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भारतीय समाज में जाति या वर्ण व्यवस्था प्राचीन काल से चली आ रही है। इसकी उत्पत्ति के बारे में एक दृष्टिकोण यह है कि ईश्वर ने सृष्टि की रचना की, उसी ने मनुष्यों और उनमें वर्णों या जातियों को बनाया, अतः यह अनादि है। जबकि हमें प्रारम्भिक शिक्षा में ही पढ़ाया जाता है कि मनुष्य के शरीर के विकास फिर उसके एक सामाजिक प्राणी के रूप में विकसित होने में हजारों साल लग गये। फिर उसके हजारों सालों के बाद मानव समाज में जाति या वर्ण व्यवस्था का विकास हुआ। अतः यह कहना गलत है कि वर्ण या जाति व्यवस्था अनादि है।
वर्ण व्यवस्था के बारे में भारत के प्राचीन धर्म ग्रन्थ ऋग्वेद में रंगों के आधार पर वर्णों का उल्लेख है। जिसमें आर्यों को गौर वर्ण एवं अनार्यों को काले वर्ण या रंगों वाला कहा गया है। उसी ग्रन्थ में आर्यों द्वारा अनार्यों के प्रति घृणा व वैमनस्य का भी उल्लेख मिलता है। उन्हें वह दस्यु या राक्षस आदि नामों से भी सम्बोधित करते थे।
तथा इन्द्र के द्वारा दस्युओं या राक्षसों को युद्धों में मार डालने उनके नाश कर देने की कामना करते थे। इस प्रकार युद्धों में पहले वह अनार्य शत्रुओं को मार डालते थे किन्तु कालान्तर में कृषि एवं पशुपालन का विकास होने पर अधिक श्रम की जरूरत महसूस होने पर आर्य लोग उन्हें दास बनाने लगे। ऋग्वेद में ब्राह्मण, राजन्य, वैश्य, चर्मकार, कृषक, रथकार, बुनकर दास व दासियों का भी उल्लेख मिलता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि आर्यो में एक सामाजिक विभाजन उनके श्रम विभाजन पर आधारित था। यद्यपि शुरूआती दौर में यह स्पष्ट श्रम विभाजन नहीं था. एक पेशे का काम करने वाले दूसरे पेशे का भी काम कर सकते थे। किन्तु जैसे-जैसे खेतियों का विकास तथा उससे सम्बन्धित उद्योगों का विकास शुरू हुआ तो उस पर आधारित तरह तरह के पेशे विकसित होने लगे।
भारत की विशाल समतल एवं उपजाऊ जमीन सिंचाई के लिये नदियों की अधिकता तथा प्राकृतिक वर्षा उपलब्ध होने के कारण आर्य लोगों ने खेती एवं पशुपालन को जीवन यापन का मुख्य पेशा बना लिया। जिसके कारण उनका जीवन स्थायी हुआ और वह ग्रामों में बसने लगे। चूंकि आर्यों में पेशे के आधार पर सामाजिक जीवन पहले से मौजूद था. इसके अलावा युद्धों अथवा जुए में हारे हुये अनार्य लोगों को उन्होंने अपना दास या गुलाम बना लिया था जो कि उनके लिये सेवा का काम करते थे अतः कालान्तर में एक स्थायी जीवन प्रणाली होने के कारण एक पेशे में लगे हुए लोगों के बच्चे भी उसी पेशे में कुशल होने लगे और धीरे धीरे पेशों का बटवारा पुश्तैनी हो गया जिसमें किसी व्यक्ति का पेशा उसके जन्म लेते ही तय हो जाता था।
पहले अनार्य कबीलों से आर्यों को कृषि कार्य के फैलाव हेतु युद्ध लड़ना पड़ता था इसी से शत्रुता के चलते आर्य उनसे घृणा करते थे फिर जब उन्हें गुलाम बनाकर सेवा के कार्य लेने लगे तो शत्रुतापूर्ण घृणा में कुछ कमी आई परन्तु युद्ध में विजयी होने के चलते स्वयं को उच्च और हारे अनार्यों को अपने से निम्न या नीचा मानने लग गये। साथ ही साथ आर्यों की उच्च स्थिति एवं अनार्य दस्यु या दासों की निम्न स्थिति के चलते अनार्य दासों के द्वारा किये गये उत्पादनों का संग्रह दासों के पास नहीं बल्कि आर्य मालिकों के पास होता था। चूंकि काले वर्ण वाले अनार्य दास या गुलामों से वह परिश्रम या सेवा के कार्य लेते थे और गौर वर्ण वाले आर्य स्वयं काम नहीं करते थे तथा दास या गुलाम होने के कारण वह काले अनार्यो से शत्रुता के चलते घृणा करते थे अतः धीरे धीरे कालान्तर में श्रम या पेशा का निर्धारण जन्मजात पुश्तैनी रूप से तय हो जाने से वर्ण शब्द जाति का द्योतक हो गया तथा विभिन्न प्रकार के पेशों में लग कर श्रम करने वाले पेशों या जातियों को श्रम न करने वाले आर्य वर्णो या जातियों के द्वारा नीच एवं घृणित माना जाने लगा। अतः धीरे-धीरे श्रम करना नीचता एवं श्रम न करना उच्चता का द्योतक हो गया तथा वर्ण शब्द वर्ग का द्योतक हो गया।
इस तरह आर्यों एवं अनार्यों के बींच ऊंच नीच का एक वर्ण विभाजन स्थापित होने लगा। इसके अतिरिक्त ब्राह्मण कबीले मलाई के देवी देवताओं प्रसन्न करने के लिये मंत्रों का उच्चारण करते थे तथा क्षत्रिय (क्षेत्रपति) कबीले की रक्षा सुरक्षा का जो काम करते थे उसके बदले में पेशा करने वाले कमकर लोग उन्हें अपने उत्पादन का एक हिस्सा शुल्क (बलि) के रूप में दिया करते थे। इससे भी ब्राह्मणों एवं क्षत्रियों के पास कमकर वर्णों या वर्गों की तुलना में अतिरिक्त धन इकट्ठा होने लगा। यह आर्यों में वर्ग विभाजन का द्योतक है। कालान्तर में धीरे-धीरे यही वर्ण या वर्ग व्यवस्था एक सामाजिक बंटवारे के रूप में स्थापित हो गयी जिसमें ब्राह्मण का काम शिक्षा देना, पूजा पाठ आदि करना या क्षत्रिय का काम रक्षा करना प्रबन्ध करना आदि तथा वैश्य का काम व्यापार आदि करना तथा विभिन्न प्रकार के कमकर पेशे में लगे हुये लोगों को शूद्र कहा गया शूद्रों का काम ऊपर के इन्हीं तीनों वर्णों की सेवा करना था। जो उच्च वर्ण के लोग थे ज्यादातर उत्पादन के साधनों जैसे
खेतिया, पशुपालन आदि पर उन्हीं का मालिकाना होता था और शूद्र वर्ण के लोग उनके इन्हीं उत्पादन के साधनों पर मजदूरी करके, कृषि सम्बन्धी कार्यों में लग कर अथवा सेवा के अन्य पेशों में लगकर अपना जीवन यापन करते थे। चूंकि शूद्रों के पास इन्हीं तीनों उच्च वर्णों की सेवा के लिए श्रम करने के अलावा जीवन यापन का कोई अन्य साधन नहीं होता था और निर्धनता के चलते उन्हें मैला उठाना, मरे हुये जानवरों को हटाना, व उनका मांस खाना, जूठा साफ करना व खाना, जूते बनाना आदि जैसे निम्न, गंदा व घृणित काम भी करना
पड़ता था। अतः ऊपर के तीनों उच्च वर्ण के लोग नीचे के शूद्र वर्ण के लोगों से, जो कालान्तर में पेशों के आधार पर विभिन्न छोटी जातियों में विभाजित हो गये थे, उन्हें नीच एवं गन्दा मानकर उनसे घृणा करते थे और उनसे छुआ छूत का भेदभाव करने लगे। चूंकि ब्राह्मण का पेशा शिक्षा देना, क्षत्रिय का पेशा रक्षा करना तथा वैश्य का पेशा व्यापार करना था इसलिए इन वर्गों में पेशों के आधार पर ज्यादा विभाजन या उपविभाजन नहीं हुआ और पूरे वर्ण विभाजन की व्यवस्था में उनकी उच्चता बरकरार रही जबकि शूद्र वर्ण में बहुत से पेशे जैसे हल
चलाना, जानवरों की देखभाल करना, खेतियों में प्रयोग होने वाले लोहे के औजार बनाना, लकड़ी का काम, मिट्टी के बर्तन बनाना, बाल काटना, कपड़े धोना, जूते बनाना या चमड़े के अन्य काम मरे हुए जानवरों को हटाना, सफाई करना, पालकी ढोना, कुटाई पिसाई आदि ऐसे तमाम पेशे थे जिनके आधार पर शूद्र वर्ण में बहुत सी जातियां उपजातियां बनती गयी और पीढ़ी दर पीढ़ी उसी काम में दक्षता होने की वजह से उनके बच्चे भी उसी काम में लगते गये। इस प्रकार से पेशें के आधार पर जातियां उपजातियां बनती गयी। जिसमें घृणित एवं गंदा काम जैसे- मैला उठाना, मरे पशुओं को हटाना, जूते व चमड़े का काम सफाई का काम आदि ऐसे बहुत से काम करने वालों को उच्च वर्ण के लोग अपने से नीच मानने लग गये, उनसे घृणा करने लगे. उनसे छुआछूत का भेदभाव रखते हुए उन्हें अछूत जातियां मानने लग गये और उनकी गांव की बस्ती से अलग बस्तियां बन गयी।
वर्षों से चले आ रहे इसी जातीय भेदभाव को परम्परागत जातिवाद कहा जाता है।
अंग्रेजों के आने के बाद से जैसे-जैसे पूंजीवाद का विकास होने लगा उसे अपने औपनिवेशिक शासन की जरूरतों हेतु कल कारखानों में कुशल अकुशल मजदूरों, क्लर्को एवं टेक्नीशियनों आदि की जरूरतें महसूस हुई तो उसने इन परम्परागत वर्गों को शिक्षित प्रशिक्षित करने के लिये बिना किसी भेद भाव के शिक्षा की व्यवस्था की। जिसमें छोटी जातियों के लोग भी शिक्षा प्राप्त करके नौकरियों में अफसर, क्लर्क, चपरासी आदि शिक्षा में अध्यापक, कल-कारखानों वाणिज्य व्यापार में मजदूर, सुपरवाइजर, टेक्नीशियन आदि के रूप में भर्ती हुए। • जिससे उनकी आर्थिक स्थितियां पहले से मजबूत हुईं। यद्यपि अंग्रेजों ने यह कार्य भारतीय जनता की सेवा भाव या कल्याण उत्थान के लिये नहीं बल्कि अपने औपनिवेशिक शासन द्वारा भारत की जनता की लूट पाट व शोषण के लिये किया लेकिन उसके इस कार्य से भारत में वर्षों से चली आ रही सामाजिक संरचना में टूटन एवं बदलाव शुरू हुआ। निम्न जातियों का एक बड़ा हिस्सा जो अभी तक केवल जमीन मालिकों की जमीनों से बंधा हुआ दास अर्द्धदास था वह उनसे मुक्त होकर औद्योगिक एवं दिहाड़ी खेतिहर मजदूरों के रूप में उभरा, उसके पेशे बदले, जिससे जाति व्यवस्था पर चोट पहुंची।
जातिवाद पर महत्वपूर्ण चोट कम्युनिस्टों द्वारा चलाये गये क्रान्तिकारी आन्दोलनों से पड़ी। उन्होंने मजदूरों किसानों को, जो कि ज्यादातर छोटी जाति के ही होते हैं, पर जमीदारों सामान्तों द्वारा जो शोषण उत्पीड़न किया जा रहा था, उसके विरूद्ध उन्हें गोलबन्द किया। उन्होंने मजदूरियों एवं जमीनों के बटवारे के लिये आन्दोलन किया। इस तरह से कम्युनिष्टों ने जमीनों के बटवारे का मुद्दा खड़ा करके जाति व्यवस्था के प्रमुख आधार जमीनों पर ऊंची जाति के लोगों के मालिकाने पर परिणाम स्वरूप उनकी जातीय उच्चता पर चोट की ।
अब अगले भाग में ।
वाराणसी के साथीगण
जुलाई-सितम्बर 2021, मंथन, अंक - 31
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