"इस्लाम एक बंद निकाय की तरह है जो मुसलमानों और गैर मुसलमानों के बीच के जो भेद करता है, वह बिलकुल मूर्त और स्पष्ट है। इस्लाम का भ्रातृभाव मानवता का भ्रातृत्व नहीं है। मुसलमानों का मुसलमानों से ही भ्रातृत्व है। यह बंधुत्व है, परंतु इसका लाभ अपने ही निकाय के लोगों तक सीमित है और जो इस निकाय से बाहर हैं, उनके लिए इसमें सिर्फ घृणा और शत्रुता ही है।
इस्लाम का दूसरा अवगुण यह है कि यह सामाजिक स्वशासन की एक पद्धति है जो स्थानीय स्वशासन से मेल नहीं खाता क्योंकि मुसलमानों की निष्ठा, जिस देश में ये रहते हैं, उसके प्रति नहीं होती बल्कि वह उस धार्मिक विश्वास पर निर्भर करती है, जिसका कि वे एक हिस्सा है। एक मुसलमान के लिए इसके विपरीत या उल्टे मोड़ना अत्यन्त दुष्कर है। जहां कहीं इस्लाम का शासन है, वहीं उसका अपना विश्वास है।
दूसरे शब्दों में इस्लाम एक सच्चे मुसलमानों को भारत को अपनी मातृभूमि और हिन्दुओं को अपना निकट संबंधी मानने की इजाजत नहीं देता। संभवतः यही वजह थी कि मौलाना मुहम्मद अली जैसे एक महान भारतीय परन्तु सच्चे मुसलमान ने अपने शरीर को हिन्दुस्तान की बजाए येरूशलम में दफनाया जाना अधिक पसंद किया।"
डॉ०बी०आर० अम्बेडकर (पाकिस्तान और भारत का विभाजन पृ 367 )
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