Tuesday, 1 June 2021

लाशें एक दिन में जवान नहीं होती



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गंगा में लाशें तैरती नहीं तैरायी जाती हैं
लाशें  गेहूं  के खेत में अफीम की तरह बोयी जाती हैं
 लाशें कारपोरेट के गर्भ में बोयी गई 
शाही व्यभिचार  की अंधेरे की उपज होती हैं
लाशों के भ्रूण अधर्म और नकली राष्ट्रवाद की
 रासलीला के अंत:पुर   में  धीरे-धीरे खोलते हैं आंख
लाशें एक दिन में गंगा में नहीं तैरतीं
लाशों को धीरे-धीरे  किया जाता है गुपचुप जवान
जब एक  अखलाक़ मोहम्मद शिकारी भीड़ के द्वारा 
 अपने ही घर में हांका लगा कर मार दिया जाता है
उसी क्षण ऑक्सीजन के खाली सिलेंडरों में 
मौत भविष्य की जन्म कुंडली बन कर छप उठती है
जिस दिन भारत माता के सारे गहनें सेठियों के हरम खाने में
शाही दहेज बनकर पहुंच जाते हैं
उसी क्षण अस्पतालों के घड़ियों की टिक टिक करती सुईंया
कफनफरोशों द्वारा खोदी गई कब्र में पांव लटका लेती हैं
जब एक बलत्कृत बिटिया की लाश 
पुलिस की  मूछों के नीचे रात के चोर अंधेरे में 
जलाकर खाक कर दी जाती है
तब आने वाले समय के लिए 
चिताओं की लकड़ियां  कम पड़ जाती हैं
लाशें अकेले नहीं चलतीं
वह अपने साथ शाही पाप को लंगड़ी घोड़ी पर बैठाये
मौत के बनिए की बारात लिए 
कफन खसोटों का  मंगल गीत गाते
गंगा घाट तक पहुंचती हैं 
लाशें बड़ी विनम्र और आज्ञाकारी होती हैं
 वे बादशाह की हर हुक्म का  तामील करती हैं 
वे शाही  महल की नींव में 
खुद को ईंटों की तरह चुन कर खुश हो लेती  है
जब तक चलने फिरने वाली लाशें  जिंदा है
जब तक झांझ मजीरे वाली जीवित लाशें
 शाही संगत में हैं
जब तक कलम की कुट्टनियां
 भाषा के व्याकरण में  भूमिगत होकर बंकर खोदती रहेंगी
जब तक भाड़े की रुदालिंया लाशों के जन्म पर सोहर गाती रहेंगी
तब तक लाशों के आईने में झूठ का बादशाह
 अपने गालों पर सुर्खियां सजाता रहेगा 
 उसके द्वारा बुना गया 
गंगा के दोनों पाट से भी बड़ा कफन का पर्दा
 गंगा में बहती लाशों से छोटा पड़ जाएगा

@ जुल्मीरामसिंह यादव 
1 जून 2021

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