इतनी मुद्दत में बात करते हो,
याद क्या मुद्दतों में आती है ?
तुम्हैं मसरूफ़ियत से इश्क़ सा है,
हमें मसरूफ़ियत सताती है !
तबाह कर गई पक्के मकान की ख़्वाहिश
मैं अपने गाँव के कच्चे मकान से भी गया
हमको सूली पे चढाने की जरूरत क्या है
हमारे हाथों से कलम छीन लो मर जयेंगे
ठोकर किसी पत्थर से अगर खाई है मैं ने
मंज़िल का निशाँ भी उसी पत्थर से मिला है
जो हम पे गुज़री है शायद सभी पे गुज़री हो
फ़साना जो भी सुना कुछ सुना सुना सा लगा
ज़रूर मैंने कोई बात सच कही होगी ...
ज़माना पहले तो इतना मेरे ख़िलाफ़ ना था
क्या चाहती है हम से हमारी ये ज़िंदगी
क्या क़र्ज़ है जो हम से अदा हो नहीं रहा
इन काग़ज़ों की अब कोई क़ीमत नहीं रही
दुनिया ख़रीदते थे इन्हीं काग़ज़ों से हम
पाया भी उन को खो भी दिया चुप भी हो रहे
इक मुख़्तसर सी रात में सदियाँ गुज़र गईं
परिंदे बे-ख़बर थे सब पनाहें कट चुकी हैं
सफ़र से लौट कर देखा कि शाख़ें कट चुकी हैं
गैर मुमकिन है कि हालात की गुत्थी सुलझे
अहलेदानिश ने बहुत सोच के उलझाई है
अब सँभल जा और खुद को थाम ले
हवा ज़हरीली है हिम्मत से काम ले
तेरा शहर तो पीछे छूट रहा
कुछ अन्दर ही अन्दर टूट रहा
हैरान हूँ अपने नैनो पे
ये झरना कहाँ से फूट रहा
मैं एक आईने सा सदा सच ही बोला हूँ।
तेरी मन्नत है कि टूटकर बिखर जाऊं।।
वो बुलंदियाँ भी..
किस काम की जनाब कि...
इंसान चढ़े और..
इंसानियत उतर जायें......
ये सोचना ग़लत है कि, तुम पर नज़र नहीं,
मसरूफ़, हम बहुत हैं, मगर बे-ख़बर नहीं....
ऐ दिल तू क्यों रोता है,
ये दुनिया है यहाँ ऐसा ही होता है!
ठोकर खाकर भी न संभले तो मुसाफिर का नसीब,
वरना पत्थरों ने तो अपना फ़र्ज़ निभा दिया
हर दिल का एक ही किस्सा है
खुशी उसकी दर्द मेरा हिस्सा है .
जो साज से निकली वो धुन सबने सुनी है,
पर तार पे क्या गुजरी है ये किसको पता है।
सच की इबारत सँभल कर सीख
दर्द की फितरत सँभल कर सीख .
हैवानों की भीड़ में इंसान ढूंढना
शै जानलेवा है सँभल कर सीख .
न कर शुमार कि हर शै गिनी नहीं जाती
ये जिंदगी है हिसाबों से जी नहीं जाती...
अहले चमन की खुशबु लेने.... हम भी आए हैं।
आपकी कलम को दाद देने.... हम भी आए हैं।
अब सँभल जा और खुद को थाम ले
हवा ज़हरीली है हिम्मत से काम ले
न निकल यूँ हादसों से चुरा के आँख
रख हौसला बुलन्द हिम्मतसे काम ले
कहीं न कहीं दिल में आपके
हम जगह बनाए बैठे हैं।
वरना क्या आप नाहक ही
हम पर नजर जमाए बैठे हैं।
अब ''तअल्लुक़'' नहीं रहा कोई
बस ''तक़ल्लुफ़'' निभा रहे हैं हम..
मुहब्बत में बेचैनियाँ... बेक़रारियाँ... होतीं है!!!! बेपरवाहियाँ नहीं होती,,,
शिकायतें,शिकवे और तिशने होते है!!!!!
पर बेहिसी ,बेदिली और शिद्दत पसंदी नही होती,,
इश्क़ तो खुद में एक खला ,एक वीराना, एक अग्यार है!!
जिस में हर लम्हा दूरी की,खोने की,तन्हाई की,और जुस्तुजू की एक आग धधकती रहती है!!!
जिसको पा लिया तो पा लिया,उसे खोने का सवाल नही उठता!!!
जो इश्क़ है वो इश्क़ है खो कर गहरा ....और गहरा... पाकर, उसी में ग़र्क़ हो जाएं तो ही इश्क़ ...मुहब्बत ..
वरना वो इश्क़ ...वो मुहब्बत नहीं होती।।
शक और शुबह से दूर,... खुदगर्ज़ी, ख़ुदपरस्ती और लालच से परे।। नजदीकियों और दूरियों से अन्जानी।। रस्मों रिवाज और दुनिया से बेख़बर, बेख़ौफ।।
परस्तिश और इन्किसारी का दूसरा नाम है मुहब्बत।।रूहानी क़ैफ और पाकीज़गी की तस्वीर।। यक़ीन और एतमाद की मज़बूती।। सब्र और सूकून का ठहराव।। उम्मीदों और क़रार की एक पुलसरात है।।
जिस पर चलना... पार करना सबको नसीब नहीं।।
जिस को पहचान पाना सबके बस की बात नहीं।।
जिस को निभा जाना, निभाते चले जाना हर बशर की औकात नहीं।।
अधूरेपन पन में भी पूरेपन पन का एहसास है....
इश्क़.....मुहब्बत!!!!
अजनबी दुनिया में नज़दीकी ए ख़ुदा का एहसास है मुहब्बत..
..…......... और यहाँ तक ओशो जैसे लोग नहीं पहुंच सकते।।।
…....................................................रुही ख़ान।
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