहरण के लिए, हम देखते हैं कि आधुनिक यूरोपीय राज्यों के विभिन्न राजनीतिक रूप सर्वहारा वर्ग पर बुर्जुआ वर्ग के प्रभुत्व को दृढ़ बनाने के काम आते हैं।

मार्क्स का दर्शन भौतिकवादी दर्शन का पूरा निखरा हुआ रूप है, जिसने मानवजाति को, विशेष रूप से मज़दूर वर्ग को संज्ञान के शक्तिशाली साधन प्रदान किये हैं।

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इस बात को मान लेने के बाद कि आर्थिक व्यवस्था ही वह नींव होती है, जिस पर राजनीतिक ऊपरी ढांचा खड़ा होता है, मार्क्स ने सबसे अधिक ध्यान इसी आर्थिक व्यवस्था के अध्ययन में लगाया। मार्क्स की प्रमुख रचना 'पूंजी' आधुनिक, अर्थात पूंजीवादी समाज की आर्थिक व्यवस्था के ही अध्ययन को अर्पित है।

मार्क्स से पहले क्लासिकीय राजनीतिक अर्थशास्त्र की उत्पत्ति इंगलैंड में हुई थी, जो पूंजीवादी देशों में सबसे उन्नत देश था। ऐडम स्मिथ और डेविड रिकार्डो ने आर्थिक व्यवस्था के विषय में अपनी गवेषणाओं द्वारा मूल्य के श्रम-सिद्धांत की नींव डाली। मार्क्स ने उनके काम को और आगे बढ़ाया। उन्होंने इस सिद्धांत को प्रमाणित किया और उसे सुसंगत रूप से विकसित किया। उन्होंने सिद्ध कर दिया कि हर माल का मूल्य इस बात से निर्धारित होता है कि उसके उत्पादन में सामाजिक दृष्टि से कितना आवश्यक श्रम-काल लगाया गया है।

बुर्जुआ अर्थशास्त्रियों ने जहां वस्तुओं के पारस्परिक संबंध (एक माल के बदले में दूसरे माल के विनिमय) को देखा था, वहां मार्क्स ने मनुष्यों के पारस्परिक संबंध का रहस्योद्घाटन किया। मालों का विनिमय मंडी के माध्यम से अलग-अलग उत्पादकों के पारस्परिक संबंध को व्यक्त करता है। मुद्रा इस बात की द्योतक है कि यह संबंध निरंतर घनिष्ठतर होता जा रहा है और अलग-अलग उत्पादकों के समूचे आर्थिक जीवन को एक समष्टि में अभिन्न रूप से बांध रहा है। पूंजी इस संबंध के विकास की अगली मंजिल है: मनुष्य की श्रम-शक्ति एक माल बन जाती है। उजरती मज़दूर अपनी श्रम-शक्ति को भूमि, कारख़ाने तथा श्रम के साधनों के मालिक के हाथ बेच देता है। मज़दूर कार्य-दिवस का एक भाग स्वयं अपने और अपने परिवार के भरण-पोषण के ख़र्च की पूर्ति के लिए इस्तेमाल करता है (मज़दूरी), और दिन के शेष भाग में वह बिना पारिश्रमिक के श्रम करता है और इस प्रकार पूंजीपति के लिए बेशी मूल्य का सृजन करता है, जो पूंजीपति वर्ग के लिए मुनाफ़े का स्रोत, संपदा का स्रोत है।

बेशी मूल्य की शिक्षा मार्क्स के आर्थिक सिद्धांत की आधारशिला है।

मज़दूर के श्रम द्वारा उत्पन्न की गयी पूंजी मज़दूर को कुचलती है, छोटे-छोटे मालिकों को तबाह करके बेरोजगारों की पलटन खड़ी कर देती है। उद्योग के क्षेत्र में बडे़ पैमाने के उत्पादन की विजय तुरंत स्पष्ट हो जाती है, परंतु कृषि में भी हम यही क्रिया देखते हैं: बडे़ पैमाने की पूंजीवादी कृषि की श्रेष्ठता बढ़ती जाती है, मशीनों का उपयोग बढ़ता जाता है, किसानी अर्थव्यवस्था के गले में मुद्रा-पूंजी का फंदा पड़ जाता है और अपनी पिछड़ी हुई प्रविधि के बोझ के नीचे उसका ह्रास होने लगता है, वह तबाह हो जाती है। कृषि में छोटे पैमाने के उत्पादन का ह्रास भिन्न रूप धारण करता है, परंतु ख़ुद ह्रास एक निर्विवाद तथ्य है।

छोटे पैमाने के उत्पादन को तबाह करके पूंजी श्रम की उत्पादिता में वृद्धि करती है और बड़े से बडे़ पूंजीपतियों के संघों के लिए इजारेदारी की स्थिति उत्पन्न करती है। उत्पादन स्वयं अधिकाधिक सामाजिक रूप धारण करता जाता है – लाखों-करोड़ों मज़दूर एक योजनाबद्ध आर्थिक संगठन में एक-दूसरे से बंध जाते हैं, परंतु इस सामूहिक श्रम द्वारा उत्पादित वस्तुओं को मुट्ठी भर पूंजीपति हड़प लेते हैं। उत्पादन की अराजकता, संकट, मंडियों की बेतहाशा तलाश और जनसाधारण की जीवन-वृत्ति में अनिश्चितता बढ़ती जाती है।

पूंजी पर मज़दूरों की निर्भरता को बढ़ाने के साथ ही पूंजीवादी व्यवस्था समूहबद्ध श्रम की महान शक्ति को जन्म देती है।

माल-उत्पादन पर आधारित अर्थव्यवस्था के प्रथम अंकुरों से लेकर, साधारण विनिमय से लेकर मार्क्स ने पूंजीवाद के विकासक्रम का उसके उच्चतम रूप, अर्थात बड़े पैमाने के उत्पादन तक पता लगाया।

और पुराने तथा नये, सभी पूंजीवादी देशों का अनुभव वर्ष प्रति वर्ष अधिकाधिक मज़दूरों के सामने मार्क्स की इस शिक्षा के सत्य को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करता जा रहा है।

पूंजीवाद ने सारे संसार में विजय प्राप्त कर ली है, परंतु यह विजय पूंजी पर श्रम की विजय की भूमिका मात्र है।

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जब भूदास-प्रणाली का तख़्ता उलट दिया गया और इस पृथ्वी पर "स्वतंत्र" पूंजीवादी समाज का उदय हुआ, तब यह बात तुरंत स्पष्ट हो गयी कि इस स्वतंत्रता का अर्थ श्रमिकों के उत्पीड़न तथा शोषण की एक नयी व्यवस्था है। इस उत्पीड़न के प्रतिबिंब के रूप में और इसके विरोध में फ़ौरन विविध प्रकार के समाजवादी मत जन्म लेने लगे। परंतु प्रारंभिक समाजवाद काल्पनिक समाजवाद था। वह पूंजीवादी समाज की आलोचना करता था, उसकी निंदा करता था, और उसे कोसता था, वह उसके विनाश के स्वप्न देखता था, एक बेहतर व्यवस्था की सुखद कल्पना करता था और धनवान लोगों को शोषण की अनैतिकता का क़ायल करने का प्रयास करता था।

परंतु काल्पनिक समाजवाद वास्तविक समाधान का निर्देश नहीं कर सका। वह न तो पूंजीवाद के अंतर्गत उजरती गुलामी के असली स्वरूप की व्याख्या कर सका, न उसके विकास के नियमों का पता लगा सका और न ही उस सामाजिक शक्ति की ओर संकेत कर सका, जो एक नये समाज की रचना करने की क्षमता रखती है।

इसी दौरान सामंतवाद और भूदास-प्रणाली के पतन के साथ यूरोप भर में और विशेष रूप से फ्रांस में जो तूफ़ानी क्रांतियां हुईं, उनसे यह बात अधिकाधिक स्पष्ट होती गयी कि समस्त विकास का आधार और उसकी प्रेरक शक्ति वर्गों का संघर्ष है।

सामंती वर्ग पर राजनीतिक स्वतंत्रता की एक भी विजय ऐसी नहीं थी, जो घोर प्रतिरोध का सामना किये बिना प्राप्त की गयी हो। एक भी पूंजीवादी देश ऐसा नहीं है, जो पूंजीवादी समाज के विभिन्न वर्गों के बीच जिंदगी और मौत की लड़ाई के बिना न्यूनाधिक रूप में स्वतंत्र तथा जनवादी आधार पर विकसित हुआ हो।

मार्क्स की प्रतिभा इस बात में निहित है कि वह पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने इससे वह निष्कर्ष निकाला, जो विश्व इतिहास हमें सिखाता है, और सुसंगत रूप से इस निष्कर्ष को लागू किया। यह निष्कर्ष वर्ग संघर्ष की शिक्षा है।

लोग राजनीति में सदा छल और आत्म-प्रवंचना के नादान शिकार हुए हैं और तब तक होते रहेंगे, जब तक वे तमाम नैतिक, धार्मिक, राजनीतिक और सामाजिक कथनों, घोषणाओं और वायदों के पीछे किसी न किसी वर्ग के हितों का पता लगाना नहीं सीखेंगे। सुधारों और बेहतरी के समर्थक जब तक यह नहीं समझ लेंगे कि हर पुरानी संस्था, वह कितनी ही बर्बरतापूर्ण और सड़ी हुई क्यों न प्रतीत होती हो, किन्हीं शासक वर्गों के बल-बूते पर ही क़ायम रहती है, तब तक पुरानी व्यवस्था के संरक्षक उन्हें बेवकूफ बनाते रहेंगे। और इन वर्गों के प्रतिरोध को चकनाचूर करने का केवल एक तरीका है और वह यह कि जिस समाज में हम रह रहे हैं, उसी में उन शक्तियों का पता लगायें और उन्हें संघर्ष के लिए जागृत तथा संगठित करें, जो पुरातन को विनष्ट कर नूतन का सृजन करने में समर्थ हो सकती हैं और जिन्हें अपनी सामाजिक स्थिति के कारण समर्थ होना चाहिए

केवल मार्क्स के भौतिकवादी दर्शन ने ही सर्वहारा वर्ग को उस आत्मिक दासता से मुक्ति पाने का मार्ग दिखाया है, जिसमें सभी उत्पीड़ित वर्ग अब तक सिसकते हुए अपने दिन काट रहे थे। केवल मार्क्स के आर्थिक सिद्धांत ने ही पूंजीवाद की सामान्य व्यवस्था में सर्वहारा वर्ग की वास्तविक स्थिति की व्याख्या की है।

अमरीका से लेकर जापान तक और स्वीडन से लेकर दक्षिणी अफ्रीका तक सारे संसार में सर्वहारा वर्ग के स्वतंत्र संगठनों की संख्या बढ़ती जा रही है। अपना वर्ग संघर्ष चलाकर सर्वहारा वर्ग जागृत और शिक्षित हो रहा है, बुर्जुआ समाज के पूर्वाग्रहों से मुक्त होता जा रहा है, अपनी पांतों को और भी घनिष्ठ रूप से एकजुट कर रहा है और अपनी सफलताओं को आंकना सीखता जा रहा है; वह अपनी शक्तियों को फ़ौलादी बना रहा है और अदम्य रूप से विकसित हो रहा है।

3 मार्च, 1913 को प्रकाशित।

खंड 23, पृ., 40-48

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