महान अक्टूबर क्रांति मानव जाति के इतिहास का एक मील का पत्थर है। यह क्रांति रूसी मजदूर वर्ग की एक ऐसी कार्यवाही थी जिसने पिछले कुछ हजार सालों से चले आ रहे मानव द्वारा मानव के शोषण की व्यवस्था को इतिहास में पहली बार उलट दिया। इस क्रांति से पहले पूरी दुनिया में शोषक वर्ग इंसानों के बीच की समानता को अधिक से अधिक उनके बीच की कानूनी समानता तक सीमित कर देते थे। इसके बरक्स वास्तविक तौर पर जो भीषण गैर बराबरी इंसानी समाज में पाई जाती थी, उसे जायज ठहराने के लिए एक सामान्य सा तर्क कि पांचों उंगलियां एक समान नहीं हो सकतीं, यही काफी भारी पड़ता था। लेकिन रूसी क्रांति ने गैर बराबरी को समाप्त करने के लिए जो रास्ता दिखाया, उसके बाद से शोषक वर्गों को गैर-बराबरी को जायज ठहराने के लिए काफी दिमागी कसरतें करनी पड़ी हैं। हर तरह के शोषण, अन्याय-अत्याचार और गैर-बराबरी का खात्मा चाहने वालों के लिए रूसी क्रांति की सौंवीं वर्षगांठ पर इस क्रांति को याद करना अपने उद्देश्यों को हासिल करने में मदद पहुंचायेगा।
क्रांति से पहले का रूस पश्चिमी यूरोप के अन्य देशों की तुलना में काफी पिछड़ा हुआ था। जनतंत्रवादी ताकतों के दबाव में 1860 में भूदास प्रथा का खात्मा कर दिया गया। लेकिन इस कानूनी कदम को निष्प्रभावी बनाने के लिए सामंतों-जमींदारों ने अन्य तौर तरीके निकाल लिए। 1905 की क्रांति तक खेती-किसानी पर सामंती जकड़न काफी ज्यादा हावी थी और खेती में पूंजीवादी विकास काफी धीमी रफ्तार से हो रहा था। परिणामस्वरूप, खेती काफी पिछड़ी थी और किसानों की स्थिति काफी दयनीय थी। किसानों को जमींदारों की जमीनों पर श्रम करने के साथ-साथ नजराने पेश करने होते थे। और अन्य खिदमतें करनी पड़ती थीं। जारकालीन रूस में किसानों को शारीरिक दंड का भी भागी बनना पड़ता था।
जार के शासन काल में जार के अधीन गैर रूसी राष्ट्रीयताओं को उत्पीड़न का सामना करना पड़ता था। गैर रूसी राष्ट्रीयताओं को रूसी भाषा में ही शिक्षा लेने को बाध्य किया जाता था। गैर रूसी राष्ट्रीयताओं को रूस की श्रेष्ठता स्वीकार करनी पड़ती थी और जार के अधिकारियों द्वारा तरह-तरह से अपमानित होना पड़ता था। ऐसे ही महिलाओं के ऊपर पितृसत्तात्मक जकड़न बनी हुयी थी। जारकालीन रूस में महिलाएं कानूनी तौर पर विवाह से पहले पिता के अधीन तो विवाह के बाद पति के अधीन मानी जाती थीं।
रूस में विदेशी पूंजी के दम पर उद्योग धंधों का विकास हुआ। खास तौर पर उन्नीसवीं सदी के अंतिम पच्चीस सालों में औद्योगिक उत्पादन तेजी से बढ़ा। कई औद्योगिक शहर अस्तित्व में आए जिनमें से पेत्रोग्राद और मास्को सबसे बड़े थे। रूस के उद्योगों की एक विशेषता यह थी कि यहां काफी सारे बड़े कारखाने थे जिसमें एक ही छत के नीचे हजारों मजदूर काम करते थे। मजदूरों के काम के घंटे अनिश्चित होते थे और मजदूरी काफी कम। मजदूरों के पास न तो यूनियन बनाने का अधिकार था और न ही हड़ताल करने का। काम करते हुए चोट लग जाने पर अपाहिज बन जाने या मृत्यु हो जाने पर भी मुआवजे का अधिकार नहीं था। इसके ऊपर कारखाने मालिक तरह-तरह के जुर्माने के नाम पर मजदूरों की मजदूरी काट लिया करते थे।
पूरी उन्नीसवीं सदी में जार के मध्ययुगीन शासन के खिलाफ क्रांतिकारी संघर्ष होता रहा। ये संघर्ष यद्यपि जार के शासन को तो कमजोर नहीं कर पाये, लेकिन इन संघर्षों के परिणामस्वरूप रूसी समाज में शासन के सामंती तौर तरीकों के खिलाफ वैचारिक माहौल तैयार हो रहा था। रूस का पूंजीपति वर्ग अपनी कमजोरियों की वजह से जनवाद के पक्ष में बन रहे माहौल का इस्तेमाल कर सौदेबाजियोें तक सीमित रहता था। क्रांतिकारी संघर्ष रूसी पूंजीपति वर्ग के वश में नहीं था, उल्टा वह क्रांतिकारी संघर्षों से घबराता था।
बीसवीं सदी के शुरूआती कुछ वर्षों में ही रूस के मजदूर वर्ग की क्रांतिकारी संभावनाशीलता दिखाई पड़ने लगी। रूस के मजदूरों का आर्थिक हड़तालों से आगे बढ़ कर राजनीतिक हड़तालें करना और इन हड़तालों के दौरान 'जारशाही मुर्दाबाद!' के नारे लगना इस सच्चाई का बयान था कि रूस में क्रांति की मंजिल जनवादी क्रांति की होने के बावजूद क्रांति का नेता पूंजीपति वर्ग नहीं बल्कि मजदूर वर्ग था।
जारशाही ने मजदूर वर्ग की बढ़ रही सरगर्मियों का जवाब जेल-निर्वासन की संख्या बढ़ाकर और राजनीतिक पुलिस-ब्लैक हंड्रेड्स की गतिविधियां बढ़ाकर दिया। 1904 में जापान के साथ युद्ध में रूस की हार ने जारशाही के लिए मुश्किलें बढ़ा दीं। 3 जनवरी, 1905 को पेत्रोग्राद के सबसे बड़े कारखाने पुतिलोव में हड़ताल हुई। यह हड़ताल चार मजदूरों को नौकरी से निकाले जाने की वजह से हुयी थी। यह हड़ताल तेजी से फैली और इसने पेत्रोग्राद के कई अन्य कारखानों को अपनी जद में ले लिया। जारशाही हुकूमत को लगा कि इस आग को दावानल बनने से पहले बुझा देना चाहिए। जारशाही ने राजनीतिक पुलिस के एक आदमी पादरी गेपन की मदद से इस आंदोलन को कुचल देने की योजना बनाई। जारशाही का यह दांव उलटा पड़ गया।
पादरी गेपन ने हड़ताली मजदूरों को इस बात के लिए तैयार कर लिया कि वे 9 जनवरी को चर्च के बैनर और राजा की तस्वीरों के साथ राजा के महल तक जायेंगे और राजा को अर्जी देंगे। पादरी गेपन को इस जुलूस के दौरान पुलिस को गोली चलाने का बहाना मुहैय्या कराना था ताकि मजदूर आंदोलन को खून में डुबोया जा सके। अब तक रूस में मजदूर वर्ग की अपनी क्रांतिकारी पार्टी बोल्शेविक पार्टी अस्तित्व में आ चुकी थी। बोल्शेविक मजदूरों के प्रभाव की वजह से पादरी गेपन की अर्जी में संशोधन किया गया और अर्जी में प्रेस की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आजादी, मजदूरों के संगठित होने के अधिकार, रूस की राजनीतिक व्यवस्था को बदलने के लिए संविधान सभा को आहूत करने, कानून के समक्ष सबकी बराबरी, युद्ध की समाप्ति, आठ घंटे का कार्य दिवस और किसानों को जमीन दिये जाने की मांगें जोड़ी गयीं।
9 जनवरी की सुबह एक लाख चालीस हजार लोग सड़कों पर उतरे। इनमें महिलाएं, बच्चे, बूढे सभी थे। इन निहत्थे लोगों पर जार की पुलिस ने गोली चलाई जिसमें एक हजार लोग मारे गये तथा 2000 लोग घायल हुए। पेत्रोग्राद की सड़कें मजदूरों के खून से लाल हो गयीं। 9 जनवरी को इतिहास में 'काले रविवार' के नाम से जाना जाता है। 9 जनवरी की घटना ने पूरे रूस के भीतर जारशाही के खिलाफ असंतोष को तीखा कर दिया। मजदूरों की हड़तालें सभी शहरों में बढ़ने लगीं। जारशाही का दमन और भूख भी मजदूरों की हिम्मत तोड़ने में असफल रहे। अक्टूबर तक आते-आते मजदूरों की सफल देशव्यापी राजनीतिक हड़ताल आयोजित हुयी। किसानों की जमींदारों के खिलाफ कार्यवाहियां बढ़ गयीं। वे जमींदारों के अनाज के गोदाम लूट लेते, उनकी हवेलियों को आग के हवाले कर देते, लकड़ियां काट लेते। ढ़ेर सारे जमींदार डर के मारे गांव छोड़ कर शहर भाग गये। जारशाही सुरक्षा बलों ने किसानों का भी बेतहाशा दमन किया। वे किसानों की हिम्मत तोड़ नहीं पाए लेकिन अभी किसानों की कार्यवाही किसी एकीकृत योजना का हिस्सा नहीं थी। फौज में भी असंतोष काफी तीखा था। पोतेमकिन जहाज के सिपाहियों ने बगावत कर दी। और ओदेसा के हड़ताली मजदूरों के साथ एकता कायम की। कई अन्य स्थानों पर भी फौजियों की अफसरों के दुव्र्यवहार और घटिया खाने की वजह से टकराहटें हुयीं। इन परिस्थितियों में मजदूरों के बीच स्वयंस्फूर्त रूप से सोवियत जैसी संस्था का जन्म हुआ। सोवियत मजदूरों की क्रांतिकारी पहलकदमी का नतीजा था। जिसका 1905 की क्रांति में अवसरवादियों की वजह से ठीक से इस्तेमाल नहीं हो पाया, लेकिन जिसने आगे की रूसी क्रांति में बहुत ही निर्णायक भूमिका निभानी थी। दिसम्बर माह में मजदूर राजनीतिक हड़तालों से आगे बढ़कर खंदकें खोदकर जारशाही के दमन का मुकाबला हथियारबंद होकर करने लगे। लेकिन अब तक क्रांति के अपने चरम पर पहुंचकर नीचे जाने की शुरूआत हुयी। प्रतिक्रांति हावी हुयी और 1905 की क्रांति असफल हो गयी। लेकिन यह 1917 की क्रांतियों के लिए रूसी अवाम को तैयार करने मे सफल साबित हुयी।
1905 की क्रांति के दौरान रूसी क्रांतिकारियों बोल्शेविकों का अवसरवादी मेंशेविकों से विभाजन और स्पष्ट हुआ। बोल्शेविक मजदूरों की स्वतंत्र क्रांतिकारी पहलकदमी के हिमायती थे और किसानों को क्रांति का मित्र मानते थे। वे क्रांति का उद्देश्य जारशाही का पूर्ण खात्मा मानते थे। मेंशेविक मजदूर वर्ग को उदारवादी पूंजीपति वर्ग का पिछलग्गू बना देने की नीति पर चलते थे, क्रांति में किसानों की कोई खास भूमिका नहीं देखते थे तथा जारशाही से किसी समझौते को भी क्रांति के उद्देश्यों में शामिल करते थे। आगे के रूसी क्रांति के इतिहास ने दिखाया कि बोल्शेविकों की कार्यनीति सही थी और मेंशेविकों की गलत।
1905 की क्रांति की पराजय के बाद स्तोलिपिन प्रतिक्रियावाद का दौर आया। जेल-निर्वासन की संख्या तो बढ़ ही गयी, लड़ाकू मजदूरों को राजनीतिक पुलिस की वजह से कहीं काम भी नहीं मिलता था। मजदूर आंदोलन अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। इन भीषण परिस्थितियों में जहां मेंशेविक बदहवास हो गये और क्रांतिकारी कार्यक्रम को तिलांजलि देने लगे वहीं लेनिन के नेतृत्व में बोल्शेविकों ने अपनी कतारों को बचाने के लिए लड़ाई के तौर तरीकों में बदलाव किए और गैर कानूनी कामों को कानूनी कामों से मिलाया लेकिन क्रांतिकारी कार्यक्रम पर किसी भी समझौते के बगैर। बोल्शेविकों को भरोसा था कि क्रांतिकारी आंदोलन कुछ समय के लिए भले ही कमजोर पड़ जाए लेकिन उसे पुनः मजबूत होना ही था।
4 जनवरी, 1912 को लेना के सोने के खदान के मजदूरों पर हुई गोलीबारी ने रूस के मजदूर आंदोलन की गति पुनः तेज कर दी। लेना की सोने के खदान के अंग्रेज मालिक और उनके रूसी हिस्सेदार मजदूरों की अत्यन्त निम्न मजदूरी के बरक्स काफी ऊंचा मुनाफा कमाते थे। मजदूरों की मजदूरी वृद्धि की मांग को लेकर हुई हड़ताल को तोड़ने के मकसद से जारशाही ने गोली चलाई जिसमें 500 मजदूर या तो मारे गये या घायल हुए। इस घटना ने पुनः देश में राजनीतिक हड़तालों का क्रम शुरू कर दिया। इन घटनाक्रमों के दौरान आगे बढ़े हुए मजदूरों के लिए निकाले जाने वाले मजदूरों के साप्ताहिक अखबार ज्वेज्दा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेनिन और स्तालिन के लेना गोलीकांड से सम्बन्धित लेख इस अखबार में छपे। लेना गोलीकांड के बाद न केवल मजदूरों में बल्कि किसानों और सैनिकों के बीच भी सरगर्मियां तेज हुईं। जनता के बीच पैदा होने वाले नए उभार के मद्देनजर बोल्शेविकों ने प्रावदा के नाम से आम मजदूरों को संबोधित दैनिक समाचार पत्र निकालना शुरू किया। ढ़ाई साल की अवधि में जारशाही ने प्रावदा को आठ बार प्रतिबंधित किया लेकिन आगे बढ़े हुए मजदूरों के समर्थन की वजह से यह नाम में मामूली बदलाव के साथ फिर से शुरू हो गया।
जुलाई 1914 में रूस विश्व युद्ध में शामिल हो गया। यह युद्ध साम्राज्यवादियों के बीच दुनिया के पुनर्बंटवारे को लेकर हो रहा था। रूस अन्य देशों की तुलना में ज्यादा बुरी हालत में था। इसके कारखाने पुराने जमाने के थे जिनके कल पुर्जे घिस चुके थे। खेती पिछड़ी थी जो कि किसी लंबे युद्ध की जरूरतों को पूरा करने के लिए अपर्याप्त थी। लेकिन रूस के शासक वर्ग एक तो नये बाजारों की उम्मीद में और दूसरे रूस के क्रांतिकारी आंदोलन को कुचलने के मकसद से युद्ध को स्वीकारते थे।
बोल्शेविकों ने शुरू से ही इस युद्ध के प्रतिक्रियावादी चरित्र के अनुरूप इसका विरोध किया और युद्ध की परिस्थिति का क्रांति के लिए लाभ उठाने की कार्यनीति का पालन किया। ढाई साल बीतते बीतते युद्ध के खिलाफ जनता का असंतोष काफी तीखा हो गया। मोेर्चे की विफलता और युद्ध में होने वाली रूसी सैनिकों की मौतें आग में घी डालने का काम कर रही थीं। उद्योग-धंधे ठप्प होते जा रहे थे। बेरोजगारी की दर काफी ऊंची हो गयी। शहरों में भोजन की आपूर्ति भी प्रभावित होने लगी। 1917 के जनवरी माह से पेत्रोग्राद में मजदूरों के प्रदर्शनों में तीव्रता आने लगी। 8 मार्च, अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के दिन(पुराने रूसी कैलेंडर के अनुसार 23 फरवरी) भूख, युद्ध और जारशाही के खिलाफ पेत्रोग्राद की मजदूर महिलाओं ने प्रदर्शन किया। पेत्रोग्राद के शेष मजदूरों ने महिला मजदूरों की इस कार्यवाही के समर्थन में हड़तालें कीं। 9 मार्च को प्रदर्शन और तेज हो गया। और लगभग 2 लाख मजदूर हड़ताल पर रहे। 10 मार्च को पेत्रोग्राद का पूरा मजदूर वर्ग क्रांतिकारी आंदोलन की बाढ़ में था। 11 मार्च को हड़ताल और प्रदर्शन विद्रोह में तब्दील होने लगा। मजदूरों ने पुलिस को निशस्त्र करना और स्वयं को हथियारबंद करना शुरू कर दिया। इसी दिन पावलोवस्की रेजीमेंट के रिजर्व बटालियन की चैथी कम्पनी ने गोली चलाई, पर मजदूरों पर नहीं। यह गोली मजदूरों से उलझ रहे बख्तरबंद पुलिस दस्तों पर चली। फौज को क्रांति के पक्ष में करने के लिए एक जोशीला और अथक अभियान चला, खासतौर पर मजदूर महिलाओं के द्वारा। मजदूरों ने सैनिकों के साथ अपने बिरादराना सम्बन्धों का हवाला दिया और घिनौनी जारशाही को उखाड़ फेंकने का आहवान किया। 12 मार्च से पेत्रोग्राद में तैनात सैनिकों का ज्यादा से ज्यादा हिस्सा क्रांति के समर्थन में आने लगा। सैनिकों के क्रांति के पक्ष में आ जाने से पेत्रोग्राद में क्रांति विरोधियों पर भारी पड़ने लगी और यह समाचार देश में जहां भी पहुंचा वहां मजदूरों और सैनिकों ने मिलकर जारशाही के अधिकारियों को पदच्युत करना शुरू कर दिया। जारशाही के ध्वस्त होने के साथ ही मजदूरों और सैनिकों ने मिलकर सोवियतों का गठन किया। ये सोवियतें बगावत का यंत्र होने के साथ-साथ नयी क्रांतिकारी सत्ता का भू्रण भी थीं।
12 मार्च को चौैथी दूमा के उदारपंथी सदस्यों ने मेंशेविकों और समाजवादी क्रांतिकारियों के साथ गुपचुप समझौता कर अस्थायी सरकार का गठन किया। यह एक पूंजीवादी सरकार थी। इस सरकार ने युद्ध को जारी रखा और युद्ध के नाम पर अन्य क्रांतिकारी मांगों को भी टालने का काम किया। यद्यपि क्रांति द्वारा पैदा हुयी सोवियतें काफी ताकत रखती थीं और इसके आदेशों को मानने के लिए पूंजीपति वर्ग भी बाध्य होता था, लेकिन नेतृत्व पर अवसरवादी नेताओं के काबिज होने की वजह से सोवियतें शासन चलाने के काम को अपने हाथ में नहीं ले रही थीं। दोहरी सत्ता की यह स्थिति ज्यादा देर तक नहीं रह सकती थी। पूंजीवादी अस्थायी सरकार सारा शासन अपने हाथ में समेटने की कोशिश कर रही थी और मेंशेविकों और समाजवादी क्रांतिकारियों का सहयोग उसको हासिल था। ऐसे में लेनिन के नेतृत्व मे बोल्शेविकों ने अस्थायी सरकार, मेंशेविकों और समाजवादी क्रांतिकारियों का वास्तविक चरित्र जनता के सामने उजागर किया और बताया कि न तो शांति और न ही किसानों को जमीन तब तक हासिल हो सकती है जब तब कि सारी सत्ता सोवियतों के हाथ में न आ जाए। अप्रैल माह में लेनिन ने अपनी मशहूर अप्रैल थीसिस दी जिसने मजदूर वर्ग और बोल्शेविकों की क्रांतिकारी पहलकदमी को खोला। इस थीसिस में बताया गया कि अब क्रांति की मंजिल बुर्जुआ जनवादी क्रांति से समाजवादी क्रांति में संक्रमित हो गयी है।
सारे अवसरवादी जनता से व्यवस्था और अनुशासन कायम करने की मांग कर रहे थे। लेकिन पेत्रोग्राद के मजदूरों के प्रदर्शन अस्थायी सरकार को चैन की सांस नहीं लेने दे रहे थे। जनता के दबाव की वजह से अस्थायी सरकार को अपने मंत्रिमण्डल में कई फेरबदल करने पड़े। इसके बावजूद जनता बोल्शेविकों द्वारा दिखाए रास्ते पर चल रही थी और प्रदर्शनों की व्यापकता बढ़ती जाती थी। अस्थायी सरकार द्वारा मोर्चे पर सैनिकों को नए हमलों के लिए भेजने और इन हमलों की विफलता से राजधानी में गुस्से का नया ज्वार पैदा शुरू हुआ। इसके परिणामस्वरूप पेत्रोग्राद के बिवोर्ग जिले में स्वयंस्फूर्त प्रदर्शन हुए। अस्थायी सरकार ने प्रतिक्रियावादी सैन्य दलों को बुलाकर इस प्रदर्शन का दमन किया। पेत्रोग्राद की सड़कें मजदूरों और सैनिकों के खून से लाल हो गयीं। इस प्रदर्शन के बाद बोल्शेविकों का दमन शुरू हुआ। बोल्शेविक अखबारों को बंद करा दिया गया। रेड गाडर््स को निहत्था करना शुरू कर दिया गया। पेत्रोग्राद गैरीसन से क्रांतिकारी टुकड़ियों को हटाया जाने लगा और उनको मोर्चे पर भेजा जाने लगा। इस तरह दुहरी सत्ता का अंत हो गया। अस्थायी सरकार ने सारी सत्ता अपने हाथ में केन्द्रित कर ली।
सारी सत्ता हासिल करने के मद में चूर पूंजीपति वर्ग ने क्रांति पर हमले काफी तेज कर दिये। मोर्चे पर कोर्ट मार्शल की तादाद बढ़ गयी। सोवियतों के खिलाफ पूंजीपति वर्ग खुलकर अपनी नफरत व्यक्त कर रहा था। ये सारी चीजें मजदूरों के भीतर क्रोध और संघर्ष के जज्बे को संचित करती जा रही थीं। यह प्रक्रिया अपने चरम पर तब पहुंची जब जनरल कार्निलोव ने क्रांति को कुचलने की घोषणा की और इसी मकसद से पेत्रोग्राद की तरफ सैन्य टुकड़ियां भेजीं। जनरल कार्निलोव के इस प्रयास को विफल करने के लिए मजदूरों ने तेजी से अपने को हथियार बंद करना शुरू किया। रेड गार्डस दस्ते इस दौरान तेजी से बड़े हो गये। पेत्रोग्राद की क्रांतिकारी सैन्य टुकड़ियां भी अपनी तैयारी कर रही थीं। क्रोन्सतादत से हजारों नौ सैनिक शहर की रक्षा के लिए आए। कार्निलोव की टुकड़ियों को अपने पक्ष में करने के लिए उद्वेलक भेजे गये। इन उद्वेलकों ने कार्निलोव के सैनिकों को कार्निलोव की कार्यवाही का मकसद समझाया। इन सारे प्रयासों का नतीजा यह हुआ कि कार्निलोव विद्रोह कुचल दिया गया। कार्निलोव को उसके सहयोगी षड्यंत्रकारियों के साथ गिरफ्तार कर लिया गया।
कार्निलोव विद्रोह की पराजय के बाद मजदूरों, किसानों और सैनिकों का बोल्शेविकों पर और क्रांति पर भरोसा बढ़ गया। ज्यादा से ज्यादा सोवियतों ने बोल्शेविक नीति स्वीकार करना और बोल्शेविक प्रतिनिधि चुनना शुरू कर दिये। किसानों ने जागीरों पर कब्जा करने की कार्यवाही तेज कर दी। ऐसे में बोल्शेविकों ने तय किया कि सारी सत्ता सोवियतों के हाथ में आने की परिस्थिति परिपक्व हो गयी है। और बगावत की तैयारी शुरू कर दी। विद्रोह की गतिविधियों को नेतृत्व प्रदान करने के लिए कामरेड स्टालिन के नेतृत्व में एक पार्टी केन्द्र नियुक्त किया गया।
7 नवम्बर को रेड गार्ड्स और क्रांतिकारी टुकड़ियों ने रेलवे स्टेशन, डाकघर, तारघर, मंत्रालयों और राजकीय बैंक को अपने कब्जे में ले लिया। क्रांतिकारी टुकड़ियों की कार्यवाहियां काफी अचूक साबित हो रही थीं। इसी दिन रात को क्रांतिकारी मजदूरों और सैनिकों ने शिशिर प्रासाद पर धावा बोला और वहां शरण लिए अस्थायी सरकार के मंत्रियों को गिरफ्तार कर लिया।
7 नवम्बर की राज 10 बजकर 45 मिनट पर पेत्रोग्राद के स्मोलनी भवन में सोवियतों की दुसरी अखिल रूसी कांग्रेस प्रारम्भ हुयी। बोल्शेविकों को इस कांग्रेस में बहुमत हासिल था। इस कांग्रेस ने घोषणा की कि वह रूस की सारी सत्ता अपनी हाथ में लेती है। शांति और भूमि का सवाल जिसको अस्थायी सरकार ने इतने महीनों तक लटकाए रखा, उनको सोवियत सत्ता ने अपनी स्थापना के दूसरे ही दिन दो आज्ञप्तियों के माध्यम से संबोधित किया। बाद में ब्रेस्ट लिटोवस्क संधि की अपमानजनक शर्तों को भी स्वीकार कर जर्मनी के साथ शांति कायम की गयी। भूमि आज्ञप्ति के द्वारा भूमि पर सामंती मालिकाना समाप्त कर दिया गया। भूमि पर निजी मालिकाना समाप्त कर दिया गया और जार और जमींदारों की जमीन जब्त कर जनता को सौंप दी गयी।
अगले कुछ माह में महिलाओं, उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं और धार्मिक अल्पसंख्यकों के जनवादी अधिकारों की बहाली कर दी गयी। समाजवादी रूस ने मजदूर मेहनतकश महिलाओं को मताधिकार प्रदान कर न केवल रूस की महिलाओं की अधिकारविहीनता को समाप्त किया बल्कि विकसित पूंजीवादी देश की महिलाओं को अब तक नहीं हासिल इस अधिकार को प्राप्त करने में मदद की। महिलाओं को अपने विवाह और तलाक सम्बन्धी अधिकारों में बराबरी हासिल हुई। इसके अतिरिक्त समाजवादी राज्य ने महिलाओं के सार्वजनिक जीवन में हिस्सेदारी करने में आने वाली समस्त बाधाओं को समाप्त करने के लिए कदम उठाए। राष्ट्रीयताओं को अलग होने समेत आत्मनिर्णय का अधिकार दिया गया। इस आधार पर राष्ट्रीयताओं की समस्या हल होने की वजह से कई राष्ट्रीयताएं समाजवादी रूस के साथ एक संघ में सम्मिलित हुईं और सोवियत संघ का गठन हुआ। समाजवादी रूस ने धर्म को राज्य से अलग कर दिया और धर्म को व्यक्ति का निजी मामला माना गया तथा अन्तः करण की स्वतंत्रता प्रदान की गयी। धार्मिक अल्पसंख्यकों का जारशाही शासन के दौरान होने वाला भेदभाव और उत्पीड़न समाप्त हुआ।
समाजवादी रूस(बाद में सोवियत संघ) ने चार सालों के विश्व युद्ध और तीन सालों के साम्राज्यवादी हस्तक्षेप और गृहयुद्ध से जर्जर हो चुके देश का आर्थिक पुनर्निर्माण किया। 1926 तक युद्ध पूर्व उत्पादन हासिल करने के बाद अर्थव्यवस्था का समाजवादी रूपांतरण का काम शुरू हुआ। पहले उद्योगों का समाजवादी रूपांतरण करने के लिए भारी उद्योग और मशीनें बनाने वाले उद्योगों की स्थापना की गयी। यह समाजवादी औद्योगीकरण न तो विदेशी पूंजी, न ही उपनिवेशों से लूट और न ही मुनाफाखोरी के जरिए हासिल किया गया। इतना तेज औद्योगीकरण मजदूर वर्ग की क्रांतिकारी पहलकदमी की वजह से हो पाया। 1929 में जहां पूरा विश्व आर्थिक मंदी की चपेट में था वहीं सोवियत संघ तेजी से आर्थिक विकास कर रहा था। उद्योग के बाद खेती में निजी पूंजी पर हमला बोला गया और सामूहिकीकरण का आहवान किया गया। कुलकों की तोड़फोड़ की वजह से पैदा हुयी शुरूआती हिचकिचाहट से पार पाने के बाद मध्यम और गरीब किसानों ने भरपूर उत्साह के साथ सामूहिकीकरण को सफल किया।
इस तरह इतिहास में एक नये युग की शुरूआत हुई।
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