Friday, 4 June 2021

आर्थिक संकट के मार्क्सवादी सिद्धांत



पूंजीवादी उत्पादन प्राणाली में आर्थिक संकट के बुनियादी कारण क्या  है? १९ वी शताब्दी के आरम्भ से और बड़े पैमाने पर मशीन उद्धोग के पदार्पण के साथ पूंजीवादी उत्पादन के विकास का सफ़र आवधिक संकटों से बाधित होने वाला सफ़र रहा है जो आज तक जारी है. सर्वहारा के महान शिक्षक मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन और स्टॅलिन ने अपनी रचनाओं में इस पर विस्तार से प्रकाश डाला है.  आइये, हम इस संकट के बुनियादी कारण  को  स्तालिन के शब्दो में समझते है. स्तालिन ने कहा है: 
"संकट का बुनियादी कारण उत्पादन के सामजिक चरित्र और उत्पादन के परिणामो के हस्तगतिकरण के पूंजीवादी स्वरूप के बीच विरोधाभास में निहित है. अधिकतम पूंजीवादी  लाभ के लिए उत्पादन के पूंजीवादी क्षमता में भारी वृद्धि और मिहनतकस विशाल जनता, जिनका जीवनस्तर पूँजीवाद हमेशा निम्नतर स्तर पर रखने की कोशिश करता है, के प्रभावी मांग में कमी के बीच विरोधाभास में पूँजीवाद के इस बुनियादी विरोधाभास की अभिव्यक्ति होती है. (स्टालिन, "सी.पी.एस.यु.(बी) के XVIवी  कांग्रेस के लिए केंद्रीय समिति के राजनीतिक रिपोर्ट,  अंग्रेजी संस्करण, खंड. XII, पेज  250-1.)

स्तालिन ने यहाँ दो बाते कही है . 

पहली बात यह है कि संकट का बुनियादी कारण उत्पादन के सामजिक चरित्र और उत्पादन के परिणामो के हस्तगतिकरण के पूंजीवादी स्वरूप के बीच विरोधाभास में निहित है. 

दूसरी बात यह है कि यह विरोधाभास किस रूप में अभिव्यक्त होता है. स्तालिन के अनुसार यह अधिकतम पूंजीवादी  लाभ के लिए उत्पादन के पूंजीवादी क्षमता में भारी वृद्धि और मिहनतकस विशाल जनता, जिनका जीवनस्तर पूँजीवाद हमेशा निम्नतर स्तर पर रखने की कोशिश करता है, के प्रभावी मांग में कमी के बीच विरोधाभास में पूँजीवाद के इस बुनियादी विरोधाभास की अभिव्यक्ति होती है. यह संकट का बुनियादी कारण नहीं होता है, यह बुनियादी विरोधाभास की सिर्फ एक अभिव्यक्ति होती है. जाहिर है इस अभिव्यक्ति को ही कारण समझना भारी भूल होगी.  हम आगे देखेगे कि कैसे इसे संकट के बुनियादी कारण के रूप में पेश करने की गलती बार बार हमारे क्रांतिकारी साहित्य में दोहराई जाती है. 
आइये हम इन दोनों बातो को विस्तार से समझते है. 
सबसे पहले, 'उत्पादन के सामजिक चरित्र' का क्या अर्थ है? क्या सभ्यता के आरम्भ से ही उत्पादन का चरित्र सामजिक था? या श्रम की उत्पादकता  के विकास के साथ इसका चरित्र सामूहिक, व्यक्तिगत और फिर समाज के विकास के एक ख़ास मंजिल में, पूंजीवादी उत्पादन प्राणाली की मंजिल में सामजिक होता गया? आइये विस्तार से समझते है.   
 
उत्पादन के सामाजिक चरित्र हस्तगतकरण के निजी पूंजीवादी अंतर्विरोध का अर्थ. 
श्रम प्रक्रिया के व्यक्तिगत से सामजिक रूप में रूपांतरण श्रम की उत्पादकता एवं श्रम विभाजन के विकास के साथ और उन उत्पादन के साधनों के प्रतिस्थापन के साथ जुड़ा हुआ है जो उत्पादन को सामूहिक ढंग से करने को आवश्यक बनाते है.  
आदिम समाज में उत्पादन का आधार सामूहिक श्रम था लेकिन उत्पादक शक्तियों के विकास के साथ उत्पादन का आधार व्यक्तिगत श्रम होता गया. प्राक-पूंजीवादी व्यवस्था में अपने उत्पादन के साधनों पर कामगार का निजी स्वामित्व छोटे पैमाने के उत्पादन का आधार था और यह  सामाजिक उत्पादन के विकास और खुद कामगार के स्वतंत्र व्यक्तित्व के विकास की एक आवश्यक शर्त था जो वर्गीय समाज की अन्य अवस्थाओं में भी पायी जाती थी.  यह व्यक्तिगत किसानी और दस्तकारी आदि के रूप में प्रतिफलित एव विकसित होता रहा और प्राक-पूंजीवादी उत्पादन व्यवस्था के पतन के समय तक उत्पादन के आधार के रूप में व्यक्तिगत श्रम का विस्तार हुआ. मार्क्स  कहते है:
अपने उत्पादन के साधनों पर कामगार का निजी स्वामित्व छोटे उद्योग का आधार होता है, चाहे वह छोटा उद्योग खेती से संबंधित हो या मेन्युफेक्चर से अथवा दोनों से। यह छोटा उद्योग सामाजिक उत्पादन के विकास और खुद कामगार के स्वतंत्र व्यक्तित्व के विकास की एक आवश्यक शर्त होता है। बेशक उत्पादन की यह क्षुद्र प्रणाली दास-प्रथा, कृषिदास-प्रथा और पराधीनता की अन्य अवस्थाओं में भी पायी जाती है। लेकिन वह फलती-फूलती है, अपनी समस्त शक्ति का प्रदर्शन करती है और पर्याप्त एवं प्रामाणिक रूप प्राप्त करती है केवल उसी जगह, जहां कामगार अपने श्रम के साधनों का खुद मालिक होता है और उनसे खुद काम लेता है, यानी जहां किसान उस धरती का मालिक होता है, जिसे वह जोतता है, और दस्तकार उस औजार का स्वामी होता है। जिसका वह सिद्धहस्त ढंग से प्रयोग करता है। मार्क्स कहते है: 
"अपने विकास की एक खास अवस्था में पहुंचने पर यह प्रणाली स्वयं अपने विघटन के भौतिक साधन पैदा कर देती है। बस उसी क्षण से समाज के गर्भ में नयी शक्तियां और नयी भावनाएं जन्म ले लेती हैं। परंतु पुराना सामाजिक संगठन उनको श्रृंखलाओं में जकड़े रहता है और विकसित नहीं होने देता। इस सामाजिक संगठन को नष्ट करना आवश्यक हो जाता है। वह नष्ट कर दिया जाता है। उसका विनाश, उत्पादन के बिखरे हुए व्यक्तिगत साधनों का सामाजिक दृष्टि से संकेंद्रित साधनों में रूपांतरित हो जाना, अर्थात् बहुत से लोगों की छोटी-छोटी संपत्तियों का थोड़े से लोगों की अति विशाल संपत्ति मे बदल जाना अधिकतर जनता की भूमि, जीवन-निर्वाह के साधनों तथा श्रम के साधनों का अपहरण, साधारण जनता का यह भयानक तथा अत्यंत कष्टायक संपत्तिहरण पूंजी के इतिहास की भूमिका मात्र होती है. मार्क्स की पूंजी के प्रथम खंड नागरिक अंक १६ -३१ मई, २०१३ से साभार. 

तकनीकी और माल उत्पादन के विकास ने तथा विकसित उत्पादन के साधनों ने श्रम विभाजन को आवश्यक बनाया जो लोगो के संयुक्त श्रम की मांग करता है. किसानो और दस्तकारो के स्वतंत्र आर्थिक इकाइयों की जगह तीन चरणों में  सरल सहयोग, विनिर्माण और उसके बाद आधुनिक उद्योग (कारखाना) ने जगह ली. इस तरह श्रम एवं  उत्पादन का सामाजिकरण विशेषीकरण और सहकारिता के विकास में,  बड़े उद्धोगो की स्थापना में तथा आर्थिक गतिविधियों के अंतर्गुन्थन में अभिव्यक्त हुआ. लेकिन यह विकास उत्पादकों के सम्पतिहरण पर आधारित था, अपने श्रम से कमाई हुई निजी संपत्ति की जगह पूंजीवादी निजी संपत्ति ले लेती है जो  दूसरो के श्रम के शोषण के आधार पर टिकी होती है. मार्क्स ने कहा है: 
प्रत्यक्ष उत्पादकों का संपत्तिहरण निर्मम ध्वंस-लिप्सा से और अत्यंत जघन्य, अत्यंत कुत्सित, क्षुद्रतम, नीचतम तथा अत्यंत गर्हित भावनाओं से अनुप्रेरित होकर किया जाता है। अपने श्रम से कमायी हुई निजी संपत्ति का स्थान, जो मानो पृथक रूप से श्रम करने वाले स्वतंत्र व्यक्ति के अपने श्रम के तत्वों के साथ मिलकर एक हो जाने पर आधारित है, पूंजीवादी निजी संपत्ति ले लेती है, जो कि दूसरे लोगों के नाम मात्र के लिए स्वतंत्र श्रम पर अर्थात् मजदूरी पर आधारित होती है। मार्क्स की पूंजी के प्रथम खंड नागरिक अंक १६ -३१ मई, २०१३ से साभार. 

  
पूँजीवाद के विकास ने श्रम के समाजीकरण को व्यक्तिगत कारखाने से भी परे ले गया और कारखानों और कारखानों के संघों के बीच बीच तेजी से मजबूत और व्यापक संबंधों की स्थापना की. सभी सामाजिक उत्पादन अंत में सामजिक उत्पादन की एक प्रक्रिया में विलय हो गया जिसके  सभी घटक श्रम विभाजन द्वारा एक साथ जुड़े हुए है. यह श्रम विभाजन न केवल क्षेत्रीय स्तर पर है बल्कि यह उत्पादन की प्रक्रिया में ही निहित है-  श्रम की तकनीकी विभाजन या श्रम के "एक हिस्से की पूर्णता" के एक रूप में विभाजन। श्रम के समाजीकरण के पहले चरण में  यह निर्धारित करना अब असंभव हो जाता है कि किसी विशेष कारखाने में उत्पादन के किसी विशेष उत्पाद को  किस विशेष श्रमिक ने पैदा किया है क्योकि यह  पूरे सामूहिक श्रम का उत्पाद होता है;  श्रम के समाजीकरण की प्रगति के साथ यह कहना असंभव होता जाता है कि किस विशेष  कारखाने ने एक या दूसरे अंतिम  उत्पाद का उत्पादन किया है क्योकि प्रत्येक उत्पाद व्यवस्थित रूप से उत्पादन की प्रक्रिया से जुड़े हुए दसियों या अलग-अलग कारखानों के सैकड़ों उत्पादन प्रक्रियाओं के परिणाम होते है. स्टॅलिन ने कहा है: 
"दूसरी ओर, उत्पादन का विस्तार कर के और विशाल मिलों और कारखानों में लाखों  श्रमिकों को केंद्रित करके, पूंजीवाद उत्पादन की प्रक्रिया को एक सामाजिक चरित्र का रूप देता है और इस तरह अपनी खुद की नींव को कमजोर करता है, क्योंकि उत्पादन की प्रक्रिया के सामाजिक चरित्र उत्पादन के साधनों का सामाजिक स्वामित्व की मांग करता है; अभी तक उत्पादन के साधन, निजी पूंजीवादी संपत्ति ही रहते है जो उत्पादन की प्रक्रिया के सामाजिक चरित्र के साथ असंगत है" स्तालिन – द्वंदात्मक और ऐतिहासिक भौतिकवाद 
रूपांतरण की यह प्रक्रिया व्यक्तिगत श्रम के आधार पर छोटे उत्पादन को बर्बाद करने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली के स्थापना के बाद  श्रम का और अधिक समाजीकरण करने का प्रश्न, भूमि तथा और साथ ही निजी संपत्ति का अधिक अपहरण करने का प्रश्न एक नया रूप धारण कर लेता  हैं अर्थात खुद अपने लिए काम करने वाला कामगार का सम्पति हरण नहीं, बल्कि बहुत से कामगारों को शोषण करने वाला पूंजीपतियों की निजी संपत्ति का अपहरण (बड़ी पूँजी द्वारा छोटी पूँजी का संपत्तिहरण)  और यह पूंजीवादी उत्पादन के अंतर्भूत नियमों के अमल में आने के फलस्वरूप पूंजी के केंद्रीयकरण के द्वारा संपन्न होता है. इस तरह पूंजीवादी उत्पादन और भी ज्यादा केन्द्रीयकृत, उत्पादन का साधन और भी ज्यादा समाजीकृत होता जाता है जब कि उत्पादन के हस्तगतकरण का स्वरुप निजी पूंजीवादी ही बना रहता है. मार्क्स ने इस रुपंतार्ण की प्रक्रिया का वर्णन करते हुए कहा है :  
"रूपांतरण की यह प्रक्रिया जैसे ही पुराने समाज को ऊपर से नीचे तक काफी छिन्न-भिन्न कर देती है, कामगार जैसे ही सर्वहारा बन जाते हैं और उनके श्रम के साधन पूंजी में रूपांतरित हो जाते हैं, पूंजीवादी उत्पादन-प्रणाली खुद जैसे ही अपने पैरों पर खड़ी हो जाती है, वैसे ही श्रम का और अधिक समाजीकरण करने का प्रश्न, भूमि तथा उत्पादन के अन्य साधनों को सामाजिक ढंग से इस्तेमाल किये गये साधनों में और इसलिए सामूहिक साधनों में और भी अधिक रूपांतरित कर देने का प्रश्न और साथ ही निजी संपत्ति का अधिक अपहरण करने का प्रश्न एक नया रूप धारण कर लेते हैं। अब जिसका संपत्तिहरण करना आवश्यक हो जाता है। वह खुद अपने लिए काम करने वाला कामगार नहीं है, बल्कि वह है बहुत से कामगारों को शोषण करने वाला पूंजीपति।

    यह संपत्तिहरण स्वयं पूंजीवादी उत्पादन के अंतर्भूत नियमों के अमल में आने के फलस्वरूप पूंजी के केंद्रीयकरण के द्वारा संपन्न होता है। एक पूंजीपति हमेशा बहुत से पूंजीपतियों की हत्या करता है। इस केंद्रीयकरण के साथ-साथ या यूं कहिये कि कुछ पूंजीपतियों द्वारा बहुत से पूंजीपतियों के इस संपत्तिहरण के साथ अधिकाधिक बढ़ते हुये पैमाने पर श्रम प्रक्रिया का सहकारी रूप विकसित होता जाता है। प्राविधिक  विकास के लिए सचेतन ढंग से विज्ञान का अधिकाधिक प्रयोग किया जाता है, भूमि को उत्तरोत्तर अधिक सुनियोजित ढंग से जोता-बोया जाता है, श्रम के औजार ऐसे औजारों में बदलते जाते हैं, जिनका केवल सामूहिक ढंग से ही उपयोग किया जा सकता है, उत्पादन के साधनों का संयुक्त, समाजीकृत श्रम के साधनों के रूप में उपयोग करके हर प्रकार के उत्पादन के साधनों का मितव्ययिता के साथ इस्तेमाल किया जाता है, सभी कौमें संसारव्यापी मंडी के जाल में फंस जाती हैं और इसलिए पूंजीवादी शासन का स्वरूप अधिकाधिक अंतर्राष्ट्रीय होता जाता है। रूपांतरण की इस प्रक्रिया से उत्पन्न होने वाली समस्त सुविधाओं पर जो लोग जबर्दस्ती अपना एकाधिकार कायम कर लेते हैं, पूंजी के उन बड़े-बडे़ स्वामियों की संख्या यदि एक ओर, बराबर घटती जाती है, तो दूसरी ओर, गरीबी, अत्याचार, गुलामी, पतन और शोषण में लगातार वृद्धि होती जाती है। लेकिन इसके साथ-साथ मजदूर वर्ग का विद्रोह भी अधिकाधिक तीव्र होता जाता है। यह वर्ग संख्या में बराबर बढ़ता जाता है और स्वयं पूंजीवादी उत्पादन-प्रक्रिया का यंत्र ही उसे अधिकाधिक अनुशासनबद्ध, एकजुट और संगठित करता जाता है। पूंजी का एकाधिकार उत्पादन की उस प्रणाली के लिए एक बंधन बन जाता है, जो इस एकाधिकार के साथ-साथ और उसके अंतर्गत जन्मी है और फूली-फली है। उत्पादन के साधनों का केंद्रीयकरण और श्रम का समाजीकरण अंत में एक ऐसे बिन्दु पर पहुंच जाते हैं, जहां वे अपने पूंजीवादी खोल के भीतर नहीं रह सकते। खोल फाड़ दिया जाता है। पूंजीवादी निजी संपत्ति की मौत की घंटी बज उठती है। संपत्तिहरण करनेवालों का संपत्तिहरण हो जाता है। मार्क्स की पूंजी के प्रथम खंड नागरिक अंक १६ -३१ मई, २०१३ से साभार. 

  
साम्राज्यवादी अवस्था में पूँजीवाद  उत्पादन के पूर्णतम सामाजिकरण के द्वार पर आ  पंहुचता है, उत्पादन का चर्तित्र  सामजिक हो जाता है, पर हस्तगतकरण  निजी ही रहता है. लेनिन इस सन्दर्भ में लिखते है: 
"होड़(प्रतियोगिता)  बदलकर इजारेदारी बन जाती है. परिणामस्वरुप उत्पादन के समाजीकरण की दिशा में बड़ी प्रगति होती है. विशेष रूप से तकनीकी आविष्कारो और सुधारों की प्रक्रिया का समाजीकरण हो जाता है.

यह चीज बिखरे हुए और एक दुसरे से अनजान उन मालिको के बीच पुरानी खुली होड़ से बिलकुल भिन्न है, जो एक अनजानी मंडी  के लिए माल तैयार करते थे. सकेन्द्रण अब इस हद तक पहुच गया है कि किसी देश के या, जैसा कि आगे हम देखेगे , बहुत-से देशो के, यहाँ तक सारी दुनिया के कच्चे मालो के सभी स्रोतों का (जैसे लोहे के खनिज भंडारों का) मोटा मोटा तखमीना बनाया जा सकता है. न केवल ऐसे  तखमीने बनाए जाते है, बल्कि इन स्रोतों पर बड़े बड़े इजारेदार गठजोड़ अपना कब्ज़ा भी जमा लेते है. मंडी  के पैमाने का भी एक मोटा तखमीना बनाया जाता है और गठजोड़ उन्हें आपस में समझौता कर के "बाँट" लेते है. हुनरमंद मजदूरो पर एकाधिकार कर लिया जाता है, अच्छे से अच्छे इंजिनियर रख लिए जाते है,; परिवहन के साधनों पर कब्ज़ा कर लिया जाता है; अमेरिका में रेलों पर और यूरोप तथा अमेरिका में जहाजी कंपनियों पर. अपनी साम्राज्यवादी अवस्था में पूँजीवाद उत्पादन के पूर्णतम सामाजिकरण के द्वार पर आ पहुचता है, वह पूंजीपतियों को मानो उनकी मर्जी के विरुद्ध और अनजाने ही किसी नयी समाज –व्यवस्था में खीच लाता है, जो पूर्ण खुली होड़ से पुरे सामाजिकरण के बीच की संक्रमणकालीन  समाज-व्यवस्था होती है. 

उत्पादन सामजिक हो जाता है, पर उपभोग (हस्तगतकरण) निजी ही रहता है. उत्पादन के सामाजिक साधन कुछ लोगो की ही निजी संपत्ति बनी रहती है. रस्मी तौर से स्वीकृत खुली होड़ का मान्य ढांचा बना रहता है, और बाकी जनता पर  कुछ  थोड़े से इजरेदारो का जुआ सौ गुना भारी, अधिक तकलीफदेह और असह्य हो उठता है." (संकलित रचनाएँ खंड – ५, पेज २२७- २२८)'

इस तरह हमने विस्तार से देखा कि शोषण पर आधारित गैर-पूंजीवादी अर्थव्यवस्थाओ में श्रम और उत्पादन का चरित्र  सामजिक नहीं, बल्कि व्यक्तिगत, निजी था. जो कुछ भी व्यक्तिगत श्रम के आधार पर उत्पादन होता था, उस उत्पाद पर मालिकाना हक़ भी व्यक्तिगत था याने हस्तगत करण का स्वरुप व्यक्तिगत या निजी था. 

 
लेकिन आज स्थिति वैसी नहीं है. उत्पादन और श्रम का चरित्र तो पहले चरण में सामूहिक और फिर प्रगति के साथ सामजिक हो गया है लेकिन उसके उत्पाद पर मालिकाना हक़ सामजिक नहीं, बल्कि व्यक्तिगत या निजी ही बना हुआ है. पूंजीवादी उत्पादन का यही  बुनियादी अंतर्विरोध है जो संकट का बुनियादी  कारण है, जिसकी चर्चा स्तालिन ने इस लेख के आरम्भ में ही उद्धृत उद्धरण में किया है. 

 मार्क्स ने अपनी कालजयी रचना "पूँजी" में दिखया कि पूंजीवादी उत्पादन उत्पादन का विकास अंतरविरोधो से भरा है और उसका विकास इसी अंतरविरोधो के द्वारा होता है. पूँजीवाद अपने अंतरविरोधो का समाधान संकट के द्वारा ही करता है: मार्क्स ने कहा है:   

"संकट मौजूदा विरोधाभासों का क्षणिक, हिंसक समाधान से अधिक कभी कुछ नहीं रहा है,  हिंसक विस्फोट  जो कुछ समय के लिए अशांत संतुलन को पुनः स्थापित करता है. (Capital Vol. 3, chapter 15)
और भी,  
"विश्व व्यापार का  संकट पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के सभी विरोधाभासों का वास्तविक केन्द्रीयकरण और जबरन समायोजन के रूप में माना जाना चाहिए." (MECW Vol. 32 p. 140)
 

अगर संकट का बुनियादी कारण उत्पादन के सामजिक चरित्र और उत्पादन के परिणामो के हस्तगतिकरण के पूंजीवादी स्वरूप के बीच विरोधाभास में निहित है और  अगर इस संकट से निकलना है, समाज को आगे बढ़ना है तो इसका समाधान भी बिना इस बुनियादी अंतर्विरोध के समाधान के नहीं हो सकता याने उत्पादन के परिणामो के हस्तगतिकरण के पूंजीवादी स्वरूप को बदल कर सामजिक स्वरुप में बदले बिना नहीं हो सकता, याने उत्पादन के साधनों पर से निजी स्वामित्व की व्यवस्था को सामजिक स्वामित्व की व्यवस्था में बदले बिना नहीं हो सकता. सर्वहारा के महान शिक्षक और कार्ल मार्क्स के सहयोगी फ्रेडरिक एंगेल्स ने  बिलकुल ठीक ही कहा है:    
"उत्पादन के साधनों का सामजिक हस्तगतकरण न केवल उत्पादन के उपर लगे कृतिम प्रतिबन्ध को अपितु उत्पादक शक्तियों और उत्पादों  की सकारात्मक  बर्बादी और तबाही को भी  मिटा देता है जो आज वर्तमान समय में उत्पादन का एक अनियार्य  दुष्परिणाम है और जो संकट के समय अपने चरम पर पहुच जाता है." फे. एंगेल्स – समाजवाद काल्पनिक और वैज्ञानिक

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