Sunday, 18 April 2021

काल्पनिक समाजवाद की धाराएँ



लोकतना


काल्पनिक समाजवाद की धाराएँ


ग्यार्गी प्लेखानोव


अनुवाद और संपादन नरेश 'नदीम'




प्रकाशन संस्थान नयी दिल्ली-110002





एम के आजाद द्वारा 

कामगार-ई-पुस्तकालय के लिए

हिंदी यूनिकोड में रूपांतरित






विषय-सूची


यह रचना.                                    9


19वीं सदी का फ्रांसीसी काल्पनिक समाजवाद.                                  25


टिप्पणियाँ.                                   68


19वीं सदी का काल्पनिक समाजवाद 77


(अ) ब्रिटिश काल्पनिक समाजवाद     80


(ब) फ्रांसीसी काल्पनिक समाजवाद.  95


(स) जर्मन काल्पनिक समाजवाद    110


टिप्पणियाँ.                               119



यह रचना


29 नवंबर 1856 को रूस के तांबोव प्रांत के ग्राम गुदालोका में जन्मे ग्यार्गी वैलेंतिनोविच प्लेखानोव को अकसर 'रूसी मार्क्सवाद के पुरोधा के रूप में जाना जाता है। मार्क्स की मृत्यु के फौरन बाद के काल में, बल्कि एंगेल्स के जीवनकाला में ही, प्लेखानोव की गिनती पहली कतार के मार्क्सवादी विचारकों में की जाने लगी थी।


प्लेखानोव ने अभी नौजवानी की मंज़िल में कदम रखा ही था कि, उन दिनों के रूस के तमाम उन्नत विचार वाले व्यक्तियों की तरह, उनका झुकाव भी राजनीति की ओर गया। 1870 की दहाई के उत्तरार्ध में प्लेखानोव ने अपने क्रांतिकारी जीवन का आरंभ एक नरोदनिक समूह के सदस्य के रूप में किया और इसके चलते उनको, गिरफ्तार करके साइवेरिया भेजे जाने से बचने के लिए, भागकर पश्चिमी यूरोप जाना पड़ा जहाँ उनका अधिकांश समय जेनेवा (स्विट्जरलैंड) और जर्मनी में गुजरा।


प्लेखानोव की खुद पर लादी हुई इस जलावतनी का अंत 1917 में ही हुआ जब फ़रवरी 1917 की बुर्जुवा जनवादी क्रांति के बाद वे मार्च 1917 में, 35 साल की जलावतनी के बाद अपने वतन लौटे। यही वह समय था जब लेनिन और दूसरे बहुत से क्रांतिकारी भी पश्चिमी यूरोप से वापस अपने देश लौटे: जब लेनिन ने रूस को, जारशाही के दिनों के विपरीत, यूरोप का सबसे अधिक स्वतंत्र देश बतलाया था।


लेकिन 1905 की असफल रूसी क्रांति के दिनों से ही रूसी सामाजिक जनवाद के एक अग्रणी नेता के रूप में प्लेखानोव की प्रतिष्ठा लगातार गिरती आ रही थी. और नवंबर 1917 की समाजवादी क्रांति में भी उनकी कोई भूमिका नहीं रही। उनके विचार में यह क्रांति लेनिन और उनके नेतृत्वनाले  बोल्शेविकों  के दुस्साहसवाद के अलावा कुछ भी नहीं थी, और इसलिए उन्होंने उसका विरोध ही किया। जान रोड की मशहूरे-जमाना किताब दस दिन जब दुनिया हिल उठी में प्लेखानोव बस एक जगह आता है जब क्रांति-समर्थक कुछ सैनिक उनके घर पर


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पहुँचते हैं। यहाँ बीमारी की हालत में बिस्तर पर लेटे हुए प्लेखानोव की उन सैनिकों से बातचीत है तो बहुत ही संक्षिप्त, मगर उनके आखिरी दिनों में उनकी त्रासदी को अच्छी तरह उजागर करती है। प्लेखानॉव उन सैनिकों और बोल्शेविक पार्टी के दुस्साहसवाद की निंदा करते हैं तो एक सैनिक आगे बढ़कर उनसे कहता है कि उनका ज़माना अब जा चुका है; बेहतर है वे खामोश रहें।


लेकिन इस क्रांति के बाद प्लेखानोव बहुत दिनों तक जीवित नहीं रहे। क्रांति के कुल सात माह के अंदर, 30 मई 1918 के रोज़, फ़िनलैंड के तेरियोकी नामक स्थान पर प्लेखानोव का देहांत हो गया। (पहले फ़िनलैंड भी जार के साम्राज्य का भाग था और यहाँ जिस काल की बात चल रही है तब तक रूस से अलग नहीं हुआ था। फ़िनलैंड की स्वतंत्रता वास्तव में कम्युनिस्टों की देन थी और लिथुआनिया, सात्विया और एस्तोनिया की भी) मृत्यु के समय तक उन्होंने 60 साल की आयु भी पूरी नहीं की थी।


जैसा कि कहा गया, प्लेखानोव ने अपने क्रांतिकारी जीवन का आरंभ एक नरोदनिक के रूप में किया। ये नरोदनिक, आतंकवाद जिनकी कार्यनीति का सबसे प्रमुख तत्व था, मुख्यतः किसान वर्ग को ही अपना सामाजिक आधार समझते थे और उन्हीं के बीच सक्रिय थे। इसके अलावा उनका विश्वास था कि रूस का पूँजीवादी विकास की अवस्था से गुज़रना अनिवार्य नहीं है। वे समझते थे कि एक लंबे समय से देश के देहातों में जो सामूहिक संपत्ति चली आ रही थी उसी को नवजीवन देकर देश को पूँजीवादी विकास के चरण से गुज़रने से बचाया जा सकता है और सीधे समाजवाद की अवस्था तक पहुँचा जा सकता है। इसके विपरीत पी वी स्तुरवे आदि के नेतृत्व में तथाकथित 'कानूनी' मार्क्सवादियों का विचार था कि रूस में सामूहिक संपत्ति की व्यवस्था पर आधारित कम्यूनों का विनाश अवश्यंभावी है और यह कि देश को पूँजीवाद के चरण से गुज़रना और उससे जुड़ी हुई तमाम मुसीबतों और आर्थिक संकटों को झेलना ही पड़ेगा।


इसके विपरीत, पूँजी की पहली जिल्द (1857) का रूसी में अनुवाद करने वाले नरोदनिक बुद्धिजीवी निकोलाई दानियल्सन के नाम एक पत्र (10 अप्रैल 1879) में मार्क्स ने उन लोगों की कड़ी आलोचना की है जो उनके ऐतिहासिक विकास के सिद्धांत को समझे बिना उसे एक 'परा-ऐतिहासिक' (सुप्राहिस्टारिकल) सूत्र में बदल देते हैं। (हमारे देश में भी ऐसे लोगों की तादाद कुछ कम नहीं रही है जो आदिम साम्यवाद दास प्रथा-सामन्तवाद-पूँजीवाद-समाजवाद-साम्यवाद के फ़ार्मूले में आँख मूदकर यकीन करते रहे हैं। उनसे अगर पूछा जाता है कि 'साम्यवाद के बाद क्या?'


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तो वे एकाएक खामोश हो जाते हैं। साम्यवाद पर पहुँचकर इतिहास की गति ही समाप्त हो जाएगी, इसे वे स्वीकार करना नहीं चाहते, इसे मानते भी हों तो खुलकर कहना नहीं चाहते, और इस सवाल का कोई और जवाब भी मुमकिन है, यह बात उनकी चेतना में होती ही नहीं।)


 इसी पत्र में रूसी कम्यूनों के बारे में भी मार्क्स ने अपने विचार व्यक्त किए हैं। मार्क्स का सोचा-विचारा हुआ मत यह था कि इन कम्यूनों को आधार बनाकर रूस पूँजीवाद के चरण से कतराकर निकल सकता है और सीधे समाजवाद की मंज़िल में पहुँच सकता है, लेकिन इसके लिए कुछ बुनियादी दशाओं का मौजूद होना आवश्यक है, और सत्ता पर सर्वहारा की विजय इन दशाओं में सबसे महत्वपूर्ण दशा है। मार्क्स ने यही विचार वेरा जासुलिच के नाम अपने 8 मार्च 1881 के पत्र में तथा कम्युनिस्ट घोषणापत्र के रूसी अनुवाद की भूमिका (1882) में भी व्यक्त किए हैं। 


मार्क्स का यही नज़रिया आगे चलकर 'विकास का गैर-पूँजीवादी रास्ता' जैसी महत्त्वपूर्ण धारणा का आधार बन गया और मंगोलिया आदि की मिसालों में इस धारणा को व्यवहार में परखा भी गया। यह और बात है कि इस धारणा को ठीक-ठीक समझे बगैर कुछ लोगों ने इसे बस तोते की तरह रटा और मनमाने ढंग से इस्तेमाल किया।


मार्क्स के ये पत्र और उनमें व्यक्त विचार आगे चलकर रूसी मज़दूर आंदोलन के लिए बुनियादी अहमियत वाले दस्तावेज़ साबित हुए।


इसका कारण बहुत सीधा-सा है। मार्क्स के जीवनकाल में ही उनकी कई एक रचनाएँ रूसी क्रांतिकारियों के बीच गौर से पढ़ी जाती थीं और वे उन पर तीखी बहसें करते रहते थे। जैसा कि कहा गया, पूँजी की पहली जिल्द के रूसी अनुवादक निकोलाई दानियल्सन एक नरोदनिक ही थे। मार्क्स की जो बात रूसी नरोदनिकों को बेहद पसंद आई वह थी पूँजीवादी व्यवस्था और उसके मनुष्य को पतित बनाने वाले प्रभावों के बारे में मार्क्स द्वारा अपनी रचनाओं में की गई तीखी आलोचना। लेकिन एक बात यहाँ माननी ही पड़ेगी, हालाँकि यहाँ इसके विस्तार में जाना संभव नहीं है। रूसी नरोदनिक, मार्क्स के विपरीत, पूँजीवाद को एक शुद्ध रूप से घटिया व्यवस्था मानते थे। सामंतवाद के मुक़ाबले पूँजीवाद की जिस प्रगतिशील (बल्कि क्रांतिकारी) भूमिका को मार्क्स ने, मिसाल के लिए कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र (1848) के पहले ही अध्याय में, रेखांकित किया है, वह गोया इन नरोदनिकों के लिए कोई अस्तित्वहीन वस्तु थी। जोसेफ शुंपीटर जैसे मार्क्सवाद-विरोधी अर्थशास्त्री तक को यह बात माननी पड़ी कि पूँजीवाद की जितनी 'तारीफ़' मार्क्स ने की है, उतनी तो किसी पूँजीवादी अर्थशास्त्री ने नहीं की है। (हिंदी अनुवाद में शुपीटर की पुस्तक दस महान अर्थशास्त्री देखें जिसमें पहला ही अध्याय मार्क्स के बारे में है।) यह अलग बात है कि शुंपीटर की यह बात भी अधिक नहीं तो उतनी अनैतिहासिक


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अवश्य है जितनी नरोदनिकों की थी।


कारण कि सवाल यहाँ न तो पूँजीवाद की प्रशंसा का है और न उसकी निंदा का। मार्क्स और एंगेल्स ने घोषणापत्र में पूँजीवाद के बारे में जो कुछ भी कहा है वह उनके गंभीर ऐतिहासिक विश्लेषण का परिणाम था और यह विश्लेषण पूँजीवाद की पूरी ऐतिहासिक प्रक्रिया का विश्लेषण है; यह उसके जन्म से लेकर उसके विकास और फिर उसका अंत करने वाली ताक़तों का विश्लेषण है। कहने का यह मतलब हरगिज़ नहीं कि तथाकथित वस्तुनिष्ठता का दावा करनेवाले पूँजीवादी समाजविज्ञानियों की तरह मार्क्स भी 'निष्पक्ष' थे। लेकिन पूँजीवाद के पक्ष या विपक्ष में खड़े होने का सवाल इस ऐतिहासिक विश्लेषण से पहले नहीं आता; इसके बाद आता है। मार्क्स ने पूँजीवाद के प्रति जो रुख अपनाया, वह इसी विश्लेषण का परिणाम है। वास्तव में जिस चीज़ को शुंपीटर ने मार्क्स द्वारा पूँजीवाद की प्रशंसा कहा है, वह पूँजीवाद की ऐतिहासिक प्रक्रिया के सिर्फ़ आरंभिक चरण का बयान है।


दूसरी ओर नरोदनिकों ने मार्क्स के यहाँ पूँजीवाद की सिर्फ़ निंदा ही देखी; उन्हें भी इसमें कोई ऐतिहासिक विश्लेषण नज़र नहीं आया। या फिर यूँ कह लें कि उन्होंने पूँजीवाद के बारे में मार्क्स के विश्लेषण का उपयोग अपने तपते हुए दिलों पर पानी के छींटे देने के लिए किया; उससे कुछ सीखने की जहमत उन्होंने गवारा नहीं की। वैसे यह बात आम तौर पर मानी जाती है कि 19वीं सदी की आखिरी और 20वीं सदी की पहली चौथाई के दौरान रूस में, जहाँ तक अर्थशास्त्रीय ज्ञान और विश्लेषण का सवाल था, नरोदनिकों जैसा स्थिरप्रज्ञ कोई और समूह शायद था भी नहीं।


फिर भी अगर नरोदनिक मार्क्स की रचनाओं को गौर से पढ़ते और उन पर बहसें करते थे तो इसका लाज़मी तौर पर यही नतीजा निकला कि इन्हीं नरोदनिकों में से कुछ लोगों ने नरोदवाद की सीमाओं को पहचाना, उसकी कमजोरियों को जाना और उससे अलग हो गए। रूस में मार्क्सवाद को अपने प्रारंभिक समर्थक ऐसे ही नरोदनिकों में से मिले।


इन्हीं नरोदनिकों में एक नाम ग्यार्गी वैलेंतिनोविच प्लेखानोव का था। यह मानने का हमारे पास आधार है कि 1878 तक प्लेखानोव नरोदनिकों की संगत छोड़कर मार्क्सवादियों के साथ आ चुके थे जिनकी तादाद यूरोप, अमरीका में तब कुल मिलाकर शायद 200 से अधिक नहीं रही होगी। नरोदनिकों के मुक़ाबले प्लेखानोव ने राजनीतिक आतंकवाद को नकारा और किसानों की बजाय मज़दूर वर्ग की क्रांतिकारी क्षमताओं को रेखांकित करना आरंभ किया, हालाँकि किसान वर्ग के प्रति उनका रुख तब तक बहुत स्पष्ट न सही, नकारात्मक तो नहीं ही था। इसी के साथ उन्होंने ऐतिहासिक साक्ष्यों, दस्तावेज़ों, आँकड़ों और तर्कों आदि के सहारे रूसी किसानों के कम्यूनों के बारे में ठीक उसी विचार को पुष्ट किया जिसे दानियल्सन


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के नाम अपने पत्र में मार्क्स पहले ही व्यक्त कर चुके थे। 1882 में कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र का रूसी अनुवाद प्रकाशित हुआ जो प्लेखानोव का किया हुआ था; इसकी भूमिका खुद मार्क्स और एंगेल्स ने लिखी थी। इसी भूमिका में मार्क्सवाद के संस्थापकों ने पहली बार यह संकेत दिया था कि क्रांति का केंद्र पश्चिमी यूरोप से खिसककर पूरब की ओर चला गया है:  जार "आज गातचिना में क्रांति का युद्ध-बंदी है और रूस यूरोप में क्रांतिकारी कार्यकलाप का हिरावल है।" यहाँ मार्क्स और एंगेल्स का इशारा समाजवादी नहीं बल्कि जनवादी क्रांति की ओर था, लेकिन ये बहुत पहले ही इस निष्कर्ष पर पहुँच चुके थे कि मजदूर वर्ग का नेतृत्व हो तो जनवादी क्रांति का समाजवादी क्रांति में सुचारू रूप से संक्रमण हो सकता है।


नरोदवाद से संबंध-विच्छेद के बाद प्लेखानोव की सबसे महत्त्वपूर्ण रचना हमारे मतभेद थी जो 1885 में प्रकाशित हुई थी। आज से 118 साल पहले प्रकाशित इस रचना में यूँ तो बहुत कुछ ऐसा है जिसका सीधा-सीधा संबंध कुछ विशेष घटनाओं, विशेष परिस्थितियों और विशेष व्यक्तियों से है, लेकिन इसका महत्त्व सिर्फ़ ऐतिहासिक नहीं है। पुस्तक में प्लेखानोव ने जिस तरह से कुछेक ऐतिहासिक, अर्थशास्त्रीय और राजनीतिक प्रश्नों की विवेचना की है, वह आज भी बहुत-सी बातों को स्पष्ट करने, बहुत से भ्रमों को दूर करने में उपयोगी है।


इसके बाद, इतिहास के प्रति एकसत्तावादी दृष्टिकोण का विकास, भौतिकवाद का इतिहास, एन जी चेनशेव्स्की, इतिहास में व्यक्ति की भूमिका, जुझारू भौतिकवाद, मार्क्सवाद की बुनियादी समस्याएँ, कला और सामाजिक जीवन, असंबोधित पत्र आदि प्लेखानोव की प्रमुख रचनाओं में शामिल हैं। मार्क्स और एंगेल्स की रचनाओं के रूसी अनुवाद करने/ कराने में भी उनका अमूल्य योगदान रहा है।


सक्रिय राजनीति के क्षेत्र में अपनी गलत समझ और गलतियों के बावजूद सिद्धांत के क्षेत्र में प्लेखानोव की भूमिका असंदिग्ध रूप से महत्वपूर्ण रही है। चाहे बर्नस्टाइन और कोनराड श्मिट का संशोधनवाद रहा हो, रूस के 'क़ानूनी' मार्क्सवादी या नरोदनिक रहे हों, इस या उस विचारक से मार्क्सवाद को समन्वित करने के प्रयास रहे हों, नव-कांटवाद या माखवाद का हमला रहा हो या इसी तरह की कोई और विजातीय प्रवृत्ति रही हो, मार्क्सवादी दर्शन की शुद्धता की रक्षा हमेशा प्लेखानोव की पहली प्राथमिकता रही। 


प्लेखानोव के साथ एक बात और भी थी, और अगर हमारे बुद्धिजीवी (1) इससे कुछ सीख सकें तो इससे बेहतर कोई बात नहीं होगी। अपने बुद्धिजीवीवृंद का पूरा-पूरा सम्मान करते हुए हम उन्हें मीमांसा-दार्शनिक कुमारिल भट की यह बात याद नहीं दिलाएँगे कि कुछ लोग अपनी मूढ़ता को छिपाने के लिए जानबूझकर क्लिष्ट भाषा का सहारा लेते हैं; लाला (मुँह से टपकने वाली लार) जैसे एक आसान संस्कृत शब्द की जगह एक क्लिष्ट शब्द वक्त्रासव लिखते हैं। यहाँ हम इस सच्चाई की


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भी याद नहीं दिलाएंगे कि कठिन भाषा लिखना कम कठिन तथा आसान भाषा लिखना कम आसान होता है। अपने बुद्धिजीवियों के प्रति अपने विनीत आदर-भाव के कारण हम यह भी नहीं कहेंगे (हालांकि यह हमारी सोची-विचारी राय है) कि क्लिष्ट भाषा के सहारे एक लेखक पाठक को थोड़ी देर के लिए आतंकित भले ही कर ले, पाठक ऐसे लेखक को कुछ समय बाद विस्मृति के कूड़ेदान में ज़रूर फेंक देता है। हम तो बस एक बात जानते हैं - यह कि भाषा आसान होगी या मुश्किल होगी, इसका दारोमदार बस एक प्रश्न के उत्तर पर होता है : लेखक को किसी तक अपनी बात पहुँचानी है या फिर कथित रूप से बुद्धिजीवी कहलाने के लिए अपनी कथित प्रबुद्धता की कथित रूप से अभिव्यक्ति करनी है? सही बात तो यह है कि एक लेखक की जब अपनी समझ स्पष्ट नहीं होती, जब उसके दिमाग में मकड़जाल होता है तो उसका कलम अनायास ही कागज़ पर उस मकड़जाल की तस्वीर उभार देता है।


शुक्र है कि प्लेखानोव इस प्रकार के 'बुद्धिजीवी' नहीं थे। प्लेखानोव ने दर्शनशास्त्र जैसे गूढ़ और नीरस विषय पर भी क़लम चलाया है, मगर हमें उनकी बात समझने में कहीं कोई दुश्वारी नहीं आती। विषय का बस मामूली-सा परिचय हो तो भी पाठक प्लेखानोव के साथ आसानी से अपना सफ़र जारी रख सकता है, बशर्ते कि अनुवादक बीच में बाधक न हो और 'मार्क्सवाद के परचम तले' या 'मार्क्सवाद के झंडे तले' की जगह 'मार्क्सवाद के ध्वजांतर्गत' न लिखने लगे या 'पीला पिशाच' अनुवादक को दिमागी पीलिया का शिकार बनाकर उससे 'पांडुर पिशाच' न लिखवाने लगे। कला के बारे में शार्ल बादलियर जैसे कई एक व्यक्तियों की राय थी (कइयों की आज भी है) कि एक नज्म या कहानी जितने ही अधिक लोगों की समझ में आ जाए उसे उतनी ही घटिया समझना चाहिए। इस मानदंड से देखें तो प्लेखानोव एक निहायत 'घटिया' लेखक हैं, और उनके 'घटियापन' पर नाज़ करना हमारे अपने 'घटियापन' का सुबूत है।


क्रांतिकारी कार्यनीति के सवाल पर अपने तमाम मतभेदों के बावजूद मार्क्सवादी दर्शन की शुद्धता की रक्षा के सिलसिले में प्लेखानोव की भूमिका को लेनिन ने साफ़ तौर पर पहचाना था। कहते हैं: “ अंतर्राष्ट्रीय सामाजिक जनवादी आंदोलन में सुसंगत द्वंद्ववादी भौतिकवाद के दृष्टिकोण से संशोधनवादियों की हेरानकुन घिसी-पिटी बातों की आलोचना करनेवाले एकमात्र मार्क्सवादी प्लेखानोव थे।” (कलेक्टेड वर्क्स, जिल्द 15, पृ. 38 देखें।)


प्रसंगवश, जहाँ ऐतिहासिक भौतिकवाद की शब्दावली का प्रयोग सबसे पहले एंगेल्स ने समाजवाद: काल्पनिक और वैज्ञानिक की भूमिका में किया था, वहीं द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की शब्दावली प्लेखानोव की देन हैं; उन्होंने इसका प्रयोग इतिहास के प्रति एकसत्तावादी दृष्टिकोण का विकास (1894) में किया था।


प्लेखानोव के निधन के कुछ ही समय बाद लेनिन ने कहा था "...यहाँ मैं


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नौजवान पार्टी सदस्यों के लाभ के लिए कोष्ठक में इतनी बात जोड़ दूँ कि प्लेखानोव की तमाम दार्शनिक रचनाओं का अध्ययन -और मेरा मतलब है अध्ययन- किए बगैर आप एक सच्चे, प्रबुद्ध कम्युनिस्ट बनने की आशा नहीं कर सकते, क्योंकि दुनिया में कहीं भी मार्क्सवाद के बारे में उनसे बेहतर कुछ नहीं लिखा गया है।"


(कलेक्टेड वर्क्स, जिल्द 32, पृ. 94 देखें; ज़ोर लेनिन का ।) कहीं दूर जाने की ज़रूरत नहीं प्रस्तुत पुस्तक खुद ही लेनिन की बात की सच्चाई का पूरा-पूरा सुबूत दे देगी।


प्रस्तुत पुस्तक प्लेखानोव के दो लेखों का संग्रह है। मास्को के मिर प्रकाशन गृह ने जून 1911 में प्लेखानोव से फ्रांस में सामाजिक कल्पनावादी सिद्धांतों और जर्मनी में हेगेलवाद और उसके विभिन्न रूपों का विकास' विषय पर एक लेख लिखने का आग्रह किया था। यह प्रकाशन गृह 19वीं सदी में पश्चिमी साहित्य का इतिहास शीर्षक से कई जिल्दों वाली एक पुस्तक के प्रकाशन की योजना बना रहा था, और प्लेखानोव का लेख इसी ग्रंथ की किसी जिल्द में शामिल किया जानेवाला था।


1912 के आरंभिक महीनों में किसी समय प्लेखानोव ने लेख तैयार करके मिर प्रकाशन गृह को भेज दिया, मगर प्रकाशकों ने इस आग्रह के साथ लेख उनके पास वापस भेज दिया कि उसे कुछ और छोटा कर दिया जाए। तब प्लेखानोव ने इसे पत्रिका सोब्रेमेन्नी मिर के अंक 6 और 9 (1918) में प्रकाशित करा दिया। यहाँ संकलित '19वीं सदी का फ्रांसीसी काल्पनिक समाजवाद' इसी लेख का शीर्षक है। मिर प्रकाशन गृह की प्रस्तावित योजना के लिए उन्होंने दो नये लेख लिखे। इनमें से एक लेख '19वीं सदी का काल्पनिक समाजवाद' ही प्रस्तुत पुस्तक में संकलित दूसरा लेख हैं; इसे प्लेखानोव ने अगस्त-सितंबर 1913 में लिखा था और यह मिर प्रकाशन गृह के प्रस्तावित ग्रंथ की दूसरी जिल्द में शामिल किया गया था। दूसरा लेख, जिसे यहाँ शामिल नहीं किया गया है, 'विचारवाद से भौतिकवाद तक' था जिसे प्लेखानोव ने 1915 के आरंभ में पूरा किया था और जिसे मिर प्रकाशन गृह ने प्रस्तावित ग्रंथ की चौथी जिल्द में प्रकाशित किया था।


प्लेखानोव की बहुत सी छोटी या बड़ी रचनाओं की तरह इन लेखों की भी अनकही मान्यता यही है कि मार्क्सवाद की गंभीर समझ के लिए उन धाराओं का गंभीर अध्ययन आवश्यक है जिनका मार्क्सवाद के जन्म और विकास में योगदान रहा है। जैसा कि एंगेल्स ने और आगे चलकर लेनिन ने दिखाया, क्लासिकी जर्मन दर्शनशास्त्र (हंगेल, फायरबाख), ब्रिटिश अर्थशास्त्र (एडम स्मिथ, डेविड रिकार्डो आदि) और फ्रांसीसी समाजवादी सिद्धांत (शार्ल फूरिये, सेंत-साइमन और ब्रिटेन के राबर्ट


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. ओवेन) मार्क्सवाद के बुनियादी स्रोत रहे हैं। अपने एक छोटे से लेख 'मार्क्सवाद के तीन स्रोत और तीन घटक' में लेनिन ने यही बात दिखलाई। उनसे पहले एंगेल्स ने इयूहरिंग मत-खंडन में यूगेन ड्यूहरिंग के खिलाफ़ शास्त्रार्थ (पोलेमिक) करते हुए यही दिखाया। वास्तव में इस पुस्तक के तीन भागों का संबंध जर्मन दर्शन, ब्रिटिश अर्थशास्त्र और फ्रांसीसी समाजवाद से ही है। कुछ ही समय बाद एंगेल्स ने इसी ग्रंथ के तीन अध्यायों में थोड़ा फेरबदल करके, एक नयी भूमिका के साथ अलग से प्रकाशित कराया था; इसी पुस्तिका को आज हम समाजवाद काल्पनिक और वैज्ञानिक नाम से जानते हैं।


लेकिन जहाँ मार्क्स पूँजी की दूसरी ओर तीसरी जिल्दों में ही उलझे हुए थे, वहीं मार्क्सवादी विचारधारा के प्रसार-प्रचार के लिए एंगेल्स ने जो कुछ भी किया वह अपने आपमें मूल्यवान होते हुए भी पर्याप्त नहीं था। उदाहरण के लिए एंगेल्स के यहाँ जहाँ मुख्यतः हेगेल और फायरबाख के दर्शन की ही विवेचना मिलती है, वहीं क्लाउद आद्रिएन हेल्वेतियस (1715-1771) और पाल हेनरी होलबाख (1723-1789) की कोई खास विवेचना नहीं मिलती जिनका आधुनिक भौतिकवाद के विकास में प्रत्यक्ष योगदान रहा है। इसी तरह मार्क्स के समकालीन जोसेफ डिएल्ज़गेन (1828-1888) के बारे में खुद एंगेल्स ने एक जगह लिखा है कि वे मार्क्स से स्वतंत्र रूप से द्वंद्वात्मक भौतिकवादी दर्शन पर पहुँचे हालाँकि उनके यहाँ इस दर्शन की वह समृद्ध प्रस्तुति देखने को नहीं मिलती जैसी मार्क्स के यहाँ मिलती है। लेकिन एंगेल्स की अपनी ही व्यस्तताएँ थीं जो मार्क्स की मृत्यु के बाद और भी गंभीर हो गई, और इसलिए उनके यहाँ डिएल्ज़गेन के बारे में इससे अधिक हमें कोई खास जानकारी नहीं मिलती। इसी तरह एंगेल्स की पुस्तिका समाजवाद: काल्पनिक और वैज्ञानिक में कुल जमा तीन समाजवादी विचारकों का हवाला मिलता है जो मार्क्स के अग्रगामी थे, ये हैं राबर्ट ओवेन, सेंत-साइमन और शार्ल फूरिये। तो क्या काल्पनिक समाजवाद इन्हीं तीन विचारकों तक सीमित था? मार्क्स के समकालीनों में एक नाम बार-बार आता है-विल्हेल्म वाइटलिंग (1808-1871) का नाम, जो मार्क्स से मिलने कई बार आए और दोनों के बीच कई-कई रातों तक विचार-विमर्श होता रहा। लेकिन वाइटलिंग के विचार क्या थे, इसका हमें पता नहीं चलता। मार्क्स और एंगेल्स की रचनाओं में लुई ब्लांक (1811-1882) का भी जिक्र आता है और लुई आगस्त ब्लांकी(1805-1881) का भी। फिर जोसेफ पियरे प्रूदों (1809-1865) का कहना ही क्या मगर इन सबके विचारों की चर्चा कुछ खास नहीं मिलती। 


यही कमी थी जिसे ग्यार्गी प्लेखानोव ने एक बड़ी हद तक पूरा किया। विशेष रूप से दर्शन और समाजवादी सिद्धांतों के बारे में उन्होंने जो कुछ लिखा है, वह न सिर्फ़ हमारी जिज्ञासा को शांत करता है बल्कि हमें नयी राहें भी दिखाता है। दर्शन के क्षेत्र में प्लेखानोव वे पहले मार्क्सवादी थे जिन्होंने भौतिकवादी दर्शन के विकास


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में हेल्वेतियस, होलबाख और देनिस दिदेगे (1713-1784) के योगदान को पूरी तरह उभारकर सामने रखा और मार्क्सवाद से इन विचारकों का संबंध बड़े स्पष्ट ढंग से स्थापित किया। इतना ही नहीं, प्लेखानोव अगर अंधराष्ट्रवादी नहीं थे तो पश्चिम के अंधे नक़्क़ाल भी नहीं थे और भौतिकवाद के इतिहास को प्रस्तुत करते हुए उन्होंने रूसी भौतिकवादियों जैसे अलेक्सांद्र इवानोविच हजैन (1812-1870), निकोलाई अलेक्सांद्रोविच द्रोब्रोल्यूबोव (1886-1861) और सबसे बढ़कर निकोलाई गाविलोबिच चेनशेव्स्की (1828-1889) के योगदान को या पश्चिमी यूरोप के भौतिकवादियों से इन विचारकों के संबंध को, आँखों से ओझल नहीं होने दिया। चेनशेस्की के बारे में तो उन्होंने बड़े स्पष्ट ढंग से दिखाया है कि वे किस प्रकार लुडविग फायरबाख के सच्चे उत्तराधिकारी थे।


प्रस्तुत पुस्तक में शामिल लेख भी इसी श्रेणी में आते हैं। मार्क्स के अग्रगामी तीन समाजवादी विचारकों के बारे में एंगेल्स ने जो कुछ लिखा है, उसकी अहमियत अपनी जगह मुसल्लम है। मगर ये तीनों अध्याय एक विशेष फार्मेट में, अर्थात् यूगेन ड्यूहरिंग के साथ एक शास्त्रार्थ के फार्मेट में लिखे गए थे और इस तरह के फॉर्मेट की अपनी सीमाएँ होती हैं। एंगेल्स भी ड्यूहरिंग मत-खंडन में उतनी ही बातों तक सीमित रहे जितनी ड्यूहरिंग का जवाब देने के लिए आवश्यक थीं। एंगेल्स ने सिर्फ तीन समाजवादी विचारकों की चर्चा की, तो इसका एक कारण यह भी था।


प्लेखानोव के यहाँ संकलित दोनों लेख भी, इस अर्थ में, इसी गंभीर कमी को पूरा करने के प्रयास हैं, और इनके महत्त्व से इनकार नहीं किया जा सकता। इन लेखों में प्लेखानोव ने न सिर्फ मार्क्स से पहले के समाजवादी विचारकों के मतों को विस्तार से प्रस्तुत किया है, बल्कि उन्होंने ऐसे विचारकों को भी अपनी प्रस्तुति में शामिल किया है जिनका मार्क्स और एंगेल्स की रचनाओं में या तो संक्षिप्त उल्लेख ही मिलता है या वह भी नहीं मिलता। इन विचारकों की एक छोटी-सी सूची ही इस दिशा में प्लेखानोव के योगदान को स्पष्ट करने के लिए काफ़ी है-सबैक्यू बाज़ेयर, लुई ब्लांक, लुई आगस्त ब्लांकी, जान फ्रांसिस , ब्यूख्नर, काबे, कोसिदरों, देज़ामी, एडमंड्स, इनफृतिन, गाडविन, जान ग्रे, चार्ल्स हाल, हारिस्कन, पियरे लेंगे, प्रूदों, रेनो, रोडबर्टस, वाइटलिंग, वगैरह-वगैरह। जाहिर है कि एंगेल्स ने जिन तीन विचारकों की चर्चा की है उन्हें हमने इस सूची में शामिल नहीं किया है हालांकि ये भी प्लेखानोव की विवेचना के विषय हैं।


पुस्तक चूँकि आपके हाथों में है, हम इसकी विषय-वस्तु की कोई विस्तृत चर्चा नहीं करेंगे। मगर एक बात हम ज़रूर कहना चाहेंगे। वर्ग संघर्ष के प्रति इन समाजवादी विचारकों के विरोध और राजनीति से उनकी विरक्ति की जहाँ प्लेखानोव ने विस्तृत विवेचना की है और इन विचारकों की कमियों और कर्मजोरियों की ओर इशारा किया है (निश्चित ही कुछ अपवाद भी हैं और प्लेखानोव ने उन पर भी समुचित ध्यान


काल्पनिक समाजवाद की धाराएँ / 17

दिया है। उत्तों अर्थात् ज्ञानिक समाजवाद के विकास इयों के महत्व को तथा भक्ति से उनके संबंध को पूरी 9. Yo Rant - या है। मिसाल के लिए वे एक जगह (प्रस्तुत पुस्तक में


इन विचारों का अध्ययन करते समय अनायास और अकसर हमें उस सिद्धांत की याद आती है जो आगे चलकर अस्तित्व में आया और ऐतिहासिक भौतिकवाद के नाम से जाना गया। ये विचार इस सिद्धांत के विस्तृत निरूपण के लिए बिना बहुमूल्य सामग्री थे।


यहाँ हमेला शहीद भगतसिंह की एक बात याद आती है। लाला रामसरन पाटों के तिकारी थे जिनको पहले लाहौर साजिश मुकदमे (1915-16) में फांसी की सजा मिली थी जिसे बाद में उम्रकैद में बदल दिया गया था। जेल में रहते हुए उन्होंने अंग्रेजी में एक काला पुस्तक को रचना ड्रीमलैंड शीर्षक से की भी जिसमें उन्होंने अपने सपनों की दुनिया के बारे में अपने विचार व्यक्त किए थे। से पहले अंडमान तुलर जेल में थे पर बाद में लाहौर सेंट्रल जेल में पहुंचा दिए गए थे। दूसरे लाहौर साजिश मुकदमे (1929-30) में जब फाँसी की सजा पाकर भगतसिंह इस जेल में पहुंचे तब लाला रामसरन दास ने भगतसिंह से आग्रहपूर्वक अपनी पुस्तक की भूमिका लिखवाई थी। यह भूमिका, जिसमें भगतसिंह क्रांतिकारी आंदोलन के लिए सपनों के महत्व की चर्चा करते हैं, पड़ने से ताल्लुक रखती है। भगतसिंह इसमें एक जगह कहते हैं


आखिर में उनकी (लाला रामसरनदास की संपादक) शायरी का सबसे अहम हिल्सा आता है जहाँ उन्होंने भविष्य के उस समाज की बात की है जिसका निर्माण हम सब करना चाहते हैं। लेकिन में शुरू में ही एक बात स्पष्ट कर देना चाहता हूँ। 'स्वप्नलोक' एक सचमुच का कल्पनालोक है। लेखक ने शीर्षक में ही बहुत साफदिली के साथ इस बात को स्वीकार कर लिया है। वे इस विषय पर कोई वैज्ञानिक प्रबंध ग्रंथ लिखने का दावा नहीं करते। शीर्षक ड्रीमलँड ही उसे काफी कुछ स्पष्ट कर देता है। लेकिन इसमें शक नहीं कि कल्पनालोक भी सामाजिक प्रगति में एक बहुत ही अहम भूमिका निभाते हैं। संत-साइमन, फूरिये और राबर्ट ओवेन के बिना और उनके सिद्धांतों के बिना कोई वैज्ञानिक, भावसंवादी समाजवाद भी नहीं होता। लाला रामसरनदास के कल्पनालोक को भी ऐसा ही स्थान प्राप्त है। जब हमारे कार्यकर्ता अपने आंदोलन के दर्शन को व्यवस्थित करने का और आंदोलन के लिए एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण तय


18 / काल्पनिक समाजवाद की धाराएँ

करने का महत्व समझेंगे, तब यह पुस्तक उनके लिए बहुत उपयोगी साबित होगी।


-शिव वर्मा (संपादक), सेलेक्टेड राइटिंग्स आफ़ शहीद भगतसिंह, पहला अंग्रेजी संस्करण, 1986, पृ. 120-21, जोर हमारा।


इसीलिए अगर प्लेखानोव  फूरिये के प्रति-व्हलो,  प्रति-शाकों, प्रति सिंहों आदि का जिक्र करते हैं और फिर यह बतलाते हैं कि फूरिये के अनुसार भावी समाज में एक प्रति-सिंह पर सवार होकर एक व्यक्ति पेरिस में नाश्ता करके चलेगा तो  ल्योन्स में दोपहर का भोजन और मार्सेइलीज़ में रात का भोजन करेगा, तो वे किसी भी ढके या खुलै ढंग से फूरिये का मज़ाक नहीं उड़ाते। उससे पहले एंगेल्स ने भी फूरिये की चर्चा बड़े सकारात्मक अंदाज़ में की थी, यहाँ तक कि ये परिवार, व्यक्तिगत संपत्ति और राजसत्ता की उत्पत्ति की आखिरी टिप्पणी में 'सभ्यता' के बारे में फूरिये की प्रतिभापूर्ण समालोचना की बात करते हैं जिसकी विवेचना के बारे में उन्हें अफ़सोस है कि 'दुर्भाग्यवश इसके लिए समय मैं नहीं निकाल सकूँगा।' और सच पूछिए तो फूरिये की इस कल्पना में कुछ भी असंभव नहीं है। समाज में अगर संपत्ति संबंधी असमानताएँ नहीं तो क्या अपने आपमें, यह बात हमारे लिए असंभव है कि हम देहली में नाश्ता करके चलें, मुंबई में दोपहर का भोजन करें और रात की शिलांग में आराम फरमाएँ?


सच पूछें तो दुनिया की कोई भी क्रांति ऐसी नहीं जो किसी न किसी सपने से प्रेरित न रही हो। फूरिये के अग्रगामियों में एक बहुत ही प्रमुख नाम वाल्तेयर (1694-1778) का है जिनके एकमात्र उपन्यास का शीर्षक कांदीद है। उपन्यास में इसी नाम का नायक एक ऐसे अजीबोगरीब लोक में जा पहुंचता है जिसे   वाल्तेयर ने अल-दोरोदो नाम दिया है, इसी के बाद यह नाम इहलौकिक स्वर्ग का पर्याय बन गया। यह वह लौक है जहाँ कांदीड दिखता है कि बच्चे सोने के कचों से खेल रहे है और खेल से मन भर जाता है तो ये लापरवाही से एक किनारे फेंककर घर चले जाते हैं। जिन सोने-चाँदी-हीरों के लिए यूरोपवाले आपस में एक दूसरे का खून बहा रहे हैं, वे ही चीजें यहाँ चारों तरफ बिखरी पड़ी है और कोई पूछनेवाला तक नहीं। और तो और अल-दोरेदी का मुखिया कांदीद और उसके साथी से कहता है-तुम इन बेकार पत्थरों की बात कर रहे हो! अरे, जितने ले जा सकते हो, उठा ले जाओ।


यह सच है कि फ्रांस की 1789 की क्रांति ने जनता के उन सपनों को पूरा नहीं किया जिनको इस उपन्यास में वाल्तेयर ने वाणी दी थी। लेकिन क्या हम यह बात कह सकते हैं कि इस क्रांति को जन्म देने में इन सपनों की कोई भूमिका नहीं थी?


क्या करे? में लेनिन साफ तौर पर कहते है: "सपने हमे देखने चाहिए।"


काल्पनिक समाजवाद की धाराएँ/19



और कुछ नहीं तो बस इसलिए भी कि दिल बैठ न जाए, रूह मुर्दा न हो जाए। बक़ौल 'साहिर' लुधियानवी- 


आओ कि कोई ख्वाब बुनें कल के वास्ते वरना ये रात आज के संगीन दौर की 

डस लेगी जानो-दिल को कुछ ऐसे कि जानो-दिल 

ताउम्र फिर न कोई हसीं ख्वाब बुन सकें।


काल्पनिक समाजवाद का दौर भी ऐसे ही स्वप्नदर्शियों का दौर था जिन्होंने अपनी तमाम खामियों के बावजूद, घोर अँधेरे में भी इंसान के लिए उम्मीद की ज्योत जगाए रखी।


काल्पनिक समाजवादियों में यहाँ हम राबर्ट ओवेन का विशेष रूप से उल्लेख करना चाहेंगे। प्रायः कुछ लोग जिनमें वामपंथ-विरोधी ही नहीं, कुछ वामपंथ के हमदर्द भी शामिल होते हैं, यह ताना मारते हैं (या शिकायत करते हैं) कि अगर आप गरीबों के, मज़दूरों और किसानों के सचमुच शुभचिंतक है तो पहले अपनी संपत्ति उनमें बाँट क्यों नहीं देते। इस तरह के जुमलों के पीछे मंशा चाहे जो भी हो, इनके पीछे एक मान्यता यह मौजूद है कि अगर सभी लोग अपनी-अपनी संपत्ति को समाज के हवाले कर दें तो पूँजीवादी सामंती व्यवस्था को बदले बिना, इस व्यवस्था के अंदर ही समाजवाद को साकार करना संभव है। राबर्ट ओवेन की मिसाल यहाँ हमें बहुत ही प्रासंगिक और शिक्षाप्रद दिखाई देती है।


जैसा कि आप प्रस्तुत पुस्तक के दूसरे लेख में देखेंगे या जैसा कि आपने एंगेल्स की पुस्तिका समाजवाद काल्पनिक और वैज्ञानिक में देखा होगा, एक समय में ओवेन न्यू लेनार्क के एक ऐसे कारखाने के मालिक थे जो बहुत ही कामयाबी से चल रहा था और मुनाफा कमा रहा था। ओवेन ने न सिर्फ कारखाने को सुचारु ढंग से चलाया बल्कि अपने मज़दूरों को भी गरीबी, भुखमरी, अज्ञान, अशिक्षा, गंदगी और बीमारियों के गड्ढे से निकाला उन्हें इंसानों की तरह जीना सिखाया। ओवेन का यह सब काम निश्चित ही प्रशंसनीय है और अगर वे आज हमारे सामने होते तो निश्चित ही श्रद्धापूर्वक सर झुकाकर हम उनके चरण छू लेते। लेकिन आखिर हुआ क्या? यह तो आगे आप पढ़ेंगे ही हम तो संक्षेप में बस एक बात कह सकते हैं। एक व्यक्ति अगर अपनी दौलत को समाज के दबे-कुचले लोगों के लिए समर्पित कर देता है तो वह निश्चित ही श्रद्धा और प्रशंसा का पात्र है। (जाहिर है हमारी


20 / काल्पनिक समाजवाद की धाराएँ


मुराद उन लोगों से नहीं है जो पाप की कमाई करते हैं और फिर अपनी आत्मा की शांति के लिए गरीबों के आगे उसी कमाई का एक टुकड़ा फेंक देते हैं जो कभी कुछ करोड़ या कुछ सौ करोड़ के बराबर होती है। शायद यहाँ यह नियम कार्यरत हो कि कपड़ा जितना ही गंदा होगा, उसकी सफ़ाई के लिए पाउडर भी उतना ही अधिक लगेगा।) लेकिन यह बात तय है कि इस तरह की परमार्थ-वृत्ति प्रशंसनीय होते हुए भी समाज का रूपांतरण नहीं कर सकती, समाज के सदस्यों की दशा में कोई बुनियादी तब्दीली नहीं ला सकती। इसके लिए तो समाज की संस्थाओं, उसके पूरे ढाँचे में आमूल परिवर्तन की आवश्यकता है।


राबर्ट ओवेन की मिसाल इसी बात को सिद्धांत से आगे बढ़कर व्यवहार के स्तर पर साबित करती है। और व्यवहार, जैसा कि आप जानते ही होंगे, सबसे बड़ा शिक्षक है।


काल्पनिक समाजवादियों ने शिक्षा, कला आदि के प्रश्नों पर जो विचार व्यक्त किए हैं उनमें चाहे जो भी कमियाँ हों, उनको नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। लेकिन यहाँ हम सिर्फ़ एक बात कहकर इस भूमिका के समापन की ओर बढ़ेंगे। यूनान रहा हो या भारत, चीन रहा हो या पश्चिमी यूरोप, दुनिया भर के मक्कारों ने भौतिकवाद को विषय भोग का पर्याय ठहराने में कोई कोताही नहीं की है। भारत में लोकायत के बारे में इन मक्कारों की धूर्तता को दिवंगत देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय ने बहुत अच्छी तरह बेनक़ाब किया है। प्राचीन यूनान में एपीक्यूरस जैसे संत तक को बख्शा नहीं गया; शेक्सपियर का मैकबेथ भी एक जगह कहता है: Those English epicures! यानी कि खाओ पियो, मौज उड़ाओ का उसूल माननेवाले वे अंग्रेज़! दूसरी ओर इन मक्कारों के नज़दीक मुस्टंडे और हराम की कमाई पर पलनेवाले साधु-महात्मा ऊँचे आदर्शों के साकार रूप रहे हैं। कुछ ऐसी ही बातें उन काल्पनिक समाजवादियों के बारे में कही जाती रही हैं जिनका ज़िक्र यहाँ किया जा रहा है। इस सिलसिले में प्लेखानोव लिखते हैं :


अगर मनुष्य का चरित्र उसके विकास की दशाओं से निर्धारित होता है... तो ज़ाहिर है कि मनुष्य का चरित्र सुंदर तभी होगा जब उसे सुंदर दशाओं में विकास की इजाजत दी जाएगी। इन दशाओं को सुंदर बनाने के लिए मौजूदा सामाजिक ढाँचे के दोषों से मुक्त होना होगा। 19वीं सदी के काल्पनिक समाजवादियों ने संन्यासवाद को अस्वीकार कर दिया और किसी न किसी रूप में 'इंद्रिय-सुख' (Rehabilitation of the flesh) का ऐलान किया। इन


काल्पनिक समाजवाद की धाराएँ / 21


कारणों से उन्हें 'कुमार्गी भावनाओं को बेलगाम करने की, मनुष्य की उदात्त आवश्यकताओं पर उसकी निकृष्ट आवश्यकताओं की विजय सुनिश्चित करने की कोशिश करने का दोषी ठहराया गया। ऐसी गालियों सिर्फ मूर्ख दे सकते हैं। काल्पनिक समाजवादियों ने कभी मनुष्य के आत्मिक विकास को अनदेखा नहीं किया... संत-साइमनवादियों की रचनाओं में इस बात के अनेक, आँखें खोलनेवाले दृष्टांत दिखाई देते हैं कि आधुनिक समाज में गरीब व्यक्ति किस तरह नैतिकता से वंचित होते हैं। उन्होंने कहा यह समाज अपराधों की रोकथाम में असमर्थ है; यह उनको सिर्फ सज़ा दे सकता है और इसलिए आज 'जल्लाद नैतिकता का एकमात्र प्रामाणिक प्रवक्ता' है। (पृ. 106 देखें)


इसी तरह हमारे समाजवादी विचारकों की यह राय भी निराधार नहीं थी कि आज मनुष्य की उदात्त भावनाओं को मौजूदा समाज व्यवस्था में सही दिशा नहीं दी जा सकती। मनुष्य जरूरत से मजबूर होकर उन तमाम चीज़ों से वंचित हो जाता है जो उसके आत्मिक विकास के लिए आवश्यक हैं। इसी को 'साहिर' इस प्रकार पेश करते है- 


इल्मो-तहजीब1 तारीखो-मंतक2 लोग सोचेंगे इन मसइलों पर 3। 

जिंदगी के मशक्कतकदे में कोई अहदे-फ़रागत4 तो आए!


और अगर इजाज़त हो तो प्रस्तुत लेखक भी अपना एक शेर सुना दे


यहाँ से वहाँ तक, वहाँ से यहाँ तक, तगे-दी मुसलसल5, रविश दायराती6

मिले फुरसते यक-नफ़स7 गर तो हम भी लगाएँ कुतब की8 दुकानों का फेरा । 


खैर, हमारे इन समाजवादी विचारकों ने यह बात पूरी तरह स्पष्ट कर दी कि समाज व्यवस्था को बदले बिना मानव चरित्र को उदात्त नहीं बनाया जा सकता, मनुष्य के आत्मिक विकास को संभव नहीं बनाया जा सकता। जो लोग व्यवस्था में परिवर्तन के बिना मानव चरित्र को बदलने की बात करते हैं, या तो अज्ञानी और मूढ़ हैं जो वास्तविकता को नहीं जानते, या फिर वे वास्तविकता को जानते हुए भी यह बात करते हैं और इस तरह परले दर्जे के धूर्त और पाखंडी हैं। 


मार्क्स से पहले के काल्पनिक समाजवादियों को इन्हीं सब बातों की रोशनी

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1. ज्ञानव सभ्यता 2. इतिहास व तर्कशास्त्र, 3. समस्याओं पर, 4. फुरसत का युग, 5. लगातार भागदौड़, 6. वृत्ताकार गति (कोलू के जैसी) 7. एक साँस (अर्थात एक पल) की फुरसत, 8. किताबों की।


22 / काल्पनिक समाजवाद की धाराएँ

में परखा जाना चाहिए। प्लेखानोव ने सही कहा था :


...सवाल भावी सामाजिक संगठन की योजनाओं का नहीं है, क्योंकि ऐसी योजनाएँ तो बहरहाल कभी साकार नहीं होतीं। अहम बात यह है कि काल्पनिक समाजवादियों ने एक महान विचार को सामाजिक प्रचलन में धकेल दिया और मज़दूरों के मन में पैठ जाने के बाद यही विचार 19वीं सदी की सबसे ज़ोरदार सांस्कृतिक शक्ति बन गया। इस विचार का प्रचार-प्रसार काल्पनिक समाजवाद द्वारा की गई सबसे बड़ी सेवा है। (पृ. 105 देखें।)


और इसका कारण यही है, कि जैसा कि मार्क्स ने कहा था, "भौतिक शक्ति का सामना निःसंदेह भौतिक शक्ति से किया जाना चाहिए। लेकिन जनता के दिलों को अपनी गिरफ्त में ले लेने के बाद एक विचार भी भौतिक शक्ति बन जाता है।"


और इस विचार का, इस '19वीं सदी की सबसे ज़ोरदार सांस्कृतिक शक्ति' का मूलमंत्र क्या था? यह मूलमंत्र वह था जिसे संत-साइमन ने इन शब्दों में व्यक्त किया था


अंधी परंपरा ने अभी तक जिसे अतीत में रख छोड़ा है, वह स्वर्णयुग हमारे आगे है।


कहने की ज़रूरत नहीं कि यही मूलमंत्र आज की तमाम प्रगतिशील, जनवादी शक्तियों का भी है।


नरेश 'नदीम'


नयी देहली


काल्पनिक समाजवाद की धाराएँ / 23


19वीं सदी 


का 


फ्रांसीसी


काल्पनिक


समाजवाद


फ्रांस में 19वीं सदी के काल्पनिक (यूटोपियन) समाजवाद की विभिन्न धाराओं और सिद्धांतों में अनेक महत्त्वपूर्ण प्रश्नों के बारे में बहुत अधिक मतभेद पाए जाते हैं।1' तो भी उन सबके बीच ऐसी अनेक बुनियादी विशेषताएँ साझी हैं जो उनको अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक समाजवाद से, जैसाकि हम आज इसे जानते हैं, अलग ठहराती हैं। अगर उनमें ये विशेषताएँ साझी न होतीं तो मेरे लिए यहाँ फ्रांसीसी काल्पनिक समाजवाद का एक वृत्तांत प्रस्तुत करना असंभव होता; उसकी विभिन्न प्रणालियों और शिक्षाओं का विस्तार से निरूपण प्रस्तुत लेख में नहीं किया जा सकता था और वह बहरहाल अप्रासोंगेक भी होता।


इसके पहले कि ऊपर दर्ज काल के फ्रांसीसी काल्पनिक समाजवाद की सभी छायाओं की साझी विशेषताओं का कोई निश्चय करे, उसके ऐतिहासिक मूल को याद करना आवश्यक है।


एक


ब्रूनो बावेर और उनके सहयोगियों से अपने शास्त्रार्थ (पोलेमिक) के दौरान मार्क्स ने लिखा था : 'मनुष्य की बुनियादी अच्छाई और समान बौद्धिक क्षमता, अनुभव, आदत और शिक्षा की सार्वभौम शक्ति, मनुष्य पर वातावरण के प्रभाव, उद्यमशीलता के भारी महत्त्व, सुख आनंद के औचित्य आदि के बारे में भौतिकवाद की शिक्षाओं से यह समझने के लिए भारी जहमत उठाने की ज़रूरत नहीं कि साम्यवाद और समाजवाद से भौतिकवाद का किस क़दर लाज़मी संबंध है।"2 प्रसंगवश मार्क्स फिर आगे बढ़कर इस कथन की पुष्टि इस विचार की सहायता से करते हैं कि अगर मनुष्य को उसके समस्त ज्ञान, उसकी संवेदनाओं आदि की प्राप्ति इंद्रियों के संसार से और उससे प्राप्त अनुभवों से होती है जैसी कि 18वीं सदी के भौतिकवादियों की शिक्षा थी, तो अनुभवों के इस संसार को ही इस तरह व्यवस्थित किया जाना चाहिए कि जो कुछ वास्तव में मानवीय है, मनुष्य उसी का अनुभव करे और उसी का अभ्यस्त बने तथा वह मनुष्य के रूप में स्वयं की चेतना प्राप्त करे। यह बात बिलकुल सही


काल्पनिक समाजवाद की धाराएँ / 27


है। मार्क्स का यह कथन भी पूरी तरह सत्य था कि, मिसाल के लिए, शार्ल फूरिये की शिक्षा 'सीधे-सीधे फ्रांसीसी भौतिकवादियों की शिक्षाओं पर आधारित है।3 अगर किसी को इस बात में शक हो तो बेहतर है कि वह होलबाल के सलेम सोशल (सामाजिक व्यवस्था) के पहले भाग के पहले अध्याय में जो कुछ कहा गया है उससे राग-द्वेष के बारे में फ़रिये की शिक्षाओं की तुलना कर ले। इस सिलसिले में हेल्बेतियस से फ़रिये की तुलना करना भी दिलचस्पी से कुछ कम खाली नहीं होगा। लेकिन नीचे की बातों को याद कर लेना अहमियत रखता है।


हालाँकि फ़रिये4 फ्रांसीसी भौतिकवाद की शिक्षाओं को लेकर ही आगे बढ़ते हैं, मगर साथ ही 18वीं सदी में प्रबोध (इनलाइटेनमेंट) के पूरे फ्रांसीसी दर्शन के बारे में उनका रवैया एक सिरे से नकारात्मक है। यह रवैया उनकी पहली रचना थ्योरी देस क्वात्रे मूवमेंत्स एत देस देस्तिनीज़ सोशिएल्स में ही दिखाई देता है जो 1808 में ल्योंस5 से प्रकाशित हुई थी। वहाँ हम पढ़ते हैं कि


"जब अपने पहले प्रयोग में, अर्थात् फ्रांसीसी क्रांति में ही, दार्शनिकों ने अपनी नपुंसकता का पता दे दिया तो उन सबके बीच इस बात पर सहमति थी कि उनके दर्शन को मानव बुद्धि की एक भूल माना जाना चाहिए तथा राजनीतिक और नैतिक प्रबोध (इनलाइटेनमेंट) की धाराएँ भ्रांति की धाराएँ नज़र आने लगीं और क्या उन विद्वानों की रचनाओं में कोई और बात मिलती भी जिन्होंने अपने सिद्धांतों को पूर्णता प्रदान करने तथा समस्त प्राचीन और आधुनिक प्रबोध को एकजुट करने के प्रयास में दो हज़ार पाँच वर्ष गँवाने के बार अपने पहले प्रयास में ही, जितने सुखों का वादा उन्होंने किया था उससे कुछ कम मुसीबतें पैदा नहीं कीं? ऐसे ही नतीजे उन पहले पाँच वर्षों के निकले जब फ्रांस में दार्शनिक सिद्धांतों को व्यवहार में उतारने की कोशिश की गई। 1793 के महासंकट (कैटेस्ट्राफी) के बाद ये भ्रांतियाँ दूर हो गई... "6


इसी रचना में एक और स्थान पर फ़रिये चिढ़ के साथ समानता के बारे में उन वितंडावादी झगड़ों को याद करते हैं जिन्होंने सिंहासनों, पूजा की वेदियों और संपत्ति के विधानों को उलट-पलट कर दिया और जिनके कारण, उनके शब्दों में, यूरोप बर्बरता की ओर बढ़ रहा है। 


फूरिये कभी भी, किसी भी समय, पुरानी व्यवस्था के समर्थक नहीं रहे। इसके विपरीत ऐन मुमकिन है कि, अपने दौर के समूचे तीसरे जनवर्ग (थर्ड एस्टेट) की तरह, उन्होंने कभी उस व्यवस्था का अनुमोदन नहीं किया होगा और वे उसका अंत होते देखना चाहते थे। लेकिन उस दौर के फ्रांसीसी समाज में विभिन्न वर्गों के क्रांतिकारी संघर्ष ने इतना हिंसक चरित्र ग्रहण कर लिया, खासकर 1793 में, कि अपने अधिकांश समकालीनों की तरह फ़ूरिये भी डर से काँप उठे। उनका यह मानना था कि 18वीं


28 / काल्पनिक समाजवाद की धाराएँ


सदी का प्रबोध का दर्शन ही '1799 "महासंकट"7 के लिए जिम्मेदार था। इसलिए उन्होंने उस पूरे दर्शन को ही दिवालिया घोषित कर दिया। उसके विरोध में ये इतनी दूर तक चले गए कि उन्होंने अपने लिए दो कामकाजी नियम तय कर लिए (1) 'पूर्ण संदेह' (आब्सोल्यूट डाउट) और (2) पूर्ण विषयांतर' (आब्सोल्यूट डाइग्रेशन) । 'पूर्ण संदेह' का मतलब यह था कि वे अपने काल में अत्यंत प्रचलित मतों और विचारों को भी संदेह की दृष्टि से देखने लगे। मिसाल के लिए और यह खुद उनकी दी हुई मिसाल है-तरह-तरह की तमाम दार्शनिक प्रवृत्तियों के बीच इस बात की सहमति थी कि सभ्यता के प्रति सम्मान का भाव होना चाहिए। लेकिन यहाँ अपने 'पूर्ण संदेह' के नियम को लागू करते हुए फूरिये ने सभ्यता की 'पूर्णता' में ही संदेह व्यक्त किया। उन्होंने खुद से पूछा क्या कोई भी चीज़ इस सभ्यता से भी अधिक अपूर्ण हो सकती है जिससे इतनी इतनी तबाहियों का चोली-दामन का साथ है? क्या कोई भी चीज़ उसकी आवश्यकता और उसके भावी अस्तित्व की अपरिहार्यता से भी अधिक संदिग्ध हो सकती है? क्या इसकी संभावना नहीं है कि यह सामाजिक विकासक्रम के एक चरण की सूचक मात्र हो ? 8 अपने आगे ये सब सवाल लेकर जल्द ही वे इस बात के कायल हो गए कि 'सभ्यता' का तात्पर्य यह कि उन सामाजिक संबंधों का जो सभ्य राष्ट्रों में पाए जाते हैं-सामुदायिक जीवन के दूसरे रूपों के हित में अंत हो जाना चाहिए, और वे उन्हीं भावी रूपों के बारे में चिंतन करने लगे। 


जहाँ तक फूरिये के पूर्ण विषयांतर' का सवाल था, इसके चलते उन्होंने निश्चय किया कि 'कभी भी उन रास्तों पर न चला जाए जिनको संदिग्ध विज्ञानों ने तैयार किया हो,' अर्थात् 18वीं सदी के उसी दर्शन में यहाँ यह जानकारी दिलचस्पी की है कि कार्यकलाप के इस नियम को उचित ठहराने के लिए फ़रिये ने इस परिस्थिति का हवाला दिया कि उद्योग-धंधे की बेपनाह सफलताओं के बावजूद ये 'संदिग्ध विज्ञान' तो 'निर्धनता को खत्म करने तक में असमर्थ थे।



लेकिन इन दो नियमों के व्यवहार से ही यह बात साफ़ हो गई कि 18वीं सदी के दर्शन के खिलाफ़ विद्रोह करने के बावजूद फूरिये उससे बहुत अधिक प्रभावित रहे। जैसाकि हमें पता है, वह दर्शन बुनियादी तौर पर प्रगतिशील था। उसकी सबसे महत्त्वपूर्ण, उसे अलग ठहराने वाली विशेषताओं में एक विशेषता प्रगति में, मनुष्य की और मानव समाज की पूर्णता पा सकने की क्षमता में उसकी गहरी आस्था थी। फूरिये ने आदतवश इस आस्था पर भी नाक-भौं चढ़ाया। लेकिन यह बात ध्यान में रहनी चाहिए कि सभ्यता पर 'पूर्ण संदेह' का नियम लागू करते हुए थे, सटीक करें तो, स्वयं सभ्यता पर संदेह नहीं कर रहे थे, बल्कि सभ्य राष्ट्रों के सामाजिक दाच में मौजूद कुछ गंभीर दोषों के अस्तित्व की अपरिहार्यता पर संदेह व्यक्त कर रहे थे। वे जब इस नतीजे पर पहुँचे कि इन गंभीर दोषों को समाप्त नहीं किया जा सकता और जब उन्होंने एक नयी सामाजिक व्यवस्था का खाका तैयार कर लिया


काल्पनिक समाजवाद की धाराएँ / 29


तो वे खुद ही पूर्णता के लक्ष्य को पाने के लिए सक्रिय हो उठे, हालांकि स्वयं को पूर्ण बनाने के सिलसिले में मनुष्य और मानव समाज की क्षमता को लेकर 'संदिग्ध विज्ञानों की शिक्षाओं पर नाक-भौं चढ़ाना उन्होंने बंद नहीं किया। फिर इससे कुछ कम उल्लेखनीय यह तथ्य भी नहीं है कि 'संदिग्ध विज्ञानों' के तैयार किए हुए रास्तों से पूरी तरह अलग चलनेवाले' इस राही ने फ़ौरन निर्धनता की समस्या को उठाया। जो शख्स 18वीं सदी के फ्रांसीसी दर्शन पर ताने कसता था कि वह निर्धनता का खात्मा नहीं कर सका है, वही शख्स उसकी भावना के प्रति निष्ठावान बना रहा। कारण कि यह दर्शन लगातार यह बात दोहराता रहता था salus populi-suprema lax अर्थात् जनता का कल्याण ही सर्वोच्च विधान है।


लेकिन अगर यह बात सही है, अगर फूरिये 18वीं सदी के दर्शन का तीखा विरोध करने और निर्ममता के साथ उस पर नाक-भौं चढ़ाने के बावजूद बुनियादी तौर पर उसी के निष्ठावान अनुयायी बने रहे और उसी की शिक्षाओं को उन्होंने अपने सैद्धांतिक कार्यकलापों का आधार बनाया, तो यह बात ज़रूर पूछी जा सकती है कि उनके 'पूर्ण संदेह' और 'पूर्ण विषयांतर' ने उन्हें आखिर पहुँचाया कहाँ।


पहली बात, इन्होंने उनसे सैद्धांतिक मनमौजीपन की अनेक हरकतें कराई जिन पर एक लंबे समय तक समाजवाद के विरोधी चुटकियाँ लेते रहे। 'पूर्ण संदेह ने फूरिये से सैद्धांतिक चिंतन के उन नियमों की उपेक्षा कराई जिनको कोई भी लापरवाही के साथ नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता। जब वे 'दोहफ़ अमरत्व' पर बहस करते हैं। और 'देहांतर (metempsychoses) का एक समान्य सोपान' खड़ा करते हैं, जब वे हमें विश्वास दिलाते हैं कि 'वह जिसने हमें सिंह दिए हैं, हमें ऐसे प्रति सिंह (एंटी-लायंस) भी देगा जिन पर हम तीव्र गति से यात्रा कर सकते हैं, जब वे भविष्य के प्रति व्हेलों, प्रति-शार्को, प्रति-दरियाई घोड़ों और प्रति-सीलों के अच्छे गुणों का वर्णन करते हैं। तो ज़ाहिर है वे उसी विषयांतर का दुरुपयोग कर रहे हैं जो पहले के तमाम दार्शनिकों के खिलाफ़ उनके विद्रोह की उपज था। उन्होंने अगर इस तरह का विद्रोह न किया होता तो उन्होंने स्वशिक्षितों की तरह की आत्मतुष्टि का इस तरह परिचय


न दिया होता और अपनी कल्पना की उड़ानों पर रोक लगाने की कोशिश करते। दूसरे, 'पूर्ण विषयांतर' के नियम का पालन करते हुए, फुरिये ने, उनके अपने शब्दों में, सिर्फ़ उन समस्याओं को उठाने की कोशिश की जिनको 18वीं सदी के दर्शन ने छुआ नहीं था। चूंकि इस दर्शन का राजनीति और धर्म से गहरा सरोकार था, इसके विरोध में फ़ूरिये ने खुद को मजबूर पाया 'समाज कल्याण की तलाश सिर्फ़ उन उपायों में करने के लिए जिनका प्रशासन से और पुरोहितों से भी लेना-देना नहीं है तथा जिनका विस्तार सिर्फ़ उद्योग-धंधों और घरेलू जीवन तक है, और जिनका तालमेल किसी भी सरकार के साथ, उसके हस्तक्षेप की किसी भी तरह की आवश्यकता के बगैर, बैठ सकता है।12 इसी बात से उनकी समाज व्यवस्था की प्रकृति एक बड़ी


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हद तक निरूपित होती है; यह वास्तव में किसी भी तरह की राजनीतिक आकांक्षा से रहित है।


 लेकिन बात इसके अलावा कुछ और भी है। 18वीं सदी के फ्रांसीसी दर्शन


के खिलाफ़ फ़रिये की बगावत उनके इस विश्वास की उपज थी कि यही '1798


के महासंकट' के लिए दोषी था। इसीलिए उन्होंने हर सुविधाजनक अवसर पर (और


शायद कुछ ऐसे अवसरों पर भी जो उतने सुविधाजनक नहीं थे) इस बात पर जोर


दिया कि उनकी विचार प्रणाली की कोई क्रांतिकारी आकांक्षा नहीं है। इतना ही नहीं,


उन्होंने अपनी प्रणाली की इसी रूप में सिफ़ारिश भी की कि यह ऐसी क्रांतिकारी


आकांक्षाओं के खिलाफ़ संघर्ष का एकमात्र विश्वसनीय साधन है। उनकी पुस्तक La fausse industrie, morcelee, repugnante, mensongere et l'antidote, l' industric natirelle, combinee वगैरह-वगैरह की पहली जिल्द में एक दिलचस्प अध्याय है जिसका शीर्षक है सम्राट के हिंतों संबंधी टिप्पणियाँ: षड्यंत्रों की समाप्ति के साधन। इसमें (पृ. 337 पर) फूरिये बतलाते हैं कि चूंकि विनाशकारी विस्फोटक यंत्र षड्यंत्रकारियों का नया अस्त्र है, ऐसे आविष्कार का परीक्षण करना आवश्यक है जो 'लोक-कल्याण और शुभ नैतिकता का सृजन करके षड्यंत्रों को विकल करे 3 उसके बाद उनकी नयी समाज-व्यवस्था का एक अच्छा-खासा विस्तृत निरूपण मिलता है। इसी रचना की दूसरी जिल्द में, जो साल भर बाद प्रकाशित हुई थी, यही विचार एक टिप्पणी में दोहराया गया है जिसका शीर्षक है। सामान्य विषय, नृपहत्या के प्रयास के संबंध में। इसमें फ़रिये इन प्रयासों के लिए प्रबोध के दर्शन को दोषी ठहराते हैं। कहते हैं 'पिछले 18 वर्षों के दौरान सम्राटगण दर्शन के खिलाफ़ बुद्धरत हैं, लेकिन वे उसके खिलाफ़ सिर्फ आधे-अधूरे क़दम उठाते हैं जो इसे मजबूत ही बनाते हैं; वे उसके खिलाफ एक प्रभावशाली विरोध खड़ा करने में असमर्थ हैं, उसके मुकाबले उद्योगतंत्र और समाज की नियति का एक सटीक विज्ञान खड़ा करके उसके झूठे ज्ञान को बेनक़ाव करने में असमर्थ हैं। कहने की जरूरत नहीं कि यह सटीक विज्ञान फूरिये की अपनी विचार प्रणाली ही है जिसकी लुई फिलिप ने षड्यंत्रों के खिलाफ सर्वश्रेष्ठ साधन कहकर सिफारिश की थी।


कुछ ही आगे हम देखेंगे कि फ़रिये इस सिलसिले में अपने समय के समाजवादियों के बीच कोई अपवाद नहीं थे। उलटे, इस तरह की अपीलें 19वीं सदी के फ्रांसीसी काल्पनिक समाजवाद के लिए बहुत आम थी। इसलिए अगर हम उनकी सामान्य मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि का निश्चय कर सकें तो उपयोगी ही होगा।


दो


देखिए कि फूरिये किस तरह (अपनी ऊपर दर्ज पुस्तक Theorie des quatre mouvements में) समाज की उस क्रांतिकारी दशा की तस्वीर पेश करते हैं जिससे,


काल्पनिक समाजवाद की धाराएँ / 31


उनके कहे मुताबिक़, उनकी समाजसुधार की योजना को व्यवहार में रखकर ही छुटकारा पाया जा सकता है।


वे चीखकर कहते हैं : 'हाँ, सभ्य व्यवस्था" अधिकाधिक लड़खड़ा रही है; दर्शन ने 1789 में जो ज्वालामुखी पैदा किया वह उसका बस पहला विस्फोट है; जैसे ही आंदोलनकारियों के अनुकूल एक कमज़ोर शासन होगा, ऐसे और विस्फोट भी होंगे।"" 'अमीरों के खिलाफ़ गरीबों की लड़ाई इतनी कामयाब थी कि सभी देशों के षड्यंत्रकारी बस उसे दोहराने के सपने देख रहे हैं। इससे बचने की कोशिश बेकार, है; प्रकृति हमारे प्रबोध और हमारी दूरदृष्टि का मखौल उड़ा रही है; वह उन्हीं उपायों से क्रांति पैदा करने में समर्थ साबित होगी जो हम सामाजिक शांति सुनिश्चित करने के लिए अपनाते हैं। "


ये सब बातें अधिक से अधिक ध्यान दिए जाने की अधिकारी हैं। फूरिये ने 1808 में ही उस महान क्रांति (1789 की फ्रांसीसी क्रांति-संपादक) को वर्ग संघर्ष का एक दृष्टांत समझ लिया था अमीरों के ख़िलाफ़ गरीबों की लड़ाई का। वे गोया कि अफ़सोस करते हुए कहते हैं कि यह लड़ाई सफल भी रही। इससे कोई यह नतीजा निकाल सकता है कि वे पुरानी व्यवस्था के हमदर्द थे लेकिन, जैसा कि पहले कहा जा चुका है, बात ऐसी नहीं थी। पुरानी व्यवस्था से उनकी कोई हमदर्दी नहीं थी; बात बस यह थी कि उन्होंने सामान्यतः वर्ग संघर्ष और विशेषकर क्रांतिकारी वर्ग संघर्ष को अस्वीकार किया। उनका कहना था कि उन्होंने जो खोजें '1798 के महासंकट' के बाद की थीं वही खोजें अगर पुरानी व्यवस्था के दिनों में कोई और प्रतिभा पुरुष कर लेता और समय रहते समाज-सुधार के लिए उनका उपयोग करता तो फ्रांस उस महाक्रांति से बच सकता था। लेकिन अब जबकि ये खोजें की जा चुकी हैं, सामाजिक उथल-पुथल को रोका जा सकता है और 'अमीरों के ख़िलाफ़ गरीबों की लड़ाई' से बचा जा सकता है, बशर्ते जो लोग सामाजिक शांति बनाए रखने में दिलचस्पी रखते हैं वे उस समाज व्यवस्था के लाभों को समझें जिसकी रूपरेखा फ़रिये ने सोच रखी है। इसलिए उनसे गुहार करते हुए उन्होंने उथल-पुथल की तस्वीर पेश करते हुए किसी भी रंग को नहीं बख़्शा। उन्होंने कहा कि सभ्य समाज अगर उनकी आवाज़ पर कान देने में नाकाम रहा तो उसे यही क्रीमत देनी होगी।


यही उनकी कार्यनीतियाँ थीं। उनकी पहली विशेषता राजनीति के प्रति उदासीनता थी तो दूसरी विशेषता वर्ग संघर्ष के प्रति एक पूरी तरह नकारात्मक रवैया थी। उनकी विचार प्रणाली की इन दो सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषताओं के बीच एक बहुत ही स्पष्ट और गहरा संबंध था। और वह संबंध यह था कि दूसरी विशेषता ने पहली को पैदा किया।


वर्ग संघर्ष के प्रति फ़रिये का नकारात्मक रवैया '1798 के महासंकट' का परिणाम था। अब चूँकि राजनीति वर्ग संघर्ष का ही एक अस्त्र होती है, फ़रिये के


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यहाँ इस संघर्ष के निषेध के बाद राजनीति का निषेध स्वाभाविक था। यह मत सोचिए कि यह काल्पनिक समाजवाद के इतिहास का कोई विशेष


दृष्टांत मात्र है। नहीं! इससे मिलते-जुलते दृष्टांत इतने अधिक हैं कि हमें एक सामान्य नियम की बात करने का पूरा-पूरा अधिकार पहुँचता है। एक और मिसाल यह रही: संभवतः कम नाटकीय, पर कुछ कम महत्त्व की नहीं।


सेंत-साइमन" भी फ्रांसीसी क्रांति को एक वर्ग संघर्ष, और ठीक-ठीक कहें संपत्तिधारी वर्ग के खिलाफ संपत्तिहीन वर्ग का संघर्ष, मानते थे। फूरिये की तरह वे भी इस संघर्ष के प्रति बहुत निष्ठुर थे। 1802 में, अर्थात् फ़रिये की पहली पुस्तक से 6 वर्ष पहले, प्रकाशित अपनी रचना Lettres d'un habitant de Genve a ses contemporains (अपने समकालीनों के नाम एक जेनेवावासी के पत्र) में वे फ्रांसीसी क्रांति को अत्यंत भयानक विस्फोट तथा बलाओं में सबसे बड़ी बला बतलाते हैं। " वे 'समानता के सिद्धांत के इस व्यवहार से पैदाशुदा भयानक बेरहमियों' के बारे में विस्तार से लिखते हैं 120 संपत्तिहीन वर्गों के नाम एक अपील में वे कहते हैं : 'आओ देखो कि फ्रांस में जब तुम्हारे कामरेडों का बोलबाला था तब वहाँ क्या हुआ!  वहां उन्होंने अकाल पैदा कर दिया।" यह बात स्पष्ट है कि '1793 के महासंकट' ने सेंत-साइमन पर भी बेहद गहरा प्रभाव डाला था। फ़रिये ने अगर इस महासंकट हुआ! वहाँ के लिए 18वीं सदी के दार्शनिकों को दोषी ठहराया तो सेंत-साइमन ने उसकी व्याख्या संपत्तिहीन वर्गों के अज्ञान के आधार पर की। लेकिन यह अंतर सिर्फ़ ज़ाहिरा है क्योंकि सेंत-साइमन की राय में 'समानता के सिद्धांत का व्यवहार' इन अतिवादी निष्कर्षों के व्यावहारिक उपयोग से अधिक कुछ भी न था जिन पर प्रबोध के दार्शनिक पहुँचे थे। इस तरह सेंत-साइमन की शिक्षा राजनीति के प्रति उसी उदासीनता का पता देती है जो हमें फ़रिये के यहाँ दिखाई देती है। एक व्यावहारिक अर्थ में (प्रथम) श्रेणी का) सेंत-साइमनवाद क्रांति को समाप्त करने के लिए आवश्यक उपायों के अध्ययन से अधिक कुछ भी नहीं है। क्रांति के विचार मात्र से ही सेंत-साइमन किस सीमा तक चिढ़ते थे, इसका अंदाज़ा इस उद्धरण से किया जा सकता है जिसे उनकी पुस्तक Du systeme industricle (औद्योगिक व्यवस्था) से किया जा सकता है। सामाजिक संबंधों में जिन परिवर्तनों की कल्पना वे करते हैं उन्हें कौन-सी शक्ति जन्म देगी और उस शक्ति का मार्गदर्शन कौन करेगा- इस सवाल का वे यह जवाब देते हैं :



ये परिवर्तन नैतिक भावना की शक्ति से होंगे और इस शक्ति का प्रमुख चालक यह विश्वास होगा कि तमाम राजनीतिक सिद्धांत उस सामान्य सिद्धांत से व्युत्पन्न होने चाहिए जिसे प्रभु ने मानवजाति को प्रदान किया है। (अर्थात् 'एक दूसरे से प्रेम करो'-प्लेखानोव।) 'इस शक्ति का मार्गदर्शन परमार्थी व्यक्तियों द्वारा


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किया जाएगा जो, जैसा कि ईसाइयत के जन्म के समय था, शाश्वत (सत्ता) के तात्कालिक निमित्त होंगे।


थोड़ा ही आगे चलकर वे लिखते हैं : 'ये परमार्थी जिस एकमात्र साधन का व्यवहार करेंगे रह होगा मौखिक और लिखित उपदेश | 23


फ़रिये की तरह संत-साइमन भी वर्ग संघर्ष के विचार से ही भयभीत थे और कभी-कभी अपने पाठकों को 'संपत्तिहीन वर्ग' का, 'जनता' का नाम लेकर डराना पसंद करते थे। श्रीमन उद्योगपतिगण के नाम अपने चौथे पत्र में वे दिखाते हैं कि 'बोनापार्त के सामंतवाद' के खिलाफ़ उनका संघर्ष किस तरह का अवांछित मोड़ ले सकता है। लिखते हैं : 'इसके अलावा, सज्जनो, थरथराए बिना कोई भी यह नहीं सोच सकता कि खुली लड़ाई की हालत में यह' (बोनापार्त का सामंतवाद-प्लेखानोव) 'कुछ समय के लिए जनता को अपनी ओर खींच सकता है। हालाँकि आप जनता के स्वाभाविक और अपरिहार्य नेतृत्वकर्मी' (शेफ़) हैं और हालांकि जनता आपको इस रूप में मान्यता देती है, फिर भी अनुभव ने आपको यही दिखाया है कि कुछ समय के लिए यह सेना और विधि-विशेषज्ञों के परचम तले भी लामबंद की जा सकती है। आप यही सोचते हैं कि जनता पर आंदोलनकारियों का जो प्रभाव हो सकता था वह अब' (महाक्रांति के दौर की तुलना में प्लेखानोव) 'अच्छा-खासा कम हुआ है... लेकिन यह पूरी तरह नष्ट नहीं हुआ है। तुर्क समानता का मताग्रह (डोग्मा)... अभी भी, अगर आप सावधानी नहीं बरतते तो, भारी उथल-पुथल ला सकता है...जब तक आप पहले से ही जनता के सामने उसके सच्चे हितों की स्पष्ट और सटीक धारणाएँ प्रस्तुत नहीं करते, आपके पास इस मताग्रह के फुसलावों से लड़ने के लिए भला कौन-सा साधन होगा?


यह उद्धरण बहुत ही विश्वसनीय ढंग से दिखाता है कि संपत्तिहीन वर्ग वह वर्ग था ही नहीं जिस पर सेंत साइमन अपनी व्यावहारिक योजनाओं को साकार करने के लिए भरोसा करते। फ़रिये की तरह सेंत-साइमन के विचार भी किसी भी तरह सर्वहारा के विचार नहीं थे।


फ्रांसीसी काल्पनिक समाजवाद के इन दो महान संस्थापकों के अनुयायी उनके प्रति, मैंने जिन अत्यंत महत्त्वपूर्ण पहलुओं का संकेत दिया है उनके बारे में पूरी तरह वफ़ादार थे। समाज में जो वर्ग संघर्ष जारी था उसे उन्होंने अपनी समाज-सुधार की आकांक्षाओं का आधार बनाने का विचार पूरी तरह आगबगूला होकर खारिज कर दिया। एक मिसाल के तौर पर मैं फूरिये के सबसे प्रतिभाशाली अनुयायियों में एक का, अर्थात् विक्तर कोसिदेरों का, हवाला दूंगा।


34 / काल्पनिक समाजवाद की धाराएँ


तीन


अपनी पुस्तिका Debacle de la politique en france (फ्रांस में राजनीति का पतन) में जो 1836 में प्रकाशित हुई थी, अर्थात् अभी फूरिये जीवित थे तभी, कोंसिदेरों ने राजनीति की परिभाषा 'शासन के बुनियादी उसूलों के बारे में या राष्ट्र के अधिकतम कल्याण के लिए विभागों को लेकर खींचतान करनेवाली विभिन्न प्रशासनिक व्यवस्थाओं के बारे में प्रचलित परस्परविरोधी मतों और सिद्धांतों की समग्रता' के रूप में की थी। " इस उद्धरण में राष्ट्र के अधिकतम कल्याण के लिए' शब्दों में विडंबना की एक बहुत ही स्पष्ट छाया दिखाई देती है तथा ये दिखाते हैं कि कोसिदेरों की निगाहों में राजनीति का कोई अधिक महत्त्व नहीं था। अपनी राय को छिपाना तो दूर, वे संतोष के साथ यह कहते हैं कि फ्रांस में हाल के दौर की तुलना में राजनीति में रुचि और उसके प्रति सम्मान के भाव में खासी कमी आई थी। * क्यों? राजनीति की कुछ सैद्धांतिक त्रुटियों के कारण और ये त्रुटियाँ क्या थीं? जवाब 'हितों की जो एकता सभी हितों के लिए लाभदायक हो सकती है, उसे साकार करने के लिए आवश्यक साधनों के बारे में मग़ज़मारी करने की बजाय' (विभिन्न राजनीतिक दलों के प्लेखानोव) 'लोगों को शुद्ध रूप से अपने संघर्ष का समर्थन करने और उनको बल पहुंचाने में लगा दिया जाता है जो सिर्फ उन्हीं लोगों के लिए लाभदायी होता है जो उस संघर्ष के नाम पर व्यापार करते हैं।


राजनीति वर्ग संघर्ष का एक अस्त्र है, और अपने गुरु फूरिये की तरह कोसिदेरौँ भी वर्ग संघर्ष के इच्छुक नहीं थे। फलस्वरूप- यहाँ भी फ़रिये की ही तरह-वे राजनीति की ओर से अपना मुँह फेर लेते हैं। इससे अधिक तार्किक कोई बात हो ही नहीं सकती थी। इसी पुस्तिका के एक और हिस्से में कोसिदेरों निम्नलिखित प्रस्थापना को एक ऐसी सच्चाई के रूप में सामने रखते हैं जिससे इनकार की कहीं कोई गुंजाइश ही नहीं:


हम सबकी दिलचस्पी इसमें है कि बिना किसी अपवाद के सभी प्रसन्न रहें, और हर वर्ग के भौतिक हितों को सुनिश्चित करने का सबसे अच्छा ढंग यह है कि उसके अपने हितों से दूसरे वर्गों के हितों को जोड़ा जाए।"


कोसिदेरों 18वीं सदी के फ्रांसीसी दर्शन को वैसे ही ज़ोरदार ढंग से खारिज करते हैं जैसे फ़रिये ने किया था। वे इसे विध्वंसक बतलाते हैं और कहते हैं कि जब इस दर्शन के बुनियादी विचार को, अर्थात् सामंतवाद और कैथलिक धर्म को उखाड़ फेंकने के विचार को साकार किया जाने लगा तो मारी सामाजिक उथल-पुथल पैदा हुई। वे हमें यह समझाना चाहते हैं कि 18वीं सदी के अंत में, उनकी राय में, क्रांतिकारी संघर्ष का सहारा लिए बिना समाज व्यवस्था में सुधार के साधन उपलब्ध थे। " जहाँ


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तक उनके अपने युग का सवाल है, समाज के शांतिपूर्ण रूपांतरण की संभावना में उन्हें जरा सा भी शक नहीं। इस संभावना को फ़रिये की ये खोजें पूरी तरह सुनिश्चित करती हैं जो सभी सामाजिक वर्गों के हितों के बीच तालमेल बिठाने का सबसे विश्वसनीय साधन प्रदान करती हैं। क्रांतिकारी, जो बड़ी बेचैनी के साथ हिंसा के कृत्यों का सहारा लेते हैं, इस बात को समझना ही नहीं चाहते।" क्रांतिकारियों की बेहद निर्मम निंदा का कारण यही है। यह बात सही है कि वे सत्ताधारियों को भी नहीं बाते जो उनकी राय में, अपने भडिपन के कारण अपने ही ध्येय को नुकसान पहुँचाते हैं।" लेकिन इन तमाम बातों के बावजूद उन्हें इस बात का पक्का विश्वास है कि आज के काल में जो पक्ष व्यवस्था बनाए रखने में दिलचस्पी रखता है, उस पक्ष की अपेक्षा कम समाज-विरोधी हैं जो उसे उखाड़ फेंकने के लिए प्रयासरत हैं। क्यों? उनका जवाब है 'समाज की समकालीन दशाओं से चूँकि यह बात स्पष्ट है कि आज लड़ने की नहीं बल्कि सुधार करने और संगठित होने की आवश्यकता है, इसलिए जिस पक्ष की स्थिति ही उसे व्यवस्था का प्रेमी बनाती है वह उस कार्रवाई के प्रति कम विरोध-भाव रखता है जो की जानी चाहिए, उस पक्ष के मुकाबले जो आज भी बहिष्कार करना, तोड़फोड़ करना और उखाड़ फेंकना चाहता है।


यहाँ रूस में लेब तालस्ताय का तर्क भी ठीक इसी तरह का था; ठीक ऐसे ही विचारों के चलते वे भी क्रांतिकारियों के मुकाबले सत्ताधारियों के प्रति अधिक सहानुभूति रखते थे।


यह सब मुझे विश्वास है कि काफ़ी हद तक स्पष्ट है। लेकिन कॉसिदेरी के विचार निम्नलिखित उद्धरण में और भी रंगारंग ढंग से व्यक्त हुए हैं:


एक तत्त्व के खिलाफ़ किसी और तत्त्व का कोई भी विद्रोह अवैधानिक है; केवल मेलमिलाप, सामंजस्य, मुक्त और पूर्ण विकास और व्यवस्था ही वैधानिक हैं। "


ये शब्द काल्पनिक समाजवाद की पूरी कार्यनीति को सामने लाते हैं। मैं यह नहीं कहता कि उनकी कार्यनीति कभी बदली ही नहीं। फ्रांस में उन दिनों के तूफ़ानी सार्वजनिक जीवन में यह बात पूरी तरह अस्वाभाविक होती। लेकिन संशोधनों के बावजूद काल्पनिक समाजवाद की कार्यनीति का यह चरित्र सामान्यतः अंत तक बना रहा। काल्पनिक समाजवादियों के एक संप्रदाय को दूसरे से अलग करने वाली विशेषताएँ चाहे जितनी अधिक रही हों, वे सभी संप्रदाय राजनीति के प्रति उदासीन बने रहे- यहाँ भी थोड़े से अपवाद हैं जिनकी चर्चा में बाद में करूंगा और वे सभी,


फिर उन्हीं थोड़े से अपवादों को छोड़ दें तो, वर्ग-संघर्ष के ख़िलाफ़ थे। संत-साइमनवादियों को लीजिए अपना सिद्धांत प्रतिपादित करते हुए वे वर्ग संघर्ष का जिक्र करते हैं जो इतिहास में जारी रहा है, तथा 'मनुष्य द्वारा मनुष्य


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के' शोषण का भी। वे कहते हैं कि आधुनिक समाज में निठल्ले कामगारों का शोषण कर रहे हैं। अपने पहले प्रकाशन Le Producteur (उत्पादक) में ही, जो 1825-26 में सामने आया था, उन्होंने कहा कि आज 'यह सोचना ही असंभव हो गया है कि निठल्लों के हित वही हैं जो कामगारों के हैं। उनका कहना है कि वर्गीय शत्रुताओं का खात्मा और 'मेलमिलाप' की विजय सामाजिक विकास का उद्देश्य है। लेकिन जब यह सवाल पूछा जाता है कि 'मेलमिलाप' की विजय कैसे हो, तो वे वर्गों के बीच तालमेल की बात करते हैं। उनके व्याख्यानों के दिलचस्प संकलन Doctrine Saint-Simonienne Exposition (संत-साइमनवादी सिद्धांत परिचय) में ये तमाम बातें पढ़ने को मिलती हैं। (विशेषकर इसकी पहली जिल्द देखें।) लेकिन ये विचार साफ़ तौर पर संत-साइमनवादी परिवार के कामकाज पर रिपोर्ट में व्यक्त किए गए हैं जिन्हें स्तीफान फुलाशे ने 'फादर' बाज़ेयर और 'फ़ादर' इनफैतिन की सेवा में प्रस्तुत किया था।"


स्तीफान फुलाशे दो वर्गों में समकालीन समाज के विभाजन को स्वीकार करते हैं। इतना ही नहीं, वे अपनी बात को अधिकांश ऐसे लोगों के मुकाबले कहीं बहुत अधिक सटीक ढंग से प्रस्तुत करते हैं जो उनके विचारों के समर्थक थे। सेंत-साइमनवादियों के बेपनाह बहुमत की राय में समकालीन समाज 'निठल्लों' के एक वर्ग और 'कामगारों' के एक वर्ग में विभाजित है। वहीं फ्लाशे बुर्जुवा वर्ग और सर्वहारा वर्ग के विरोध की बात करते हैं, हालांकि साथ ही साथ भोलेपन में उन्होंने यह भी मान लिया था कि शब्दों के इस अंतर के पीछे सामाजिक संबंधों का कोई अंतर नहीं है। कहते हैं कि 1830 की क्रांति के बाद बुर्जुवा वर्ग ने सर्वहारा के हितों पर गंभीरता से ध्यान देने की कोई ज़रूरत महसूस नहीं की और पूँजीपति वर्ग की इस गलती को मुआफ़ करने की तमाम तत्परता के बावजूद वे इतना ज़रूर सोचते हैं कि इस गलती को सुधारने का समय आ गया है। कारण कि इसके बिना तो समाज के सामने ख़तरा .मौजूद है ऐसी उथल-पुथल का जो पूँजीपति वर्ग और सामंतवाद के संघर्ष में होने वाली उथल-पुथल से अधिक लंबी और अधिक गंभीर होगी। इससे जाहिर है कि महाक्रांति के दौर के वर्ग संघर्ष की यादें इस समाजवादी टिप्पणीकार के मन में अभी भी बहुत ताज़ा हैं। वे उसे वर्गों के बीच तालमेल बिठाने की कोशिश करने पर मजबूर करती हैं। फुलाशे सेंत-साइमन के इस कथन का उद्धरण देते हैं कि अंग्रेज़ सर्वहारा पहला मुनासिव मौका मिलते ही अमीरों के ख़िलाफ़ गरीबों की लड़ाई शुरू करने के लिए तैयार हैं।" फिर वे आगे कहते हैं:


ये ही हालात हैं जिनमें हम रंगमंच पर आते हैं। हम पूँजीपति वर्ग से कहते हैं हम जनता की आवाज़ हैं और उसके लिए सहकार्य में उसका न्यायपूर्ण भाग माँग रहे हैं; एक जोश भरी आवाज़ हैं क्योंकि यह माँग न्यायोचित है,


काल्पनिक समाजवाद की धाराएँ /37.


लेकिन शांतिपूर्ण आवाज़ हैं क्योंकि, भविष्य के हरकारे होने के नाते, हमें अपने गुरु से यह ज्ञान मिला है कि हिंसा प्रतिगामी होती है और इसका दौर खत्म हो चुका है। जनता से हम कहते हैं, हर रोज़ दोहराते हैं: हम पूँजीपति वर्ग की आवाज़ हैं। तुम सब लोग जो तकलीफ़ भोग रहे हो, सार्वभौम सहकार्य की माँग करो और वह तुम्हें मिलेगा क्योंकि यही ईश्वर की इच्छा है। लेकिन यह तुम्हें तभी दिया जाएगा जब तुम शांतिपूर्ण और क्रमिक ढंग से इसकी माँग करोगे। कारण कि आज श्रम के साधन जिन लोगों के हाथों में हैं उनसे तुम उन्हें अगर बलपूर्वक छीनने की कोशिश करोगे, तो याद रखो कि जो ताक़तवर लोग तुम्हारे गुस्से को एक दिशा दे रहे होंगे वे अपने लिए उन हवेलियों और महलों को बहुत बड़ा या बहुत शान-शौकत से भरपूर नहीं पाएँगे जिनके मालिकों को वे पहले ही निकाल चुके होंगे, और तुम्हारे तो सिर्फ मालिक बदलेंगे। 42


‘ताक़तवर लोगों' संबंधी यह चेतावनी हो सकता है आज के पाठक को हैरान करे। लेकिन टिप्पणीकार के लिए इसमें हैरानी की कोई बात नहीं थी। फुलाशे का विश्वास था कि सर्वहारा वर्ग 'अपने अज्ञान के चलते अपनी आवश्यकताओं और अपनी आशाओं को स्पष्ट रूप से निरूपित करने में असमर्थ हैं। " वास्तव में ऐसे किसी सामाजिक वर्ग की नाक में नकेल डालकर उसे इधर-उधर घुमाना बहुत आसान था। सवाल तो कुल मिलाकर यह था कि राजनीति से परहेज़ क्या ऐसे किसी वर्ग के बौद्धिक विकास को बढ़ावा देता


तालमेल की यह मानसिकता उस युग की भावना में, और अधिक सही ढंग से कहें तो उस युग के सामाजिक प्रश्नों में रुचि रखनेवाले व्यक्तियों के मन में, कहाँ तक जड़ें जमाए बैठी थी, इसका पता प्रसंगवश निम्नलिखित तथ्य से चलता है।


पियरे लेरो" ने जब सेंत-साइमनवादियों का साथ पकड़ा-और हमें पता है। कि लेरो ने रूस में, बेलिंस्की और हर्ज़ेन के हलके में भारी दिलचस्पी जगाई तथा उन्होंने सावधानी बरतते हुए उन्हें प्योत्र राइझी कहा- तब उन्होंने सेंत-साइमनवादियों के 'सिद्धांत' के शांतिपूर्ण चरित्र का ज़िक्र ऐसे पहलू के रूप में किया जिन्होंने उन्हें सबसे अधिक प्रभावित किया था।"


लुई ब्लांक" एक और व्यक्ति थे जो वर्ग संघर्ष के कट्टर विरोधी थे। उनकी प्रसिद्ध रचना Organisation du trawail (श्रम का संगठन) इन शब्दों से शुरू होती है : 'यह पुस्तक तुमसे, ऐ अमीरो, तुमसे, सम्बोधित है क्योंकि यह गरीबों का एक सवाल है। कारण कि उनका ध्येय तुम्हारा ध्येय है। आगे चलकर इसी गुज़ारिश का एक और, थोड़ा संशोधित रूप मिलता है : "यह गुज़ारिश मैं दोहरा दूँ कि तुमसे


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है; ऐ अमीरो, तुमसे है..हाँ, यह ध्येय, गरीबों का यह पवित्र ध्येय तुम्हारा ही है। सिर्फ उनकी मुक्ति ही तुम्हें मधुर आनंद के उन खजानों का पता देगी जिनको तुमने अभी तक जाना ही नहीं है।"


रहे प्रदों" जिन्हें आज भी बहुत से लोग किसी न किसी कारण से एक महान क्रांतिकारी मानते हैं, तो उन्होंने भी एक क्रांतिकारी ढंग से सामाजिक प्रश्न उठाए जाने की बात को खारिज कर दिया था। मार्क्स के नाम 17 मार्च 1846 के एक पत्र में वे कहते हैं: 'हमें सामाजिक सुधार के साधन के तौर पर क्रांतिकारी कार्रवाई की बात नहीं करनी चाहिए क्योंकि यह दिखावे का साधन बलप्रयोग की, निरंकुश शासन की अपील मात्र होगा और, संक्षेप में, एक अंतर्विरोध होगा। इसीलिए अपने सामने इस समस्या को मैं इस प्रकार रखता हूँ: एक आर्थिक संयोजन के ज़रिये समाज को वह दौलत लौटाना जिसे (पूँजी पर ब्याज, भू-कर, मकान का किराया, सूदखोरी के रूप में) एक दूसरे आर्थिक संयोजन ने उससे ले लिया है। दूसरे शब्दों में, स्वतंत्रता और समानता सुनिश्चित करने के लिए राजनीतिक अर्थशास्त्र में संपत्ति के सिद्धांत को संपत्ति के ही खिलाफ़ मोड़ देना।"


एक आर्थिक संयोजन के द्वारा सामाजिक समस्या को हल करने की यह इच्छा राजनीति के निषेध की सूचक है जिसके बारे में अब तक हम खूब जान चुके हैं। प्रूदों के विचारों में इस निषेध की हमेशा निर्णायक भूमिका रही है। यही उन्हें अराजकवाद" की ओर ले गया और यह उनके पास से फिर एम ए बाकुनिन, एलिसी रेक्लस, पी ए क्रोपातकिन, जे ग्रेव और अराजकवाद के दूसरे सिद्धांतकारों तक, और साथ ही आज के फ्रांसीसी और इतालवी 'क्रांतिकारी संघवादियों तक भी पहुंचा।


1848 में प्रूदों ने, शब्दों को इधर-उधर घुमाकर जैसी कि उनकी आदत थी, ऐलान किया कि अस्थायी सरकार लाल रंग पर तिरंगे को वरीयता देती है। बेचारे लाल झंडे, हर कोई तुम्हें त्याग रहा है लेकिन तुम्हें में चूमूँगा, मैं तुम्हें सोने से लगाऊंगा ....लाल झंडा मानवजाति के संघ का परचम है। लेकिन लाल झंडे के प्रति इस पुरजोश समर्पण भाव ने उन्हें सर्वहारा और पूँजीपति वर्ग के मेल का उपदेश देने से जरा भी नहीं रोका मसलन जब बेसानश्योन से उन्हें उम्मीदवार बनाने का प्रस्ताव रखा गया तब उन्होंने अपने चुनाव-भाषण में लिखा 'मजदूरो, अपने मालिकों की और अपने हाथ बढ़ाओ और ऐ मालिको, उन लोगों को को ठुकराओ जो तुम्हारे मज़दूर से अपने पत्र La Voix du Pouple (20 मार्च 1850 के अंक में उन्होंने लिखा पूँजीपति वर्ग और वर्ग की एकता का अर्थ, पहले की तरह आज भी, भूदास की मुक्ति है, पूंजीपति और कुलीन के ख़िलाफ़ उद्योगपतियों और मजदूरों का एक प्रतिरक्षात्मक और काम गठबंधन है, सर्वहारा और मालिक के हितों की एकजुटता  है।' 54


पूजीपति के खिलाफ मालिक का यूँ खड़ा किया जाना दिखाता है कि सटीक


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कहें तो पूँजीपति वर्ग (बुर्जुवाज़ी) से प्रूदों की मुराद निम्न-पूँजीपति वर्ग (पेटी बुर्जुबाज़ी) से थी उन्होंने मालिक को मुलाज़िम कारीगर (जर्नीमैन) से हाथ मिलाने की दावत दी। उन दिनों के समाज में मौजूद आर्थिक संबंधों पर काल्पनिक समाजवादियों के दृष्टिकोण की लाक्षणिक सामग्री के रूप में यह बात ध्यान देने योग्य है। मुझे उनके विचारों का आगे और भी विस्तार से विशेषण करना है। इस बीच में बस एक और बात कहूँगा प्रूदों की पुस्तक Idee generale de la revolution au dixneuvieme siecle (मध्य-19वीं सदी में क्रांति का सामान्य विचार) पूँजीपति वर्ग को समर्पित थी; इस किताब ने जो 1851 में प्रकाशित हुई थी, एक लंबे समय तक के लिए लातीनी देशों और रूस के समाजवादियों के विचारों पर गहरे नक़्श छोड़े। इसका समर्पण-पृष्ठ उस वर्ग की तारीफ़ में एक पूरे चारण-गीत की हैसियत रखता है 'तुम्हारे नाम, ऐ पूँजीपति, इन नये लेखों का यह अर्घ्य तुम्हारे नाम! समस्त युगों में तुम्हीं सबसे अधिक निर्भीक, सबसे कुशल क्रांतिकारी रहे हो...तुमने और सिर्फ़ तुम्हीं ने...हाँ, तुम्हीं ने 19वीं सदी में सिद्धांतों का निरूपण किया, क्रांति की बुनियाद डाली। तुम्हारे बिना या तुम्हारे ख़िलाफ़ किया गया कोई काम चल नहीं सका। तुम्हारा किया हुआ कोई काम बेकार नहीं गया। तुम्हारा तैयार किया हुआ कोई मंसूबा नाकाम नहीं होगा...क्या ऐसा हो सकता है कि इतनी इतनी क्रांतियाँ कर लेने के बाद, आखिर में तुम दिलचस्पी के बावजूद, बुद्धि के बावजूद, सम्मान के बावजूद निराशाजनक सीमा तक प्रतिक्रांतिकारी हो जाओ?" वगैरह-वगैरह। आगे चलकर प्रूदों 1798 की क्रांति की बात भी करते हैं जिसके दौरान, उनके शब्दों में, जनता के बातूनी जननेता कुछ भी नहीं कर सके, और बात करते हैं 1848 की क्रांति की जो सामाजिक प्रश्न को हल करने में असमर्थ रही। फिर वे एक बार फिर पूँजीपति वर्ग से सर्वहारा के साथ तालमेल बिठाने की गुज़ारिश करते हुए अपनी बात ख़त्म करते हैं: 'मैं कहता हूँ तुमसे : तालमेल ही क्रांति है। इससे कोई यह बात सोच सकता है कि प्रूद 1851 में एक क्रांतिकारी बन चुके थे, मगर उनकी पुस्तक की अंतःवस्तु इस धारणा का खंडन करती है। बेहद विस्तार के साथ वे एक ख़ासे शांतिपूर्ण 'सामाजिक विसर्जन' (सोशल लिक्वीडेशन) की योजना पेश करते हैं जिसे वे सिर्फ़ इसलिए सामाजिक क्रांति


का नाम देते हैं कि वे आम तौर पर शब्दों का बुरी तरह दुरुपयोग करते हैं। क्रांतिकारी कार्रवाई से काल्पनिक समाजवादियों के मिसाली परहेज़ को एतियेन काबे ने बड़े क्लासिकल ढंग से व्यक्त किया था


अगर क्रांति मेरी मुट्ठी में होती तो मैं हरगिज़ अपनी मुट्ठी नहीं खोलता, भले ही मुझे इसके लिए जलावतन होकर परदेस में मरना पड़ता।57


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चार


इस तरह काल्पनिक समाजवादी समकालीन समाज में वर्ग-संघर्ष के अस्तित्व को स्वीकार करते हैं। लेकिन वे अपनी सुधार की योजनाओं को इस संघर्ष के अनुसार नहीं डालते और अपने उद्देश्यों को साकार करने के लिए उसका लाभ उठाने से दृढ़ता से इनकार करते हैं। वे वर्गों के बीच तालमेल बिठाकर अपनी योजनाओं को अमल का जामा पहनाने की आशा रखते हैं। इसी की संगति में ये क्रांतिकारी कार्रवाई को खारिज करते हैं और राजनीति की ओर से मुँह मोड़ लेते हैं।58


जब जुलाई क्रांति भड़क उठी, संत-साइमनवादियों ने उसमें कोई भाग न लेने का फैसला किया। प्रांतों में रह रहे संत-साइमनवादियों के नाम एक संदेश में उनके 'फादर' बाजेयर और 'फादर' इनफैलिन ने लिखा 'आज जो विजयी हैं, निःसंदेह उस बात पर नाराज़ होंगे जिसे वे हमारी सर्द-दिली और हमारी उदासीनता कहेंगे, हम उनके अपमानजनक शब्दों और उनके कृत्यों को बरदाश्त करने के लिए तैयार हैं...प्यारे बच्चों, एक और भी सुखद भविष्य हमारी राह देख रहा है। इस और भी सुखद भविष्य की कुंजी 'पृथ्वी पर प्रभु के साम्राज्य को साकार करने के लिए प्रयास करना है।


लेकिन राजनीति की ओर से मुँह मोड़ने का यह मतलब नहीं कि ऐतिहासिक कुरुक्षेत्र से उसमें सक्रिय राजनीतिक शक्तियों गायब हो जाएँ। राजनीति से परहेज़ करते हुए भी काल्पनिक समाजवादियों को उन राजनीतिक शक्तियों की मौजूदगी स्वीकार करनी पड़ी। लेकिन किस तरह? उनके लिए बस एक रास्ता खुला था: किसी विशेष राजनीतिक शक्ति के किसी प्रभावशाली प्रतिनिधि को यह विश्वास दिलाना कि उसके अपने ध्येय के हित, अगर सही-सही उन्हें समझा जाए तो उनकी समाज-सुधार की योजना के यथाशीघ्र व्यवहार की मांग करते हैं। लेकिन उसे विश्वास कैसे दिलाया जाए? इसका दारोमदार इस पर था कि सुधारक ने अपील किससे की और वह अपील किन विशेष परिस्थितियों में की गई। सेंत-साइमन जब नेपोलियन प्रथम का ध्यान अपनी रचनाओं की ओर खींचना चाहते थे तब उन्होंने एक रचना को ऐसा शीर्षक दिया जिसमें यह दिखाने का वादा किया गया था कि इंग्लैंड पर विजय किस प्रकार पाई जा सकती है, हालांकि वास्तविक रचना एक विलकुल ही भिन्न विषय पर थी। जब फूरिये के मन में यह बात समाई कि लूई फिलिप को वे अपनी और लाएं, जिन्हें पड्यंत्रकारी परेशान कर रहे थे, तब यह दोहराने लगे कि फैलेस्तरियों59 की स्थापना क्रांतिकारियों का सबसे अच्छा उपाय थी। जुलाई राजतंत्र की पुलिस ने जब बेरी की डचेज़ को अपने पुत्र अर्थात् बोर्दियों के यूक के पक्ष में  पुनर्स्थापना का प्रयास करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया और पूरे समाज में यह अवाह त गई कि वह मौत की सजा पाएगी, तब 'फादर'


काल्पनिक समाजवाद की धारा 41

इतफैतिन ने फ़ौरन महारानी के नाम एक खुला पत्र लिखा जिसमें मौत की सजा का विरोध करते हुए उन्होंने स्त्रियों की भावी मुक्ति की (मोटे अक्षरों में) घोषणा की। इस पत्र के बारे में अपने बच्चों को जानकारी देते हुए उन्होंने आशा व्यक्त की कि इससे 'राजनीति में स्त्रियों के प्रवेश को बढ़ावा मिलेगा।60 बाद में अल्जीयर्स चले जाने के बाद इनफैतिन ने अपने एक पत्र-मित्र के माध्यम से लियास के ड्यूक से संपर्क बनाने की कोशिश की। इस कोशिश का यह त्रासद- हास्यास्पद परिणाम निकला कि इयूक ने कृपा की बारिश करते हुए संत-साइमनवादियों के इस 'सर्वोच्च फादर' को सब-प्रिफ़ेक्ट का पद देने की पेशकश की। दुर्भाग्य से इन्फ्रेंतिन को फिर भी गंभीरता का उपहार नहीं मिला। वे ताजदारों को उपदेश देने की लंबी-चौड़ी योजनाएँ बनाने से बाज़ नहीं आए। इन योजनाओं के चलते उन्होंने कुछ तो बहुत ही भोंडी गलतियों कीं; वैसे यह सही है कि इन गलतियों की प्रकृति व्यावहारिक से कहीं बहुत अधिक सैद्धांतिक थी। हमें पता है कि संत-साइमनवादियों में हाइने की दिलचस्पी और उनसे हमदर्दी थी। उनकी पुस्तक De Allemagne का पहला संस्करण 'फादर' इनफ़ैतिन के नाम समर्पित था। उन्होंने 'हाइनरिख हाइने के नाम' शीर्षक से जवाब में एक पत्र प्रकाशित कराया जिसमें उन्होंने कुछ राजनीतिक विचार व्यक्त किए। ये बहुत नरमी से कहें तो हैरानकुन थे।


जर्मनी की बात करते हुए इनफ़फैतिन ने आस्ट्रिया (मैटरनिख के आस्ट्रिया) के प्रति बेपनाह हमदर्दी का परिचय दिया। उनकी राय में आस्ट्रिया व्यवस्था, सोपान-व्यवस्था (हायरार्की), कर्त्तव्य भावना और विशेषकर शांति का प्रतिनिधित्व करता था। 'यह स्वीकार करके कि स्वतंत्रता और समानता का मताग्रह जनगण के मार्गदर्शन के लिए न तो पर्याप्त पूर्ण है और न पर्याप्त संपन्न है, आइए हम आस्ट्रिया को आशीर्वाद दें कि उसने इन शुद्ध क्रांतिकारी विचारों का विरोध किया और उन्हें बल्कि जोजफ़ द्वितीय के रूप में निकाल बाहर भी किया; आइए हम उस राष्ट्र के उदात्त धैर्य को आशीर्वाद दें जो नेपोलियन के रूप में साकार होने वाली क्रांति के बरछों की चुभन को बराबर झेल रहा है... आइए, हम आस्ट्रिया को आशीर्वाद दें कि उसने सामंती विधान के अंतिम प्रतिनिधियों, अर्थात् हमारे बोर्बनों को सम्यक् शरण दिया, क्योंकि उस संक्रमण के रूप के बारे में अभी तक प्रभु ने अपना अंतिम निर्णय नहीं दिया है जिससे होकर मानवजाति पुराने विधान का उन्मूलन करेगी और नये विधान को अपनाएगी। आखिर में आइए, हम उसे इस बात के लिए आशीर्वाद दें के उसने अपना लौह हाथ आल्प्स पर्वत के पार तक फैलाया है जो इतालवी जनगणों को काबू में रखता है और उन्हें एक दूसरे की छुरा घोंपने से रोकता है। जिन राष्ट्र में स्वतंत्रता का उबाल जारी है उनसे घिरा होकर भी आस्ट्रिया अपनी शांतिमय और साधिकार वाणी में लगातार दोहरा रहा है:  बच्चो, तुममें व्यवस्था के प्रति प्रेम नहीं, अभी तक तुम स्वतंत्रता के लिए परिपक्व नहीं हुए।'


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फिर इन्फ्रेंतिन यह स्वीकार करते हैं कि पवित्र गठबंधन के खिलाफ़ तथा 'कैबिनेट्स की दक्रियानूसी' के खिलाफ़ जारी लड़ाई उन्हें एक, काफ़ी-कुछ भोंडी चीज़ मालूम होती थी; 'कम से कम एक दृढ़ चरित्र वाले व्यक्ति के लिए' तो थी ही। 62 


इस पर हाइने की खामोश प्रतिक्रिया यह थी कि इनफैतिन के प्रति लिखे गए समर्पण-शब्दों को उन्होंने अपनी पुस्तक के बाद के संस्करणों में नहीं छपने दिया। जाहिर है कि यही अपने आपमें उनकी सबसे मुखर आलोचना थी।63


ऐसा शायद नहीं कि वैधानिकता के प्रति इनफ़ैतिन का कोई खास लगाव रहा हो। वे बस ये चाहते थे कि उच्च पदों पर बैठे लोगों के बीच कूटनीतिज्ञों जैसे शिष्टाचार के साथ अपना प्रवचन कार्य जारी रखें जबकि ये लोग अपनी स्थिति के ही कारण 'व्यवस्था बनाए रखने में दिलचस्पी रखते थे। 


जब लुई बोनापार्त ने, जिसे वैधानिकता का दोष शायद दिया ही नहीं जा सकता था, फ्रांस में तख्तापलट किया, इनफैतिन इस सौभाग्यशाली दुस्साहसी की ओर प्रेम की पींगें बढ़ाने लगे; उन्होंने तो बल्कि उसके लिए कार्रवाई की एक पूरी योजना ही बना डाली। यह सही है कि यह कोई खास स्पष्ट योजना नहीं थी। इनफैतिन चाहते थे कि लुई बोनापार्त शुभ समाजवाद के लक्ष्य की सेवा करे। इस सेवा का मतलब यह था कि सैन्यवाद को विदाई दी जाए और फ्रांस में औद्योगिक विकास को जोर-शोर से आगे बढ़ाया जाए।64 


पाठक ने शायद यह देखा हो कि मेरी पूरी प्रस्तुति का सुर व्यंग्यात्मक रहा है। कहने की जरूरत नहीं कि उच्च पदस्थ व्यक्तियों के बीच इनफैतिन के प्रवचन कार्य को आज हम पीछे मुड़कर देखें तो बिना मुस्कुराए नहीं रह सकेंगे। लेकिन इसे सिर्फ़ इनफैतिन की भूल मानना गलत होगा। इस तरह की गलती राजनीति के प्रति काल्पनिक समाजवादियों के इस नकारात्मक दृष्टिकोण की स्थायी और तार्किक उपज थी जिसकी और मैंने ध्यान दिलाया है। राजनीति का अस्वीकार तार्किक रूप से राजनीतिक षड्यंत्रों का कारण बन गया। (यह अस्वीकार उनके साथ भी यही कर रहा है जो आज उसी गलती को दोहरा रहे हैं) काल्पनिक समाजवाद के कुछ प्रतिनिधियों ने अपनी साज़िशों के दौरान दूसरों के मुकाबले निःसंदेह अधिक भोंडी गलतियों कीं। लेकिन यह बस तफ़सील की बात है। दुनियादी बात है कि राजनीति का त्याग करने और षड्यंत्र-वृत्ति अपनाने के बाद सबसे यशस्वी लोग भी इस तरह की गलतियाँ करने से नहीं बच सके जो आज हमें काफ़ी असंभाव्य लगती हैं।


इसका विश्वासोत्पादक प्रमाण यह रहा। 'आतंक-पुरुष' प्रूदों सामान्यतः 'सर्वोच्च फादर' इनफ्रेंतिन से बहुत ही भिन्न थे। अनेक अर्थों में वे इनफफैतिन के ठीक उलट थे। लेकिन इनफ्रेंतिन ने जो हैरान कर देने वाली गलतियाँ की थीं, ठीक वैसी ही गलतियों करने से प्रूदों भी नहीं बच सके।


प्रूदों फ्रांसीसी अराजकवाद के जन्मदाता के रूप में जाने जाते हैं।65 अराजकवादी


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के रूप में वे राजनीति के प्रति घोर अपमान भाव रखते थे। लेकिन फिर भी राजनीति के प्रति उनका अपमान भाव भी उन्हें राजनीतिक षड्यंत्रों से दूर नहीं रख सका। उलटे, इसने उनको उन्हीं में फँसा दिया। वे अपने एक पत्र में कहते हैं कि वह जो राजनीति में शामिल होता है, उसे अपना हाथ गोबर में धोना चाहिए। यह गोबर से हाथों को धोना राजनीतिक षड्यंत्र ही है। वे कभी-कभी कितने जोश के साथ इसमें शामिल हुए, यह उनकी पुस्तक La revolution social, demontree par le coup d'etal du 2 decembre से ज़ाहिर है। इसमें वे पाठक को और निःसंदेह सबसे बढ़कर खुद लुई बोनापार्त को यह भरोसा दिलाने की जी-तोड़ कोशिश करते हैं कि 2 दिसंबर67 का ऐतिहासिक अर्थ 'जनबादी और सामाजिक क्रांति' था।68  


राजनीतिक षड्यंत्र जब इतनी तीव्रता ग्रहण कर लें तो यह राजनीति के निषेध के तार्किक परिणाम से अधिक भी कुछ होता है। यह संभवतः इसमें संलग्न काल्पनिक समाजवादियों के सामाजिक विचारों की असंगतियों और दिशाभ्रम का सबसे अच्छा सूचक है।


पाँच


अब मैं पाठक को यही याद दिलाना चाहूँगा कि फ्रांस में 19वीं सदी के काल्पनिक समाजवाद में एक प्रवृत्ति ऐसी थी- साम्यवाद के रूपों में एक रूप-जो वर्ग संघर्ष से नफ़रत नहीं करती थी और राजनीति को बिलकुल नहीं नकारती थी, हालाँकि इसका वह एक बहुत संकीर्ण अर्थ लगाती थी। जैसा कि मैंने कहा, यह प्रवृत्ति सामान्य नियम का अपवाद थी। लेकिन इस अपवाद के अर्थ को अच्छी तरह समझने के लिए हमें सबसे पहले स्वयं नियम के सारे पहलुओं की छानबीन करनी होगी।


हालांकि काल्पनिक समाजवादियों ने वर्ग संघर्ष को अस्वीकार किया, पर साथ ही वे इसके ऐतिहासिक महत्त्व को समझ रहे थे। यह बात विरोधाभासी लग सकती है, पर फिर भी सही है। पाठक को पता ही है कि संत-साइमन, फूरिये और उनके अनुयायियों की नज़रों में फ्रांस की महाक्रांति 'अमीरों के ख़िलाफ़ ग़रीबों की लड़ाई' थी। सच तो यह है कि फ्रांसीसी क्रांति के बारे में सेंत-साइमन ने अपने ध्यान देने योग्य विचारों को बहुत पहले, 1802 में ही व्यक्त किया था, जिन्हें उन्होंने बाद में कुछ विस्तार से विकसित किया। उन्होंने कहा कि हर देश में बुनियादी क़ानून वही होता है जो संपत्ति को और उसकी रक्षा करनेवाली संस्थाओं को संचालित करे। सामाजिक गठजोड़ का मक़सद उत्पादन होता है। फलस्वरूप जो लोग उत्पादन के अगुवा हैं, हमेशा इस गठजोड़ के मुखिया रहे हैं और रहेंगे। 15वीं सदी तक कृषि सामाजिक उत्पादन ही सबसे अहम शाखा थी। कुलीन वर्ग कृषि का मुखिया था। इसलिए असैनिक सत्ता उसके हाथों में केंद्रित थी। मगर धीरे-धीरे एक नयी सामाजिक शक्ति का - तीसरे जनवर्ग (वर्ड एस्टेट) का -उदय हुआ।  समर्थन पाने की ज़रूरत


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के चलते इस जनवर्ग ने राजतंत्र से गठबंधन किया और इस गठबंधन के माध्यम से उसने समाज के पूरे परवर्ती विकास को निर्धारित किया। ऐसा कहते समय सेंत-साइमन के मन में ख़ासकर फ्रांस की बात थी और उन्होंने इस बात की भारी निंदा की कि लुई चौदहवें के रूप में राजतंत्र ने तीसरे जनवर्ग को धोखा दिया और कुलीन वर्ग की ओर झुक गया। बोर्बनों ने इस गलती की बहुत भारी कीमत चुकाई, हालाँकि यह तीसरे जनवर्ग की प्रगति को रोक नहीं सकी। सड़ी-गली सामंती व्यवस्था के खिलाफ़ नयी औद्योगिक व्यवस्था के संघर्ष ने ही फ्रांसीसी क्रांति को जन्म दिया और यही हमारे दौर के सबसे महत्त्वपूर्ण सामाजिक घटनाक्रमों का निर्धारण कर रही है।


दर्शन और इतिहास पर सेंत-साइमन के विचार उनसे फिर आगस्तिन थियेरी को मिले। सेंत-साइमन तो यह भी समझते थे कि गीज़ो ने भी उन विचारों को अपने ऐतिहासिक अनुसंधानों का आधार बनाया। हो सकता है कि यह महान फ्रांसीसी •इतिहासकार सेंत-साइमन से स्वतंत्र रूप से इन विचारों पहुँचा हो; ऐसे ऐतिहासिक विचार उन दिनों खासे व्यापक थे। एक बात को लेकर कोई शक नहीं: गिज़ो, थियेरी, मिग्ने और उस प्रवृत्तिवाले तमाम फ्रांसीसी इतिहासकार ठीक वैसे ही ऐतिहासिक विचार रखते थे जिनको मूलतः सेंत-साइमन ने सुव्यवस्थित ढंग से पेश किया था। इन विचारों का अध्ययन करते समय अनायास और अकसर हमें उस सिद्धांत की याद आती है जो आगे चलकर अस्तित्व में आया और ऐतिहासिक भौतिकवाद के नाम से जाना गया। ये विचार इस सिद्धांत के विस्तृत निरूपण के लिए, बिना शक, बहुमूल्य सामग्री थे। लेकिन कुछ समय तक ऐतिहासिक विचारवाद के घोर अतिवादी रूपों के साथ भी उनका तालमेल जारी रहा। आगे चलकर मैं इस ज़ाहिरा तौर पर अजीबो-गरीब स्थिति की व्याख्या करूँगा। हमारे अभी के मक़सद के लिए तो इतना ही कहना काफ़ी होगा कि सेंत-साइमन और फूरिये के पदचिह्नों पर चलते हुए फ्रांस के काल्पनिक समाजवादियों के एक विशाल बहुमत ने यूरोप के इतिहास में ऐसे वर्ग संघर्ष की एक लंबी प्रक्रिया देखी (यह सही है कि अफ़सोस के भाव से देखी, मगर देखी ज़रूर) जो कभी-कभी बेहद तीखा हो जाता था।


काल्पनिक समाजवादियों ने उस समाज में भी यही वर्ग संघर्ष देखा जिसमें ये रहते थे; सच तो यह है कि इसके बारे में उनका बात करना कभी थमा ही नहीं। वे संघर्ष के अस्तित्व पर ताली पीटते थे और युद्धरत वर्गों को एक साथ लाने के प्रयास करते थे। उनके व्यावहारिक पक्ष को लें तो उनकी विभिन्न विचार प्रणालियाँ ऐसे उपायों के संग्रह से अधिक कुछ भी नहीं थीं जिनका उद्देश्य वर्गयुद्ध समाप्त करना और सामाजिक शांति की स्थापना करना था। लेकिन वे वर्गयुद्ध का मातम और सामाजिक शांति के लिए प्रयास करते थे, यह तथ्य ही इसका प्रमाण है कि वे इस युद्ध के अस्तित्व को पूरी तरह स्वीकार करते थे। इसलिए यह प्रश्न स्वाभाविक


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रूप से उठता है: फ्रांस के काल्पनिक समाजवादियों की निगाहों में कौन-कौन से वर्ग आधुनिक समाज में जारी युद्ध के वे प्रमुख पक्ष थे ? समाजवादी विचारों के इतिहास के लिए इस प्रश्न का उत्तर अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। 


जैसा कि इशारा किया जा चुका है, सेंत-साइमन का विचार था कि उनके समय के समाज के आंतरिक जीवन की सबसे महत्त्वपूर्ण घटनाएँ पुरानी सामंती व्यवस्था के ख़िलाफ़ नयी औद्योगिक व्यवस्था के संघर्ष से - संक्षेप में, सामंतवादियों के खिलाफ़ उद्योगपतियों के संघर्ष से निर्धारित हो रही थीं। सेंत-साइमन की राय में यही संघर्ष उनके काल का सबसे महत्त्वपूर्ण वर्ग संघर्ष था। कहा: "पंद्रह सदियों के काल में सामंती व्यवस्था क्रमशः विघटित और औद्योगिक व्यवस्था क्रमशः संगठित हुई। उद्योग-धंधों के प्रमुख प्रतिनिधियों की व्यवहार कुशलता औद्योगिक व्यवस्था को हमेशा-हमेशा के वास्ते स्थापित करने के लिए काफ़ी होगी, और समाज को उस सामंती ढांचे के मलबे से पाक करने के लिए भी जिसमें हमारे पूर्वज कभी रहते थे।70 लेकिन उद्योग-धंधों के ये प्रमुख प्रतिनिधि थे कौन? ज़ाहिर है, सर्वहारा नहीं थे। ये थे एक तो बैंकर और दूसरे, बड़े उद्योगपति। सेंत-साइमन उन्हें कामगारों के पूरे वर्ग के स्वाभाविक प्रतिनिधि और नेता मानते थे। कामगार क्या कर सकते हैं, इसके बारे में वे इन प्रतिनिधियों को कैसे धमकाते थे, हम इसे पहले ही देख चुके हैं। लेकिन वे ऐसा उनको मज़दूर वर्ग के स्वाभाविक अगुवों के रूप में उनके कर्तव्यों की याद दिलाने के लिए ही करते थे। हमें यह भी पता है कि कम से कम अपने जीवन के अंतिम भाग में संत-साइमन मजदूर वर्ग के सबसे निर्धन भाग के प्रति सरोकार को इन कर्तव्यों में पहला कर्त्तव्य मानते थे। तब उन्होंने कहा था 'सबसे बहुसंख्य और सबसे निर्धन वर्ग का नैतिक, बौद्धिक और शारीरिक सुधार ही सभी सामाजिक संस्थाओं का उद्देश्य होना चाहिए। यही उनकी आखिरी रचना Lenonveau christi anisme (नई ईसाइयत) का प्रमुख स्वर था लेकिन इस 'सबसे बहुसंख्य और सबसे निर्धन वर्ग को उद्योग-धंधों के प्रतिनिधियों के संरक्षण में होना चाहिए। संत-साइमन का तर्क था कि सामाजिक जीवन में अग्रणी भूमिका उद्योगों के उन उच्चपदस्थ प्रतिनिधियों-बैंकरों और उद्योगपतियों- की ही होनी चाहिए।


संत-साइमन जहाँ तक इस विचार के समर्थक थे, वहाँ तक वे 18वीं सदी के उन प्रगतिशील विचारकों के ध्येय के तात्कालिक उत्तराधिकारी थे जो लौकिक-पारलौकिक अभिजातों पर तीसरे जनवर्ग को विजय दिलाना अपना प्रमुख सामाजिक कार्यभार समझते थे। पाठक ने सियेस के इन सुप्रसिद्ध शब्दों को निश्चित ही सुना होगा: 'तीसरा जनवर्ग क्या है? कुछ भी नहीं उसे क्या बनना होगा? सब-कुछ।' सेंत-साइमन 18वीं सदी की संतान थे। यह सही है कि उनके जीवन के उत्तरार्द्ध में तीसरा जनवर्ग 'कुछ भी नहीं' नहीं रह गया था बल्कि बहुत कुछ बन चुका था। लेकिन अभी भी यह 'सब-कुछ नहीं बना था (मैं यहाँ याद दिला दूँ कि सेंत-साइमन का निधन 1825


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में हुआ, पुनर्स्थापना (रेस्टोरेशन) के काल में) और उन्होंने जल्द से जल्द उसे 'सब-कुछ' बनाने की कोशिश की। यही कारण है कि अमीरों को गरीबों की हालत के प्रति सरोकार दिखाने की बराबर दावत देते हुए भी, उन्होंने खुद तीसरे जनवर्ग के अंदर मौजूद सामाजिक संबंधों का विश्लेषण नहीं किया, अर्थात् एक ओर काम देनेवालों और दूसरी ओर उजरती मज़दूरों के संबंधों का उनका ध्यान पूरी तरह क्रांति के बाद स्थापित संबंधों पर, पुरानी व्यवस्था के प्रतिनिधियों और 'उद्योगपतियों के संबंधों पर केंद्रित था। उन्होंने अपनी मशहूर रचना पैराबोला में इन संबंधों का एक उल्लेखनीय और अच्छा खासा गंभीर विश्लेषण प्रस्तुत किया है। 71


उनके शिष्यों ने एक से अधिक अवसरों पर कहा कि सेंत-साइमन के विचारों को मानते हुए वे साथ ही साथ उन्हें और विकसित कर रहे हैं। यह तो मानना ही होगा कि अनेक मुआमलों में वे अपने गुरु से काफ़ी कुछ आगे बढ़ चुके थे। मिसाल के लिए वे उनकी अपेक्षा आर्थिक प्रश्नों में कहीं बहुत अधिक दिलचस्पी रखते थे। उन्होंने अर्थशास्त्र की दृष्टि से 'निठल्ला वर्ग' और 'कामगार वर्ग' जैसी अभिव्यक्तियों के अर्थ स्पष्ट करने की कोशिश की। निठल्ले वर्ग में उन्होंने लगान पर जीने वाले भूस्वामियों को शामिल किया और उन पूँजीपतियों को भी जिनकी आय उनकी पूँजी पर आनेवाले व्याज पर आधारित थी। Le Producteur (उत्पादक) में अर्थशास्त्र के बारे में इनफैतिन के जो लेख प्रकाशित हुए उनमें उन्होंने इन श्रेणियों के व्यक्तियों के बारे में बहुत कुछ कहा है। फिर भी ध्यान देने की बात है कि उन्होंने उद्योगपतियों के मुनाफ़ों को मज़दूरियों का समकक्ष ठहराया। रिकार्डों के लगान के सिद्धांत पर (मैं तो कहूँगा बेहद कम सफलता के साथ आपत्ति करते हुए वे साफ़-साफ़ कहते हैं: 'हम 'मज़दूरियाँ' शब्द में रोजगारदाता के मुनाफ़े शामिल समझते हैं क्योंकि हम उसके मुनाफ़ों को उसकी मेहनत का भुगतान मानते हैं।'72 रोजगार देने वालों और उनके उजरती मजदूरों के संबंधों की इस धारणा में औद्योगिक पूँजी और उजरती मज़दूरी के हितों के बीच किसी शत्रुता का सवाल ही नहीं था। पाठक को यह बात नहीं भूली होगी कि अनेक वर्षों बाद प्रूदों के विचार भी ऐसी ही अस्पष्टता से ग्रस्त थे। इस लेख में में उनके एक लेख से एक उद्धरण दे चुका हूँ जो 1850 में प्रकाशित हुआ था; इसमें उन्होंने बुर्जुवा वर्ग को दावत दी थी कि 'कुलीन और पूँजीपति' के खिलाफ़ संघर्ष में वह सर्वहारा से हाथ मिलाए।73 इस तरह की दावते सिर्फ ऐसे व्यक्ति के क़लम से लिखी जा सकती थीं जो पूँजीपति का अर्थ सिर्फ पूँजी पर ब्याज पाने वाला शख्स समझता हो। 


पूँजी पर ब्याज के सवाल की छानबीन करते हुए इनफैतिन ने इस तथ्य की विवेचना की है कि औद्योगिक रूप से विकसित देशों में ब्याज की दर पिछड़े देशों के मुक़ाबले बहुत ही कम है। इससे वे यह निष्कर्ष निकालते हैं कि आम तौर पर पूरे 'निठल्ले वर्ग' की आमदनी, उद्योग के विकास के कारण ही, बराबर घटती जाती


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है। कहते हैं 'हमारा ख़याल है...कि निठल्ले व्यक्ति का, संपत्ति के निष्क्रिय स्वामी का कारोबार बद से बदतर होता जाता है और पूँजी की तरह भूमि भी ऐसी शर्तों पर उठाई जाने लगती है जो उस पर काम करनेवालों की जहमत उठानेवालों के लिए अधिकाधिक अनुकूल होती हैं।74 आप देख सकते हैं कि यह सभ्य समाज के हालात की एक काफ़ी कुछ आशावादी धारणा है। इसमें यह बात भी जोड़ी जानी चाहिए कि इनफ़ैतिन की राय में राष्ट्रीय आय में स्वामियों और उजरती मजदूरों का मिलाजुला भाग बराबर बढ़ रहा था; इतना ही नहीं, वे समझते थे कि इसमें मज़दूरों का भाग भी बराबर बढ़ रहा था। स्पष्ट है कि अगर राष्ट्रीय आय में रोज़गार देने वालों और मज़दूरों का कुल मिलाजुला भाग एक निश्चित राशि हो तो उसका मज़दूरों को जाने वाला भाग सिर्फ़ उस भाग की क़ीमत पर बढ़ सकता है जो रोज़गार देनेवालों की जेबों में जाता है। इससे जाहिर है कि इनफ़ैतिन के यह मानने का कोई आधार नहीं था कि उजरती मज़दूर के हित और रोजगारदाता के हित मेल खाते हैं। लेकिन ये सवाल के इस पहलू पर क़तई कोई विचार नहीं करते। वे यह टिप्पणी करके ही संतोष कर लेते हैं कि पहले के मुक़ाबले आज मज़दूरों को बेहतर खाना-कपड़ा नसीब हो रहा है।75 यह बात उनकी समझ में नहीं आई कि मज़दूर वर्ग के जीवन की दशाओं में तब भी सुधार संभव है जबकि राष्ट्रीय आय में उसका भाग घट रहा हो, अर्थात् रोज़गार देनेवालों के हाथों उनका शोषण बढ़ रहा हो या, दूसरे शब्दों में, उनकी सापेक्ष निर्धनता बढ़ रही हो।


आम तौर पर यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि इनफ़तिन का अर्थशास्त्र का ज्ञान बहुत ही सतही था हालाँकि ले प्रोदक्तियर के पन्नों में वे इस क्षेत्र के प्रमुख सिद्धांतकार थे। जिस रिकार्डो से उन्होंने काफ़ी विवाद किया, स्पष्ट है कि उनके बारे में इनफ़ैतिन की जानकारी अप्रत्यक्ष स्रोतों पर आधारित थी और जे बी से उन्हें एक महान अर्थशास्त्री दिखाई देते थे। तमाम काल्पनिक समाजवादियों की तरह इनफ़ैतिन के लिए भी मुख्य प्रश्न 'क्या है' नहीं बल्कि 'क्या होना चाहिए' था। इसलिए स्वाभाविक है कि जो कुछ था उसकी वे सावधानी के साथ छानबीन तब तक ही करते थे जब तक कि जो कुछ होना चाहिए, उसके बारे में उनके विचार स्पष्ट न हो जाएँ। लेकिन तमाम दूसरे काल्पनिक समाजवादियों की तरह ही उनकी यह धारणा भी मुख्यतः नैतिक सोचों से निर्धारित थी। फलस्वरूप इनफ्रेंतिन बुर्जुवा अर्थशास्त्रियों के सिद्धांतों की जितनी आलोचना करते हैं, उससे कहीं अधिक उनकी नैतिकता की घुट्टी पिलाते हैं।76


ले प्रोदक्तियर ऐसे समय में प्रकाशित हो रहा था जब सेंत-साइमनवादियों के विचारों को एक पूरी तरह स्पष्ट रूपरेखा नहीं मिली थी। ऐसा माना जा सकता है कि आगे चलकर इस संप्रदाय के आर्थिक सिद्धांतों की अंतःवस्तु में और गहराई आई। वास्तव में बात ऐसी नहीं है। 1831 में आइज़क पेरेइरे द्वारा दिए गए व्याख्यान


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औद्योगिक पूँजी और उजरती मज़दूरी के संबंध पर वैसी ही अस्पष्टता का पता देते हैं और वही एकदम अस्वीकार्य तर्क दोहराया गया है कि 'श्रम द्वारा निठल्लेपन को दी गई रक्कमें लगातार कम हो रही हैं। जैसे-जैसे ये रक्कमें कम होंगी, मज़दूरों की खुशहाली ही नहीं बढ़ेगी बल्कि उत्पादन भी कहीं बहुत अधिक नियमित हो सकेगा।77


संत-साइमनवादियों के समाज की अर्थव्यवस्था पर उनके अस्पष्ट विचारों को ध्यान में रखते हुए यह बात माननी ही होगी कि, उनकी शांतिपूर्ण मनोस्थिति के बारे में तो कुछ कहना ही नहीं, उनके सिद्धांत ने भी उन्हें ऐसा कोई आधार प्रदान नहीं किया कि उजरती मज़दूरी और कारोबारी पूँजी के शत्रुतापूर्ण हितों का अस्तित्व स्वीकार करके उसके आधार पर वे व्यावहारिक कार्यकलाप की योजनाएँ बना सकें। उलटे, इसने उन्हें लाज़मी तौर पर सामाजिक शांति के उपदेश देने पर मजबूर किया। माना कि उन्होंने यह स्वीकार किया कि मज़दूर वर्ग और निठल्ले स्वामियों के हित शत्रुतापूर्ण हैं। इस शत्रुता को समाप्त करने के लिए उन्होंने उत्तराधिकार के उन्मूलन का प्रस्ताव किया जिसके कारण उनकी राय में उत्पादन के साधन सामाजिक स्वामित्व में आ सकेंगे। इस बारे में वे सचमुच अपने गुरु से मीलों आगे निकल गए जिन्होंने संपत्ति के स्वरूप को बदलने पर विचार ही नहीं किया था। लेकिन, जैसा कि इनफ्रेंतिन ने कहा, अगर निठल्ले स्वामित्व का कारोबार दिनों-दिन गिर रहा था या, दूसरे शब्दों में, अगर ब्याज दरों में कमी के कारण इस वर्ग की स्थिति कठिन से कठिनतर होती जा रही थी तो घटनाओं का क्रम ही उस सुधार के शांतिपूर्ण व्यवहार की संभावना सुनिश्चित करता जो संत-साइमनवादियों द्वारा प्रस्तावित सुधारों में सबसे अहम था अर्थात् उत्तराधिकार के उन्मूलन का। इसलिए इस सिलसिले में भी सामाजिक विकास के शांतिपूर्ण मार्ग में सेंत-साइमनवादी अपने प्रिय विश्वास से चिपके रहे।


पाठक आसानी से इस बात को महसूस करेगा कि उत्तराधिकार के उन्मूलन का प्रस्ताव रखकर सेंत-साइमनवादियों ने अपने दौर के कूपमंडूकों को ऐसा डराया कि उनकी जान ही निकल गई। ये कूपमंडूक सेंत-साइमनवादियों को साम्यवादी समझते थे और एक हद तक आज भी समझते हैं। अभी हाल में रूसी सामाजिक विचारों के एक इतिहासकार ने उन्हें इसी रूप में पेश किया है।) मगर उन्हें साम्यवादी मानने का कोई कारण न था और न है। यह एक ऐसी सच्चाई है जिसे अपने प्रकाशनों में उन्होंने खुद ही बार-बार दोहराया है।


सेंत-साइमनवादियों की शिक्षाओं के अनुसार उत्पादन के जो साधन समाज की संपत्ति बनेंगे उन उत्पादकों के हवाले कर दिए जाएँगे जो उन्हें सफलता से प्रयोग करने में समर्थ होंगे। लेकिन उनके मन में लघु उद्योगों को बहाल करने का विचार कभी आया ही नहीं, वे बड़े पैमाने के औद्योगिक उद्यमों के पक्के समर्थक थे। इन उद्यमों की आय का वितरण कैसे होगा ? सेंत-साइमनवादियों ने कहा हरेक को उसकी योग्यता के अनुसार, हरेक योग्यता को उसके कामों के अनुसार। तो कामों का निश्चय


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कैसे करें? हम जानते हैं इनफ़तिन का विश्वास था कि उद्योगपति का मुनाफ़ा उसकी मजदूरी ही था। यहाँ से यह विश्वास बस एक क़दम की बात रह जाता है कि अगर एक विशेष स्वामी अपने मज़दूर के मुक़ाबले अतुलनीय सीमा तक 'अधिक' मज़दूरी पाता है तो यह उसके काम की मात्रा में मौजूद अंतर का परिणाम है। इसलिए आश्चर्य की बात नहीं कि अन्य संप्रदायों के बहुत से समाजवादियों ने-मिसाल के लिए फ्रांस में कम्युनिस्टों, लुई ब्लांक और अन्य ने, रूस में एन जी चेनशेव्स्की ने-'हरेक को उसकी योग्यता और कामों के अनुसार' के सेंत-साइमनवादी सिद्धांत को निर्णायक रूप से अस्वीकार कर दिया। हो सकता है इस तरह के तर्क बहुत बोदे लगें : रीछ मारा जाए, उससे पहले उसकी चमड़ी के बंटवारे को लेकर हुज्जत करने के भला क्या मानी? और आसानी से हम देख सकते हैं कि सेंत-साइमनवादियों के समाजवादी विरोधियों की आलोचनात्मक पद्धतियाँ हमेशा संतोषजनक नहीं होती थीं। सच तो यह है कि उन्होंने अधिकतर सेंत-साइमनवादियों की गलतियाँ ही दोहराई; जिन सवालों की छानबीन उत्पादन के संबंधों के, अर्थात् सामाजिक अर्थव्यवस्था के दृष्टिकोण से की जानी चाहिए थी, उनकी छानबीन उन्होंने नैतिकता, न्याय और इसी तरह के अमूर्त सिद्धांतों के दृष्टिकोण से किया। फिर भी उनकी पद्धति की गंभीर त्रुटि के बावजूद अपने ढंग से वे सही थे। वितरण के जिस सेंत-साइमनवादी सिद्धांत की उनकी निंदा की उसमें वह पूरी की पूरी अस्पष्टता मौजूद थी जिसे हम उस दौर के समाज के उत्पादक संबंधों पर सेंत-साइमनवादियों की शिक्षा में पहले ही देख चुके हैं। आज के समाज की बातें करते हुए जो शख्स रोज़गारदाता के मुनाफ़े को मज़दूरियों से गड्डमड्ड करता है, इसका बहुत गंभीर जोखिम उठाता है कि एक भावी सामाजिक व्यवस्था संबंधी उसकी योजना में 'मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण' के लिए एक खासी लंबी-चौड़ी जगह बची रह जाएगी। सर्वहारा अगर अपने श्रम से रोज़गारदाताओं को समृद्ध बनाता है तो वह कारखाना चाहे खुद मालिक के हाथ में हो, किसी और व्यक्ति के हाथ में हो या अंततः समाज के हाथ में हो, सर्वहारा के लिए तो बस एक जैसा ही है। अपने बचाव में सेंत-साइमनवादी यह दावा कर सकते थे कि उनकी योजना के अनुसार बने समाज में उद्योग-धंधे आज की तरह असंगठित नहीं, संगठित होंगे। आज के मालिकों की जगह समाज की सेवा में रत, उद्योगों के अगुवे ले लेंगे और समाज से अपना मेहनताना पाएँगे। मगर इसके साथ हम फिर उसी पुराने सवाल पर पहुँच जाते हैं : 'उद्योगों के अगुवों' को दिए जाने वाले मेहनताने की मात्रा का निश्चय कैसे हो? दूसरे शब्दों में, क्या संत-साइमनवादी समाज इन अपेक्षाकृत थोड़े से अगुवों के हाथों उत्पादक जनता के विशाल बहुमत के शोपण पर आधारित नहीं होगा ? संत-साइमनवादी उसका भी कोई जवाब नहीं दे सके, सिवा उनके 'कामों का हवाला देने के। मगर इससे कुछ भी स्पष्ट नहीं


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होता। वास्तव में अंत तक इस विषय के आर्थिक पक्ष के बारे में वे कुछ सोच ही नहीं सके।

छः


आधुनिक समाज में आर्थिक विकास क्रम के बारे में सेंत-साइमनवादियों के आशावादी विचारों में काल्पनिक समाजवादियों के दूसरे संप्रदाय साझीदार नहीं थे। सेंत-साइमन के महान समकालीन और विरोधी फूरिये ने यह मानने से दो-टूक इनकार कर दिया कि कामगार या उनके शब्दों में गरीब वर्ग की स्थिति सुधर रही थी। उन्होंने कहा : 'सामाजिक प्रगति एक भ्रांति है। धनी वर्ग आगे बढ़ रहा है, लेकिन निर्धन वर्ग जहाँ था, वहीं है, अर्थात् शून्य पर।78 कभी-कभी तो वे और भी अधिक निराशावाद का परिचय देते हैं। कहते हैं कि 'आधुनिक समाज में गरीबों की स्थिति जंगलवासियों से बदतर है जिन्हें कम से कम जहाँ भी चाहें शिकार करने या मछली मारने का अधिकार था, बल्कि अपने क़बीले के सदस्यों के अलावा किसी से भी कुछ चुरा लेने तक का अधिकार था। अलावा इसके, जंगलवासी उतना ही चिंतामुक्त होता है जितना पशु होता है; यह एक ऐसी विशेषता है जो सभ्य मनुष्य के लिए पूरी तरह पराई है। आज के समाज ने गरीब व्यक्ति को जो स्वतंत्रता दी है, दिखावा है क्योंकि जंगलवासी को जो लाभ प्राप्त है उनसे उसे वंचित कर देने के बाद भी यह समाज उसे जीवनयापन के न्यूनतम साधनों तक की ज़मानत भी नहीं देता कि वह उसके लाभों के खात्मे का मुआवज़ा ही कहला सके। फूरिये अंत में यह ऐलान करते हैं कि 'प्रगति की प्रशस्ति गाने वाले कुतर्कियों के बावजूद सभ्य समाज में जनता की स्थिति जंगली पशुओं से भी बुरी है। जिन बातों को गिनना या वर्गीकृत करना संभव ही न हो, उनको भी गिनने और वर्गीकृत करने की आदत के चलते फूरिये औद्योगिक मज़दूरों के बारह दुर्भाग्यों के संकेत देते हैं जिनमें वे सटीकता के लिए चार और जोड़ देते हैं। उनकी सभ्य मानव की बदनसीबियों की गणना करने की कोशिश हो सकता है हमारे होठों पर मुस्कान खिला दे इसलिए तो और भी कि हमारा यह लेखक क्षमा भी माँगता है कि उसकी गणना अधूरी रही और वह उसे पूरी करने का काम और भी अनुभवी लोगों के भरोसे छोड़ रहा है। तो भी यह बुद्धि की एक दुर्लभ स्पष्टता का पता ज़रूर देती है। एक मिसाल के रूप में में 'दूसरी' बदनसीबी का ज़िक्र करूंगा: यह कि सभ्य व्यक्ति ऐसे श्रम में लगा हुआ है जो उसकी ताक़त को चूस लेता है, उसके स्वास्थ्य के खराब होने का जोखिम पैदा करता है जिस पर उसके बच्चों का और खुद उसका जीवन निर्भर है। फिर रही फूरिय की बताई 'दसवीं' बदनसीबी जिसे वे पूर्वानुमानित निर्धनता कहते हैं; मतलब मज़दूर के इस डर से है कि उसकी मज़दूरी मारी जाएगी। अंत में रही 'सातवीं' बदनसीबी जिसका कारण अमीरों की बढ़ती ऐयाशी है जिसे देखकर गरीब आदमी खुद को


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और भी ग़रीब महसूस करने लगता है। (यही आज का सापेक्ष निर्धनता का सिद्धांत है।)" संत-साइमनवादियों ने अगर मज़दूरों और मालिकों की स्थितियों के बीच कोई अंतर नहीं किया तो दूसरी तरफ़ फूरिये इन दो सामाजिक श्रेणियों के हितों को परस्पर शत्रुतापूर्ण मानते हैं। कहते हैं कि आधुनिक समाज में औद्योगिक उद्यमों की सफलता का आधार मज़दूरों की बढ़ती निर्धनता, अर्थात् उनकी मज़दूरियों में न्यूनतम संभव स्तर तक कमी है। जहाँ सेंत-साइमनवादी बैंकों के विकास को प्रगति की आखिरी मंज़िल समझते हैं, वहीं फूरिये बैंकरों और स्टाक बाज़ार के सट्टाबाज़ों के ख़िलाफ़ गरजते हैं। जहाँ सेंत-साइमनवादी बड़े पैमाने के उद्योगों के विकास पर मुग्ध हैं, वहीं फूरिये यह साबित करते हैं कि इसके साथ पूँजी का संकेंद्रण होता है तथा एक नये वित्तीय, व्यापारिक और औद्योगिक लिबास में सामंतवाद पुनर्स्थापित होता है।


उनके अनुयायी भी इसी ढंग से अपनी बात कहते हैं। कोंसिदेराँ कहते हैं : ‘पहले सामंतवाद ने, जो सैनिक विजयों से पैदा हुआ, ज़मीन को सेना के अगुवों के हवाले कर दिया तथा पराजित जनता को भूदास प्रथा (सर्फ़डम) के बंधनों के द्वारा विजेताओं से नत्थी कर दिया। व्यापारिक और औद्योगिक युद्ध ने, जिसका रूप ऐसी प्रतियोगिता का है जिसके द्वारा पूँजी और सट्टाबाज़ी लाज़मी तौर पर बेचारी श्रम की शासक बन जाती हैं, जब से 'सैनिक युद्ध (!) को विस्थापित किया है, उसने अपनी विजयों के सहारे एक नयी भूदास प्रथा स्थापित करने का प्रयास किया है और वास्तव में हमेशा स्थापित किया है। अब जन्म होता है वैयक्तिक और अव्यवहित (इमेडिएट) निर्भरता का नहीं बल्कि व्यवहित (मेडिएट) और सामूहिक निर्भरता का, तबाह वर्गों पर उस वर्ग के सामूहिक शासन का जो पूँजी, मशीनों और श्रम के उपकरणों का स्वामी है। वास्तव में, कुल मिलाकर लें तो, नगरीय और ग्रामीण सर्वहारा श्रम के उपकरणों के स्वामियों पर संपूर्ण निर्भरता की स्थिति में है। यह महत्त्वपूर्ण आर्थिक और राजनीतिक सच्चाई व्यावहारिक जीवन के निम्नलिखित सूत्र में व्यक्त होती है : रोटी का एक टुकड़ा पाने के लिए हर मज़दूर को एक मालिक तलाश करना होगा। (मुझे पता है कि आज आप उसे रोज़गारदाता कहेंगे, मगर अपनी आदिम सरलता के कारण ज़बान बार-बार मालिक ही कहती है, और यही तब तक सही होगा जब तक कि नयी व्यवस्था स्थापित न हो जाए, जब तक कि मौजूदा सामंती व्यवस्था के, वित्तीय, औद्योगिक और व्यापारिक सामंतवाद के आर्थिक संबंधों की जगह नये संबंध न ले लें।)83


आधुनिक समाज में बार-बार फूटनेवाले औद्योगिक संकटों को फूरिये पहले ही प्रचुरता के संकट कह चुके थे और उन्होंने जोर देकर कहा था कि इस समाज की निर्धनता उसके धन से पैदा होती है। इस ठोस विचार को कोसिदेराँ ने और आगे विकसित किया। उन्होंने इंग्लैंड की मिसाल की ओर इशारा किया जिसका 'अपनी ही प्रचुरता से दम घुट रहा था, तथा उस समाज-व्यवस्था को निरर्थक और अमानवीय


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घोषित किया जो 'मज़दूर वर्ग को भूख से मारती है और साथ ही उपभोक्ताओं की कमी से परेशान रहती है।' 


वे आगे कहते हैं: प्रतियोगिता बीच के सामाजिक स्तरों को नष्ट कर देती है और समाज को दो वर्गों में विभाजित करती है जिनमें 'कुछ के पास सब कुछ है और एक बड़ी संख्या के पास कुछ भी नहीं है। 84


आमतौर पर कहें तो फूरियेवादी अकसर वेशतर आर्थिक प्रश्नों पर सेंत-साइमनवादियों की उलटी राय अपनाते थे तथा उन दिनों के फ्रांस में और पूरे सभ्य जगत् में उत्पादक शक्तियों के विकास की समस्या के बारे में उनके अपने-अपने रवैयों से यह बात खुलकर सामने आती है। सेंत-साइमनवादियों ने रेलों के निर्माण का वेदाग़ उत्साह से स्वागत किया तथा स्वेज़ और पनामा नहरों के निर्माण के सपने देखे। इसके विपरीत फूरियेवादी समझते थे कि रेलों के निर्माण से पहले मालिकों और मज़दूरों के हितों में तालमेल बिठाना तथा फैलेंस्तरियाँ बनाकर पूँजी, श्रम और प्रतिभा के बीच वस्तुओं का सही वितरण सुनिश्चित करना आवश्यक है। यहाँ फूरियेवादी बिना शक पूरी तरह गलत थे; फ्रांस में पूँजी और श्रम के बीच आज तक तालमेल नहीं हो सका है। लेकिन रेलों के बिना आज फ्रांस नज़र कैसा आता? रेलों का निर्माण औद्योगिक सामंतवाद को मज़बूत बनाएगा, इस तर्क के जवाब में इनफ़ैतिन ने कहा कि औद्योगिक सामंतवाद सामाजिक विकास के एक चरण के रूप में लाज़मी है। बात सही थी। लेकिन इनफ़ैतिन फिर सरककर अपने कल्पनालोक में जा पहुँचे और कहा कि सेंत-साइमन और सेंत-साइमनवादियों की खोजों के फलस्वरूप मानवजाति को शांतिपूर्ण सामाजिक रूपांतरण का भेद आज पता है, और इसलिए मानवजाति सचेत रहकर तथा उथल-पुथल के बिना औद्योगिक सामंतवाद का अंत करने में समर्थ है। जब उन्होंने कहा कि जिस तरह, मिसाल के लिए, धर्म-सुधार (रिफ़ार्मेशन) के युग में लूथर और काल्विन के साथ चलना ज़रूरी था उसी तरह आज 'उड़कर रोथ्सचाइल्ड के पास पहुँचना' आवश्यक है', तब भी वे कल्पनावादी ही थे। 19वीं सदी के सुधारकों का कार्यभार बिलकुल अलग था। 'रोथ्सचाइल्ड' से अपील 'आओ, प्रशिक्षण पाने के लिए पूँजीवाद की ओर चलें' का ही सेंत-साइमनवादी संस्करण था। 88


फूरियेवादियों की तरह लुई ब्लांक भी किराये के श्रम की स्थिति पर सेंत-साइमनवादियों के आशाबाद में क़त्तई साझीदार नहीं थे। अपनी रचना श्रम का संगठन में वे लिखते हैं कि प्रतियोगिता के प्रभाव से मज़दूरियाँ बराबर नीचे जाती हैं जिससे मज़दूर वर्ग के लिए बेहद गंभीर परिणाम निकल रहे हैं: यह पतित हो रहा है। फिर फूरियेवादियों की ही तरह लुई ब्लांक ने भी समकालीन समाज में संपत्ति की बढ़ती असमानता का ज़िक्र किया; इस बारे में उन्होंने सिर्फ़ पूँजी नहीं, भूस्वामित्व के संकेंद्रण की बात भी की। जहाँ सेंत-साइमनवादियों ने निठल्ले वर्ग के मुक़ाबले औद्योगिक वर्ग को रखा, ब्लांक ने 'पूँजीपति' के मुक़ाबले 'जनता' को रखा।


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लेकिन यह बात ध्यान देने की है कि उनकी पूँजीपति की परिभाषा इस वर्ग के ऊपरी से अधिक निचले स्तरों पर सटीक बैठती है। कहते हैं: 'पूँजीपति वर्ग से मेरा अभिप्राय उन नागरिकों के समूह से है जो या तो श्रम के उपकरणों या पूँजी के स्वामी होने के कारण अपने साधनों के बल पर काम करते हैं और दूसरों पर बस कुछ ही हद तक निर्भर रहते हैं।' बात या तो भोंडे ढंग से कही गई है या फिर प्रूदों की पूँजीपति वर्ग की धारणा, अर्थात् निम्न पूँजीपति वर्ग की धारणा के, बहुत क़रीब है। इससे कुछ कम उल्लेखनीय सच्चाई यह नहीं है कि 'जनता' की बात करते समय लुई ब्लांक के मन में सही अर्थों में सर्वहारा है, अर्थात् 'नागरिकों का वह समूह जो पूँजी से वचित होने के कारण ज़िंदगी की बुनियादी ज़रूरतों के लिए पूरी तरह दूसरों पर निर्भर है।' 90 लुई ब्लांक ने एक नये सामाजिक वर्ग का जन्म तो देखा मगर पुरानी लोकतांत्रिक धारणाओं के चश्मे से देखा और इसीलिए उस वर्ग को एक पुराना नाम दिया-वह नाम जो लोकतंत्रवादियों की दिली पसंद था। 


मैं उन दिनों के दो और समाजवादी लेखकों की चर्चा करूँगा; इनमें एक तो आज भी अच्छा-खासा जाना जाता है जबकि दूसरा पूरी तरह भुलाया जा चुका है हालाँकि वह चर्चा का पूरा-पूरा अधिकारी है। यहाँ मेरे मन में पियरे लेरो और उनके मित्र ज्याँ रेनो के नाम हैं। ये दोनों सेंत-साइमनवादी विद्यालय के छात्र रहे और बहुत पहले ही उन्होंने उस विद्यालय के प्रति एक आलोचनात्मक रुख अपना लिया था। खैर, मेरी दिलचस्पी केवल आज के समाज में श्रम की भूमिका और स्थिति पर उनके विचारों में है।


बहुत पहले 1832 में ही, जबकि सेंत-साइमनवादियों के एक विशाल बहुमत ने तब मौजूद समाज में सिर्फ़ मज़दूर वर्ग और निठल्ले स्वामियों के हितों का अंतर्विरोध देखा था और जब वे 'राजनीति' को पिछड़ी जनता का सड़ा-गला पूर्वाग्रह समझते थे, ज्याँ रेनो ने रिव्यू इनसाइक्लोपेदिक के अप्रैल अंक में एक लेख प्रकाशित कराया था। इसका शीर्षक 'सर्वहारों के लिए विशेष प्रतिनिधित्व की आवश्यकता था। इसमें वे ऐसे विचार प्रस्तुत करते हैं जो उस दौर के लिए सचमुच उल्लेखनीय थे।


उन्होंने लिखा : 'मैं कहता हूँ जनता के दो वर्ग हैं जो अपनी स्थिति और अपने हितों, दोनों के एतबार से अलग-अलग हैं : सर्वहारा और पूँजीपति। मैं सर्वहारा उन लोगों को कहता हूँ जो राष्ट्र की सारी संपदा पैदा करते हैं, जिनके पास अपनी मेहनत की दिहाड़ी के अलावा कुछ भी नहीं है, जिनका कामकाज उनके नियंत्रण से बाहर के कारणों पर निर्भर होता है, जो रोज़ अपनी ही मेहनत के फल में से बस ज़रा सा हिस्सा पाते हैं और वह हिस्सा भी प्रतियोगिता के कारण लगातार घट रहा है, जिनके भविष्य का दारोमदार एक ऐसे उद्योग की नाजुक उम्मीदों पर टिका है जिसकी प्रगति अविश्वसनीय और अराजक है, और जिनको अपने बुढ़ापे में एक खैराती हस्पताल में जगह पाने या असमय मर जाने के अलावा और किसी बात


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की आशा नहीं है।' सर्वहारा के इस जीवंत वर्णन में पूंजीपति वर्ग का उतना ही जीवंत वर्णन जोड़ा गया है: 'पूँजीपति वर्ग से मेरी मुराद उन लोगों से है जिनके भाग्य के अधीन और जिनके भाग्य से बंधा हुआ सर्वहारा का भाग्य है, ऐसे लोग जो पूँजी के स्वामी हैं तथा उसी की आय पर जीते हैं, जो उद्योग को अपनी चाकरी में रखते हैं तथा अपने उपभोग संबंधी मनमौजीपन के अनुसार उसमें घटत-बढ़त करते रहते हैं, जो वर्तमान का पूरा-पूरा आनंद लेते हैं और जिनकी भविष्य के बारे में इसके आलवा और कोई इच्छा नहीं कि उनके पास कल जो कुछ था वह बना रहे, और यह कि युग-युग तक वह संविधान जारी रहे जिसने उनको अग्रणी स्थान और सबसे शानदार हिस्सा प्रदान किया है।'


रेनो के बयान के आधार पर शायद यह समझा जा सकता है कि पूँजीपति बुनियादी तौर पर वे लोग थे जो अपनी पूँजी की आय पर जीते थे, कि दूसरे सभी संत-साइमनवादियों की तरह उनके मन में भी सिर्फ़ निठल्ले स्वामी अर्थात् लगानखोर (रंटियर्स) थे। ऐसा मानना गलत होगा। अपने लेख में आगे चलकर वे इस विचार को भी स्पष्ट करते हैं। पता चलता है कि पूँजीपतियों में वे 'ल्यांस के 2,000 कारखानादारों, सेंत एतिएन के 500 कारखानादारों और उद्योगों के सभी सामंती मालिकों को शामिल करते हैं। इससे स्पष्ट है कि उनकी परिभाषा औद्योगिक पूँजी के प्रतिनिधियों को पूरी तरह समेटती है। उन्हें यह बात बखूबी पता है कि पूँजीपति और सर्वहारा वर्गों के बीच मध्यवर्ती सामाजिक स्तर भी हो सकते हैं। पर वे इससे निराश नहीं होते। कहते हैं: 'मुझे कहा जाएगा कि इन दोनों ही वर्गों का अस्तित्व नहीं है क्योंकि उनके बीच कोई पार न हो सकने वाली रुकावट या नष्ट न हो सकने वाली दीवार नहीं है, और यह कि ऐसे पूँजीपति हैं जो काम करते हैं और ऐसे सर्वहारा हैं जो संपत्ति के स्वामी हैं। इसका मैं यह जवाब दूँगा कि इन दो अत्यंत सुस्पष्ट रंगछायाओं के बीच हमेशा मध्यवर्ती रंगछायाएँ होती हैं, और यह कि कोई हमारे उपनिवेशों में काली और गोरी जनता के अस्तित्व से सिर्फ़ इस आधार पर इनकार करने की बात भी नहीं सोचेगा कि उनके बीच भूरे और दोगली नस्लवाले भी हैं।(हब्सियों और गोरों की संकर संतान-संपादक) 


रेनो का विश्वास था कि एक समय ऐसा था जब पूँजीपति वर्ग अपने निजी हितों का प्रतिनिधित्व करने के साथ ही साथ सर्वहारा का प्रतिनिधित्व भी करता था। यह बात पुनर्स्थापना (रेस्टोरेशन) के काल की थी। लेकिन आज जबकि सामंती कुलीन वर्ग के विनाश का काम, जिसके लिए ज़मीन पूँजीपति वर्ग ने तैयार की थी, सर्वहारा द्वारा पूरा किया जा चुका है, इन दोनों वर्गों के हित अलग-अलग हो चुके हैं। उसके चलते सर्वहारा के लिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व पाना आवश्यक हो गया है।


बातों को इससे अधिक स्पष्टता के साथ रखना कठिन है। लेकिन रेनो भी तो अपने ही दौर की उपज हैं। उनके मन से 1798 की भयानक यादें पूरी तरह


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मिटी नहीं थीं। वे गृहयुद्ध से भयभीत हैं और इसलिए अगर-मगर करते हैं। उनकी राय में पूँजीपति वर्ग के हित सर्वहारा के हितों से अलग तो हैं मगर ये एक-दूसरे से अंतर्विरोधी नहीं हैं। इसलिए क़ानूनों में सुधार लाने के लिए ये दोनों वर्ग मिलकर काम कर सकते हैं। "91


पूँजीपति वर्ग के साथ सर्वहारा के संबंध पर पियरे लेरो की राय भी यही थी।92 उनकी जिस पुस्तक कुबेरतंत्र और धनिकों का शासन का अभी-अभी मैंने एक टिप्पणी में हवाला दिया है (टिप्पणी 92 देखें-संपादक), उसमें वे इस विचार को विस्तार से विकसित करते हैं। लेकिन जितने ही विस्तार में वे जाते हैं, उनके विचारों की अस्पष्टता उतनी ही ज़ाहिर होती और बढ़ती जाती है; यह ऐसी अस्पष्टता है जो रेनो की रचना में कुछ हद तक पहले ही देखी गई थी। इस अस्पष्टता का कारण यह है।


रेनो ने कहा था : 'मैं शहरों के मजदूरों और गाँवों के किसानों को सर्वहारा कहता हूँ। कोई यह मान सकता है कि आज के समाज में संपत्तिधारी सर्वहारा का अस्तित्व स्वीकार करते समय वे ठीक 'गाँवों के किसानों के ही बारे में सोच रहे थे। बहुत सारे ब्यौरे देकर लेरो इस तरह के 'सर्वहारा' की विस्तृत चर्चा करते हैं। पूछते हैं: 'एक हेक्टेयर ज़मीन वाला किसान एक सर्वहारा है या संपत्तिधारी है?" उनकी राय में 'वह एक सर्वहारा है क्योंकि उसकी एक हेक्टेयर जमीन उसे उसी सीमा तक जीविका देती है जिस सीमा तक वह रोज़ाना उस पर भारी शारीरिक श्रम करता है। अगर ज़मीन का स्वामित्व किसान को रोज़ाना भारी मशक्कत के बाद ही जीने की इजाज़त देता है तो उसके भूस्वामी होने का मतलब भला क्या रहा ? श्रम के उपकरणों का विकास जब एक विशेष सीमा तक पहुँच जाता है, तभी वे पर्याप्त उत्पादक साबित होते हैं और अपने स्वामी के जीवननिर्वाह के लिए पर्याप्त किराया लाते हैं। इस सीमा के अंदर एक व्यक्ति सर्वहारा होता है; वह उस सीमा से परे ही संपत्तिधारी होता है। "93


लेरो का सवाल है कि ज़मीन के एक छोटे से टुकड़े का स्वामी एक संपत्तिधारी है या एक सर्वहारा है। इस सवाल में यह मान्यता निहित है कि एक ही व्यक्ति एक ही साथ सर्वहारा और संपत्तिधारी नहीं हो सकता। मगर इसके फ़ौरन बाद लेरो यह ऐलान फ़रमाते हैं कि जिस आदमी के पास एक हेक्टेयर ज़मीन है, अर्थात् जो एक हेक्टेयर का संपत्तिधारी है, वह एक सर्वहारा है। यहाँ इस मान्यता को चुपके से ताक पर रख दिया गया है कि एक व्यक्ति एक ही साथ संपत्तिधारी और सर्वहारा नहीं हो सकता। क्यों? इसलिए कि उस टुकड़े का स्वामी काम करता है। लेकिन इसके कारण उसे अधिक से अधिक एक कामकाजी संपत्तिधारी माना जा सकता है। एक कामकाजी संपत्तिधारी को सर्वहारा का पर्याय कहना, कुछ भी हो, मनमानीपन है। लेरो क्यों भला इस बात को स्वीकार्य ही नहीं, अपरिहार्य भी मानते हैं? सिर्फ़


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इसलिए कि जमीन के एक छोटे से टुकड़े का स्वामी अकसर बहुत गरीब होता है। पियरे लेने के बजदीक गरीब और सर्वहारा होना एक ही बात है। यही कारण है कि उन्होंने सर्वहारा की श्रेणी में तमाम भिखारियों को भी शामिल किया है जिनकी फ्रांस में संख्या के हिसाब लगाकर 10 लाख बतलाते हैं, जबकि उद्योग व्यापार में लगे लोगों की संख्या उनकी अपनी गणना के अनुसार उपर्युक्त संख्या के आधे से अधिक नहीं है।94 इस तरह उनके हिसाब से फ्रांस की 345 लाख आबादी में सर्वहारा की संख्या 500 लाख थी।95


रेनो के तर्क में 'सर्वहारा संपत्तिधारियों की तुलना भूरों और दोगलों से की गई थी जिनकी उपनिवेशों में स्थिति काली और सफ़ेद नस्लों के बीच में है। लेकिन लेरो ने ऐसा दिखाया कि गोया ये 'भूरे' और 'दोगले फ्रांसीसी सर्वहारा का एक बड़ा भाग थे।


कहने की ज़रूरत नहीं कि अर्थशास्त्र की कसौटी पर लेरो की गणनाएँ ठहर नहीं सकेंगी। लेकिन उनको समझने के लिए हमें यह याद रखना होगा कि वे अर्थशास्त्र के दृष्टिकोण से उतना तर्क नहीं कर रहे जितना नैतिकता के दृष्टिकोण से कर रहे हैं। वे फ्रांस में मौजूद उत्पादक संबंधों का ठीक-ठीक निश्चय करना नहीं, बल्कि यह दिखाना अपना दायित्व समझते थे कि कितने फ्रांसीसी गरीबी में रह रहे थे, और अपनी गरीबी के कारण समाज-सुधार की आवश्यकता की याद दिलाते थे। और इसे जहाँ तक वे अपना दायित्व समझते थे, वहाँ तक सही थे, हालांकि इसके कारण वे तर्कशास्त्र संबंधी बहुत स्पष्ट गलतियाँ करने से नहीं बच सके। उलटे, इसी बात ने उनसे ये गलतियाँ कराई।


इस दृष्टिकोण से देखें तो लेरो की तर्कपद्धति हमें हमारे नरोदनिकों की चिंतन-प्रणाली की बहुत कुछ याद दिलाती है।96 खैर जो भी हो, इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि उनकी पुस्तक कुबेरतंत्र में और कुछ दूसरी रचनाओं में- मसलन आगे चलकर माल्थस और अर्थशास्त्री शीर्षक से प्रकाशित उनके लेखों में-उजरती मज़दूर और पूँजीपति के संबंधों का इनफफैतिन और दूसरे रूढ़िग्रस्त सेंत-साइमनवादियों की रचनाओं की अपेक्षा कहीं बहुत गहरा विश्लेषण मिलता है। निश्चित ही यह उनके लिए भारी श्रेय की बात है।


फिर भी समाजवादी विश्लेषण के ये आरंभिक चरण कभी-कभी बहुत ही अप्रत्याशित सैद्धांतिक परिणामों पर ले जाते हैं। फूरिये और उनके शागिर्दो, खासकर तोसेनेल के और पियरे लेरो, देज़ामी और दूसरों के लिए वित्तीय और औद्योगिक 'सामंतवाद' के लिए प्रमुख अपराधी यहूदी थे। फूरिये ने यहूदियों को समान अधिकार दिए जाने का विरोध किया। लेरो ने उनको 'हमारे युग के राजा-महाराजा" कहा। बहुत बाद को चलकर, 1840 की दहाई में, फूरियेवादी तोसेनेल ने यहूदी-विरोधी संघर्ष के लिए जुलाई राजतंत्र और जनता के बीच एक गठजोड़ की पैरवी की। उनका


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ऐलान था: 'ताक़त में बढ़ोत्तरी! परजीवीपन की मौत! यहूदियों के खिलाफ़ जंग! यही नयी क्रांति का सूत्रवाक्य है।'98 ये सैद्धांतिक ग़लतियाँ खुशी की बात है कि फ्रांस में किसी भारी व्यावहारिक नुक़सान का कारण नहीं बनीं। मगर काल्पनिक समाजवाद के कुछ संप्रदाय अंत तक इन गलतियों से उबर नहीं सके। और ज़ाहिर है कि यह बात उनकी ख़ासलखास विशेषताओं के जोड़-घटाने में कोई मामूली घटाव नहीं है।


निष्कर्षस्वरूप मैं इतनी बात और कहूँगा कि फ्रांसीसी समाजवादियों के अर्थशास्त्रीय विचार 1820 और 1830 की दहाइयों में अंग्रेज़ समाजवादी लेखकों द्वारा प्रस्तुत अर्थशास्त्रीय विचारों से, स्पष्टता और सुव्यवस्था के मुआमले में काफ़ी दूर थे, जैसे हागरिकन, थाम्पसन, ग्रे, एडमंड्स, ब्रे और दूसरों के विचारों से। इसका कारण स्पष्ट है: आर्थिक विकास के मुआमले में ब्रिटेन फ्रांस से बहुत आगे था।


सात


आइए, ज़रा पीछे मुड़कर देखें। सेंत-साइमन के रूप में फ्रांसीसी काल्पनिक समाजवाद 18वीं सदी के तीसरे जनवर्ग के विचारकों द्वारा सम्पन्न किए गए कार्यों को सीधे-सीधे जारी रखते हुए रंगमंच पर दाखिल होता है। वह कुलीन वर्ग के खिलाफ़ इस जनवर्ग के हितों की पैरवी करता है। लेकिन इसी क्रम में वह दो खास विशेषताएँ दर्शाता है। सबसे पहले तो वह 1799 की घटनाओं के प्रभाव में वर्ग-संघर्ष के विचार का त्याग करता है।९९ दूसरे, यह वंचित लोगों की दशा पर ध्यान देने का आग्रह करता है तथा धार्मिक प्रवचन तक के ढंग से, 'सबसे गरीब और सबसे अधिक संख्या वाले वर्ग' की दशा में चौतरफ़ा सुधार को कर्तव्य का दर्जा देता है। इस कर्तव्य को पूरा करने का बोझ मुख्यतः 'उद्योग के अगुवों' पर है जो सामाजिक जीवन में एक संचालक की भूमिका निभाने के लिए भेजे गए हैं। सेंत-साइमन और सेंत-साइमनवादियों के नज़दीक उद्योग के अगुवों के हित मज़दूर वर्ग के हितों से पूरा-पूरा मेल खाते हैं। 


फूरिये और उनके अनुयायी उदीयमान पूँजीवादी व्यवस्था के रहस्यों में और भी अधिक गहराई तक पैठते हैं। तो भी वे वर्ग संघर्ष को कुछ कम निर्णायक ढंग से अस्वीकार नहीं करते; वे भी 'गरीबों' नहीं बल्कि 'अमीरों' से मुखातिब हैं। दूसरी समाजवादी विचार प्रणालियों के अधिकांश संस्थापकों ने भी काल्पनिक समाजवाद के इन्हीं दो आरंभिक संप्रदायों द्वारा कायम की हुई मिसाल का अनुसरण किया। इन संस्थापकों ने समाजसुधार की जो योजनाएं तैयार की वे सामाजिक सामंजस्य स्थापित करके वर्गों के बीच तालमेल बिठाने के उपायों की एक श्रृंखला ही हैं, और कुछ भी नहीं। इन योजनाओं के प्रस्तुतकर्त्ता यह मानते थे कि उन्हें साकार करने की पहल उच्च वर्गों द्वारा की जानी चाहिए। दूसरे शब्दों में, काल्पनिक समाजवादियों के यहाँ सर्वहारा के स्वकार्य की कोई गुंजाइश नहीं है; वास्तव में उनके यहाँ तो सर्वहारा


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की धारणा भी शुरू-शुरू में उनकी 'कामगार वर्ग' की सामान्य धारणा से पैदा नहीं हुई। यह बात 19वीं सदी की पहली चौथाई में फ्रांस में पाए जाने वाले सामाजिक संबंधों की अपेक्षाकृत अविकसित अवस्था के ही मुताबिक थी। राजनीति के जिस आविष्कार को हम काल्पनिक समाजवाद की प्रमुख लाक्षणिक विशेषताओं में एक के रूप में जानते हैं, उसका इन्हीं अल्पविकसित सामाजिक संबंधों से कारण और कार्य का गहरा संबंध है। चेतना अस्तित्व का निर्धारण नहीं करती बल्कि अस्तित्व चेतना का निर्धारण करता है। जब तक सर्वहारा एक स्वतंत्र सामाजिक शक्ति के रूप में सामने नहीं आया था, राजनीतिक संघर्ष सिर्फ शासक वर्ग के विभिन्न भागों के आपसी संघर्ष का सूचक हो सकता था जिनकी 'सबसे गरीब और सबसे अधिक संख्या वाले वर्ग की दशा में जरा सी भी दिलचस्पी नहीं थी। फलस्वरुप राजनीतिक संघर्ष काल्पनिक समाजवादियों की दिलचस्पी की चीज़ नहीं बना जिनकी कोशिश ठीक इसी वर्ग की हालत को बेहतर बनाने में थी। अलावा इसके, राजनीति का मतलब संघर्ष है जबकि काल्पनिक समाजवादी संघर्ष नहीं चाहते थे। उनका उद्देश्य तो समाज के सभी भागों के बीच तालमेल बिठाना था। फलस्वरूप उन्होंने राजनीति को एक गलती करार दिया और अपना ध्यान सामाजिक क्षेत्र पर केंद्रित किया। उनको लगता था कि इस क्षेत्र में अपनाए गए सुधारों का राजनीति से कोई संबंध नहीं है और इसलिए सरकार चाहे जैसी भी हो, समाज सुधारक शांति के साथ जिंदगी बसर कर सकते हैं। अंततः यहाँ यह बात जोड़ देना मुनासिब ही होगा कि इस विचार का विकास 18वीं सदी में प्रचलित एक विश्वास की प्रतिक्रियास्वरूप हुआ, और यह विश्वास यह था कि शासकों का राजनीतिक कार्यकलाप कारण होता है तथा समाज-व्यवस्था उसका कार्य (परिणाम) होती है।


काल्पनिक समाजवादियों ने राजनीति के प्रति अपनी उदासीनता एक लंबे अरसे तक जारी रखी। हमें पता है कि उनके कभी भोंडे और कभी अनाकर्षक राजनीतिक षड्यंत्रों की व्याख्या इसी उदासीनता से होती है। लेकिन फ्रांस का आर्थिक विकास जब आगे बढ़ा तो उजरती श्रम और औद्योगिक पूँजी का अंतर्विरोध और भी तीखा हुआ और जब यह और भी तीखा हुआ तो उस देश का 'निर्धन वर्ग' ही सर्वहारा बन गया। मैंने रेनो के उस बयान का पहले ही हवाला दिया है कि कुलीन वर्ग के विनाश की शुरुआत पूँजीपति वर्ग ने की और सर्वहारा ने इसे पूरा किया। ये उल्लेखनीय शब्द यह दिखाते हैं कि 1830 की दहाई के आरंभ में ही फ्रांसीसी काल्पनिक समाजवाद के कुछ प्रतिनिधि (जो माना कि बहुत थोड़े-से थे) मज़दूर वर्ग के बेपनाह राजनीतिक महत्व को स्वीकार करने लगे थे। यह उभरती चेतना निःसंदेह जुलाई क्रांति (जुलाई 1830-संपादक) के प्रभावों की देन थी। मगर यह जुलाई 1830 और फरवरी 1848 बहुत अधिक विकसित नहीं हुई तो भी लूई फिलिप के राजतंत्र के पतन ने इसे एक जोरदार बढ़ावा जरूर दिया। जिन फूरियेवादियों ने पहले कभी राजनीति


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को ही एक गलती करार दिया था, अब खुद ही राजनीति में भाग लेने लगे। एक 'जन-प्रतिनिधि' के रूप में निर्वाचित होने के बाद कोसिदेरी 'पर्वत' पार्टी में शामिल हो गए तथा 1849 में उन्हें 13 जुलाई के मशहूर प्रदर्शन में भागीदारी के कारण देश छोड़कर भागना पड़ा।101  1848 से 1850 तक के काल में पृदों, पियरे लेरो, लुई ब्लांक, बुशेल्ज़, वाइदल और कुछ दूसरे लोग भी सांसद रहे। काल्पनिक समाजवाद के सभी अग्रणी प्रतिनिधियों में सिर्फ कावे ही थे जो इस काल में भी टेक्सस में 'इकारिया' नाम से अपनी कम्युनिस्ट बस्ती बसाने में लगे हुए थे। 'राजनीति' कल्पनालोक पर भारी साबित हुई। उसने खुद को उसी काल्पनिक समाजवाद पर लाद दिया जिसने पहले उसे एक गलती करार दिया था। लेकिन काल्पनिक समाजवादी जब राजनीति के मंच पर सक्रिय रहे तब भी वे कल्पनावादी ही रहे। बेहद तीखे वर्ग संघर्ष के दौर में भी ये वर्गों के बीच तालमेल बिठाने के सपने देखते रहे। पुस्तिका Le socialisme devant le vieux monde or le vivant devant les marts में, जिसका हवाला मैं पहले ही दे चुका हूँ, कोसिदेरों ने दिली अफ़सोस जाहिर किया था कि महाक्रांति (1789- संपादक) के दौरान कुलीन वर्ग के विशेषाधिकारों का बलात् उन्मूलन करके पूँजीपति वर्ग ने सर्वहारा के सामने एक गलत मिसाल पेश किया था। 14 अप्रैल 1849 को इन्हीं कोसिदेरों ने राष्ट्रीय सभा (फ्रांसीसी संसद- संपादक) में एक लंबा-चौड़ा भाषण दिया था जिसमें उन्होंने प्रस्ताव किया था कि फैलेंस्तरियों (देखें टिप्पणी 59-संपादक) की स्थापना के लिए सभा फूरियेवादियों को धन आवंटित करे। यह कहने की शायद ही ज़रूरत पड़े कि सभा ने इसके लिए कोई धन नहीं दिया। अंत में मैं 1848 में लुई ब्लांक द्वारा की गई मशहूर गलतियों का ज़िक करूँगा।


फ्रांस में घटनाक्रम के हाथों मजबूर होकर राजनीतिक क्षेत्र में खिंच आने वाले काल्पनिक समाजवादी सही कार्यनीतिक सिद्धांतों का निश्चय करने में सिर्फ इसलिए असमर्थ रहे कि ऐसे सिद्धांतों के लिए काल्पनिक समाजवाद में कोई ठोस सैद्धांतिक आधार था ही नहीं।103 इसी के साथ हम इस सवाल पर पहुँच जाते हैं:  तो फिर वह कौन-सी लाक्षणिक विशेषता है जिसकी किसी विशेष समाजवादी विचार प्रणाली में मौजूदगी उसे एक कल्पनावादी चरित्र प्रदान करती है, इससे मतलब नहीं कि उस प्रणाली के ब्यौरे ध्यान दिए जाने और अनुमोदित किए जाने के योग्य है भी या नहीं? यहाँ यह सवाल और भी प्रासंगिक है क्योंकि इस विषय की पूरी जानकारी न रखनेवाला कोई भी व्यक्ति हो सकता है यह सोच बैठे कि शब्द 'कल्पनावादी' का कोई सटीक सैद्धांतिक अर्थ है ही नहीं तथा किसी योजना या प्रणाली के लिए इसका व्यवहार मात्र उसके अस्वीकार का सूचक है। यह सही है कि 'कल्पनालोक' (यूटोपिया) शब्द फ्रांस के काल्पनिक समाजवादियों की जानकारी में था और जब उनमें से कोई, मसलन फूंरिये, किसी दूसरे समाजवादी संप्रदाय के, मसलन सेंत-साइमनवादी संप्रदाय के कुछ पक्षों के बारे में असंतोष जाहिर करना चाहता तो उसे दूसरी बातों के अलावा


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कल्पनावादी कह देता था। किसी प्रणाली विशेष को कल्पनाबादी करार देने का मतलब निश्चित ही उसे अव्यावहारिक करार देने के बराबर था। लेकिन किसी प्रणाली विशेष की व्यावहारिकता का फ़ैसला किस मानदंड पर किया जाएगा, इसकी एक साफ़ समझ एक भी काल्पनिक समाजवादी को नहीं थी। यही कारण है कि काल्पनिक समाजवादियों की रचनाओं में 'कल्पनालोक' शब्द का महत्व सिर्फ शास्त्रार्थ के लिए था। आज हमें इसे किसी और ढंग से देखते हैं।


आठ


कुलीन वर्ग के विशेषाधिकारों का बलात् उन्मूलन करके सर्वहारा के सामने गलत मिसाल रखने के कारण पूँजीपति वर्ग की निंदा करते समय कौंसिदेरों का खयाल था कि बहुत पहले, 18वीं सदी के अंतिम वर्षों में ही फ्रांस में समाजसुधार की एक ऐसी योजना पेश कर सकना संभव था जो पद, प्रतिष्ठा और संपत्ति से परे तमाम फ्रांसवासियों को अपनी ओर खींच लेती। मुसीबत कुल यह थी कि ऐसी एक योजना बनानेवाला कोई था ही नहीं। ऐसी योजनाओं का आविष्कार किया जा सकता था, यह निष्कर्ष इस तथ्य से निकलता था कि उनका सामने आना संयोग पर निर्भर था। फूरिये ने तो इस विषय पर एक पूरा प्रबंधग्रंथ तक लिख डाला था जिसमें उन्होंने बतलाया था कि किस तरह उन्होंने संयोग से 'आकर्षण का चलनकलन' (कैलक्यूलस आफ़ अट्रैक्शन) खोज निकाला था। उन्होंने कहा कि न्यूटन की ही तरह उन्होंने अपनी प्रतिभापूर्ण खोज एक सेब के कारण की थी जिसे उन्होंने पेरिस के एक रेस्तरों में खाया था। बाद में उन्होंने यहाँ तक कहा कि 'चार सेब ही मशहूर हुए हैं, इनमें से दो (आदम का सेब और पेरिस का सेब) तो उस मुसीबत के कारण जाने जाते हैं जो उन्होंने पैदा की और दो विज्ञान को समृद्ध बनाने के कारण। फूरिये ने तो आगे बढ़कर यह भी कहा कि ये चार मशहूर सेब मानव-चिंतन के इतिहास में एक विशेष पृष्ठ पर उल्लेख के अधिकारी हैं।104 सेब के प्रति उनका कलाहीन आभार-भाव इस सच्चाई का एक अच्छा दृष्टांत है कि मानव का ज्ञान नियमों के अधीन विकसित होता है, इस बारे में फूरिये को कोई एहसास नहीं था। उन्हें पक्का विश्वास था कि खोजें पूरी तरह 'संयोग' पर निर्भर होती हैं। यह बात तक उनके ख़याल में नहीं आई कि मानव-चिंतन के इतिहास में खुद 'संयोग' का कृत्य एक कारण-कार्य संबंध के सहारे नियमों के अधीन सामने आनेवाले घटनाक्रमों पर निर्भर हो सकता है। काल्पनिक समाजवादियों ने यह बात नहीं मानी कि घटनाओं का क्रम विचारों की है प्रगति का निर्धारण करता है। इतना ही नहीं, उनका विश्वास था कि विचारों का विकास मानवजाति के ऐतिहासिक विकास का केंद्रीय कारण है। यह एक शुद्ध विचारवादी दृष्टिकोण था; इसे उन्होंने 18वीं सदी के उन फ्रांसीसी प्रबोधवादियों से उधार लिया था जो अक्खड़पन के साथ यही कहते थे कि विचार विश्व को संचालित 


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करता है। फ्रांसीसी समाज के आंतरिक इतिहास में वर्ग संघर्ष की भूमिका पर संत-साइमन के गंभीर उद्गारों को पढ़कर कोई यह सोच सकता है कि वे ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने ऐतिहासिक विचारवाद के दृष्टिकोण को पूरी तरह त्याग दिया था। वास्तव में वे इस दृष्टिकोण से अपने अंतकाल तक मजबूती से चिपके रहे। यह भी कहा जा सकता है कि उन्होंने इतिहास की विचारवादी दृष्टि को उसकी अति तक पहुँचा दिया। वे विचारों के विकास को सामाजिक संबंधों के विकास का अंतिम कारण ही नहीं मानते थे, बल्कि उन्होंने विचारों में भी सबसे महत्वपूर्ण स्थान वैज्ञानिक विचारों को विश्व की वैज्ञानिक प्रणाली' को दिया जिनसे धार्मिक विचारों का जन्म होता है और फिर उनसे मानव की नैतिक धारणाओं का निर्धारण होता है। पहली निगाह में इसे समझना आसान नहीं है कि सेंत-साइमन किस प्रकार अपने अतिवादी ऐतिहासिक विचारवाद का तालमेल अपने इस सुविदित विचार से बिठाते थे कि संपत्ति संबंधी विधान समाज का बुनियादी विधान होता है। लेकिन सच्चाई यह है कि भले ही संत-साइमन का यह विश्वास रहा हो कि संपत्ति के संबंध किसी विशेष समाज व्यवस्था के आधार होते हैं, उन्होंने फिर भी उन्हें मानवीय भावनाओं और विचारों की उपज बतलाया। इस तरह ठीक 18वीं सदी के प्रबोध-दर्शन की तरह उनके नज़दीक भी विश्व का संचालन 'मत' (ओपिनियन) से होता है। यही विचारवादी दृष्टिकोण पूरा का पूरा उनके शिष्यों तक पहुँचा। ठीक यही दृष्टिकोण दूसरे काल्पनिक समाजवादियों के यहाँ मिलता है। हम पहले ही देख चुके हैं कि मानव जीवन के विकासक्रम से मानव-चिंतन के विकासक्रम को जोड़ने में फूरिये किस क़दर असमर्थ थे। उनके सबसे यशस्वी शिष्य कोसिदेरों ने लिखा: 'विचार तथ्यों के जनक होते हैं तथा आज के तथ्य कल के विचारों की संतानें हैं। काँसिदेरों ने खुद से यह नहीं पूछा कि कल के विचार कहाँ से आए। न ही किसी और काल्पनिक समाजवादी ने पूछा। जब भी उनका साबका इस सवाल से पड़ा कि आज के विचार-मसलन सेंत-साइमनवादी या रिवादी संप्रदाय के विचार-कल के तथ्य भला कैसे बनेंगे तब, 18वीं सदी के प्रबोधवादियों की ही तरह, उन्होंने खुद को सत्य की अजेय शक्ति का नाम लेने तक सीमित रखा। इस विचार का समर्थन करने के कारण उनके लिए यह स्वाभाविक ही था कि वर्ग को और इस संघर्ष के अरब-रूप में राजनीति को उन्होंने अस्वीकार किया, क्योंकि सत्य एक बार प्रकट हो जाए तो फिर सामाजिक वर्गों के लिए एकसमान सुलभ होना चाहिए। बात कुछ और भी थी। अधिक अवकाश पाने और कुछ निश्चित सीमा तक शिक्षित होने के कारण उच्च वर्गों के लोग सत्य को अपनाने में अधिक समर्थ है। इससे यह बात पूरी तरह साफ हो जाती है कि काल्पनिक समाजवादियों की कार्यनीतियों का उनके ऐतिहासिक विचारवाद से गहरा संबंध था। मैं तो यहाँ और भी कहूँगा कि उनके राजनीतिक षड्यंत्र भी इस विचारवाद से असंबद्ध नहीं थे। फूरिये की मिसाल लीजिए। अगर एक इत्तफ्राक्रिया सेव के कारण इत्तफ़ाक्रिया


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उन्होंने सत्य की खोज कर ली तो फिर तो कोई भी इत्तफ़ाक्रिया स्थिति उसके प्रचार-प्रसार में सहायक हो सकती थी। इसलिए तमाम दरवाज़ों पर दस्तक देना और हर नत्थू-खैरे को प्रभावित करने की कोशिश करना एकसमान उपयोगी है, और खास तौर पर उन लोगों को जिनके पास काफ़ी पैसा और काफ़ी शक्ति है। और इसीलिए फुरिये इस दुनिया के शक्तिपुरुषों को प्रभावित करने की जी-तोड़ कोशिश करते रहे, हालांकि जाहिर है उन्हें कोई खास कामयाबी नहीं मिली।


अपने विरोधियों की विचार प्रणालियों को कल्पनावादी बतलाते हुए विचाराधीन काल के समाजवादी पूरे भरोसे के साथ अपनी-अपनी प्रणालियों को वैज्ञानिक 106 कहते थे। वैज्ञानिक होने का मानदंड वे किस चीज़ को मानते थे? इसे कि कोई प्रणाली विशेष 'मानव की प्रकृति के संगत थी या नहीं? लेकिन विशेष सामाजिक संबंधों से स्वतंत्र रूप से मानव प्रकृति को, या यूँ कह लें कि सामान्यतः मनुष्य की प्रकृति को, आधार बनाने का मतलब ऐतिहासिक यथार्थ की धरती छोड़कर एक अमूर्त धारणा को अपना सहारा बनाना है, और यह सड़क सीधे कल्पनालोक तक ले जाती है। ये लेखक अपने विरोधियों पर कल्पनावादी होने का दोष लगाते हुए मानव प्रकृति की जितनी ही दुहाई देते हैं, उतनी ही अधिक स्पष्टता के साथ उनके अपने सिद्धांतों का कल्पनावादी चरित्र सामने आता है।


मानव प्रकृति पर अपनी धारणा को वैज्ञानिक कर्म का मानदंड स्वीकार करने के कारण काल्पनिक समाजवादी स्वाभाविक रूप से यह मानते थे कि एक परिपूर्ण सामाजिक व्यवस्था का निर्माण संभव है: यह परिपूर्ण सामाजिक व्यवस्था वही थी जो मानव प्रकृति के बारे में किसी सुधारक विशेष की धारणा से पूरा-पूरा मेल खाती थी। काल्पनिक समाजवादियों के बीच, मिसाल के लिए भविष्य के समाज में वस्तुओं के वितरण के सिद्धांत को लेकर चलनेवाली गर्मागर्म बहसों का एक कारण यह भी था। वे इस बात को भूल गए कि समाज की उत्पादक शक्तियों के विकास के साथ वितरण की पद्धति भी निश्चित रूप से बदल जाएगी।


इस तरह कल्पनावादी वह है जो किसी अमूर्त सिद्धांत के आधार पर एक परिपूर्ण समाज व्यवस्था गढ़ने के प्रयास करता है। विचाराधीन युग के सारे समाजवादी इसी श्रेणी में आते हैं। इसलिए यह कोई हैरानी की बात नहीं कि उनके प्रति किसी भी तरह की दुर्भावना पाले बिना हम आज उन्हें कल्पनाबादी कहते हैं। विज्ञान के दृष्टिकोण से कल्पनावाद समाजवादी चिंतन के विकास का एक चरण मात्र है। इस चरण का अंत तभी जाकर हुआ जब सभ्य संसार के उन्नत समाज आर्थिक विकास के एक निश्चित स्तर तक पहुँचे। चेतना सामाजिक अस्तित्व का निर्धारण नहीं करती; सामाजिक अस्तित्व चेतना का निर्धारण करता है।


हमने देखा कि यह परम सत्य काल्पनिक समाजवादियों की पकड़ से बाहर रहा। उनको पूरा विश्वास था कि सामाजिक अस्तित्व 'विचार' से निर्धारित होता


काल्पनिक समाजवाद की धाराएँ / 63


है। इस बात को ध्यान में रखकर ही हम यह समझने में समर्थ होंगे कि, मिसाल के लिए, सेंत-साइमन अपने 'धर्म' तक कैसे पहुँचे।


वे कहते हैं कि धार्मिक विचारों का जन्म विश्व की वैज्ञानिक प्रणाली से होता है। मतलब यह कि यह प्रणाली बदल जाए तो फिर धार्मिक विचार भी बदल जाएँगे। लेकिन यह प्रणाली मध्य युग में जो कुछ थी उसके मुक़ाबले बहुत अधिक बदल चुकी है, इसलिए समय आ गया है कि नए धार्मिक विचारों का उदय हो। इसी बात को मन में लिये सेंत-साइमन ने 'नयी ईसाइयत' का आविष्कार किया। यह आसानी से दिखाया जा सकता है कि वे खुद एक पक्के नास्तिक थे। इसलिए सवाल पैदा होता है उन्होंने फिर एक नये धर्म का सृजन क्यों किया? इस उलझन भरे प्रश्न का उत्तर यह है कि सेंत-साइमन धर्म को उसकी उपयोगिता की निगाह से देखते थे। धार्मिक विचार नैतिक धारणाओं को निर्धारित करते हैं और इसलिए जो भी अपने समकालीनों के नैतिक आचरण को प्रभावित करना चाहता है उसे धर्म का सहारा लेना ही होगा। यही सेंत-साइमन ने किया। अगर मेरी व्याख्या पाठक को अविश्वसनीय लगती है तो मैं उसे याद दिलाना चाहूँगा कि सेंत-साइमन इस प्रश्न पर भी 18वीं सदी की दृष्टि से विचार करते थे। मतलब कि वे यह मानते थे कि धर्मों का गठन बुद्धिमान 'विधि-निर्माताओं द्वारा समाज कल्याण के लिए किया जाता है।107


संभवतः इसी तरह के खयाल काबे की रचना Levrai Christianism suivant Jesus Christ' 108 के पीछे कार्यरत थे। 'सच्ची ईसाइयत' का आविष्कार करते समय काबे की इच्छा पुराने ज़मानों के बुद्धिमान विधि-निर्माताओं का अनुकरण करने की थी, यानी कि उनके उस रूप की जो 18वीं सदी के दार्शनिकों की कल्पना में रची-बसी थी।


यह सब कहते हुए मैं यह दावा नहीं करना चाहता कि यहाँ जिन समाजवादी लेखकों में हमारी दिलचस्पी है वे सभी धर्म पर 18वीं सदी के दृष्टिकोण से सहमत थे। यह एक अवांछित अतिशयोक्ति होगा। धर्म के प्रति उन सबके रवैये सेंत-साइमन या काबे जैसे नहीं थे। पहली बात तो यह है कि 18वीं सदी के दार्शनिक विचारों के ख़िलाफ़ जो रोमानी प्रतिक्रिया फ्रांसीसी बुद्धिजीवियों में व्यापक रूप से प्रचलित थी, उसका प्रभाव भी 1830 और 1840 की दहाइयों के समाजवादियों पर, अर्थात् 'दूसरी पीढ़ी' के समाजवादियों पर पड़ा और इसने उन पर प्रबोध के दर्शन से विरासत में मिले धर्म-विरोधी विचारों के प्रभाव को सार्थक रूप से कम किया। सेंत-साइमन के अपने शिष्यों ने अपने गुरु द्वारा आविष्कृत नये धर्म के आकर्षण को अपने दिमाग़ नहीं, दिल से महसूस किया। नतीजा यह हुआ कि उनकी सभाएँ कभी-कभी वास्तविक धार्मिक भावातिरेक की भावना से संचालित की जाती थीं। हमें यह भी याद रखना चाहिए कि जब समाजवाद का उन दिनों के फ्रांसीसी प्रबुद्ध वर्ग पर भारी प्रभाव


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पड़ा तब उसने ऐसे लोगों तक को आकर्षित किया जो कभी भी और किसी भी रूप में 18वीं सदी के दर्शन के प्रभाव में नहीं रहे। उनमें सबसे उल्लेखनीय नाम संभवतः ज्याँ लामेनाई का था।109 यह कोई संयोग नहीं था कि जार्ज साँ (George Sand) ने अपनी रचना Historie de mavie में बेहद जीवंत और मनमोहक रंगों में लामेनाई की तस्वीर खींची है। वे सचमुच एक बहुत उल्लेखनीय व्यक्ति थे। उनके व्यक्तित्व में प्राचीन यहूदी पुरोहितों की धार्मिक संभाषण की शक्तिशाली कला, एक क्रांतिकारी की प्रकृति और बदहाली की शिकार जनता के प्रति दिली हमदर्दी का समन्वय दिखाई देता है। उनकी रचना Paroles d'un croyant (1834) पढ़ने के बाद शातियोब्रायाँ ने कहा था 'यह पादरी अपनी घंटामीनार में एक क्रांतिकारी क्लब बनाना चाहता है।' ऐन मुमकिन है। लेकिन एक 'क्रांतिकारी क्लब' बनाने की कोशिश करते समय भी लामेनाई एक कैथलिक पादरी ही रहे। चर्च से संबंध तोड़ने के बाद भी उनके धार्मिक विचारों ने पुरानी धर्मशास्त्रीय प्रथाओं का लबादा नहीं उतारा और ठीक इसी कारण उनके धार्मिक विचारों और भावनाओं को उन दिनों के फ्रांसीसी समाजवाद वाला नहीं माना जा सकता। यही बात फिलिप ब्यूशेत्ज़110 के बारे में कही जा सकती है जो जवानी में थोड़े समय तक समाजवाद के मोहपाश में बँधे रहने के बाद जल्द ही कैथलिकवाद की ओर वापस आ गए।


फ्रांस में 'दूसरी पीढ़ी' के काल्पनिक समाजवादियों की 'धार्मिक तलाशों' की विशेषताएँ सिर्फ वैसे धर्म दिखाते हैं जैसे संत-साइमनवादियों के (और मैं दोहरा दूँ : न कि सेंत-साइमन के), पियरे लेरो आदि के थे। ये धर्म 18वीं सदी के प्रबोध के दर्शन के खिलाफ़ सामने आने वाली रोमानी प्रतिक्रिया से किस हद तक संबंधित थे इसे हम, प्रसंगवश, इस तथ्य से समझ सकते हैं कि अनेक सेंत-साइमनवादी उत्साह के साथ जोसेफ दे मैस्त्रे और उसी प्रवृत्ति के दूसरे लेखकों की रचनाओं को पढ़ते थे। यह महत्त्वपूर्ण स्थिति दिखाती है कि रोमानी प्रतिक्रिया ने फ्रांसीसी काल्पनिक समाजवाद को ऐसे समय में प्रभावित किया जबकि खुद उसमें और स्वतंत्रता की किसी प्रकार की अभिलाषा में एक सिरे से कोई साझी बात थी ही नहीं। फलस्वरूप उन दिनों के समाजवादियों की 'धार्मिक तलाशों' की तुलना उनके हाथों वर्ग संघर्ष के अस्वीकार से तथा उनके किसी भी कीमत पर सामाजिक शांति सुनिश्चित करने के प्रयासों से की जा सकती है। ये तमाम बातें- एक धर्म की 'तलाश', वर्ग संघर्ष से चिढ़ तथा शांति से प्रेम जिसे उन्होंने एक कठमुल्लावाद बनाकर रख दिया - और कुछ नहीं बल्कि '1793 के महासंकट' के बाद पैदा होने वाली निराशा और ऊब का नतीजा थीं। काल्पनिक समाजवादियों की निगाहों में क्रांतिकारी संघर्ष का भयानक वर्ष उनके इस विश्वास के पक्ष में सबसे विश्वसनीय प्रमाण था कि सामान्यतः वर्ग-संघर्ष एक सिरे से व्यर्थ होता है। कुछ ने तो बल्कि यह भी कहा कि वर्ग संघर्ष की व्यर्थता 1793 के उदाहरण से सबसे अच्छी तरह साबित होती है।111 18वीं सदी के क्रांतिकारियों


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से कोई हमदर्दी न होने के कारण उन्होंने जो कुछ क्रांति के दुश्मनों ने कहा और लिखा था उस पर सावधानी से विचार करना शुरू कर दिया था। वैसे तो प्रतिक्रिया के सिद्धांतकार उनको अपना पक्षधर बनाने में सफल नहीं हुए, वैसे तो उन्होंने 18वीं सदी के सैद्धांतिक कार्य को एक हद तक जारी रखा तथा अंशतः अपना एक अलग और एक अर्थ में नया रास्ता अपनाया, फिर भी प्रतिक्रिया ने उनके विचारों पर स्पष्ट छाप छोड़ी। अगर इस बात को ध्यान में न रखा जाए तो फ्रांसीसी काल्पनिक समाजवाद के कुछ अहम पहलू समझ से परे ही रहेंगे। इनमें ही 1830 और 1840 की दहाई वाले रूपों में इस समाजवाद की 'धार्मिक तलाशें भी शामिल हैं।


नौ


अब समय है फ्रांसीसी काल्पनिक समाजवाद की उस प्रवृत्ति के बारे में, थोड़े से शब्दों में सही, कुछ कहने का, जिसे मैंने पहले सामान्य नियम का अपवाद कहा है। पहली बात यह है कि सामान्य नियम के विपरीत यह प्रवृत्ति क्रांतिकारी भावना से भरी हुई थी। दूसरे, इसने राजनीति को खारिज नहीं किया। तीसरे, यह धार्मिक तलाशों' से कोसों दूर थी। इस प्रवृत्ति के सबसे उल्लेखनीय प्रतिनिधि आगस्त ब्लांकी थे112 जिन्होंने नारा दिया था: न तो ईश्वर, न मालिक!113 अपने दौर की आत्मा की इस क़दर उलट यह प्रवृत्ति भला आई कहाँ से ?


इसके मूल को समझने के लिए हमें यह याद करना होगा कि आरंभ में इसे बैब्यूफ़वाद कहा जाता था। जो लोग इस प्रवृत्ति से जुड़े थे, खुद को 18वीं सदी के अंतिम वर्षों के प्रसिद्ध साम्यवादी क्रांतिकारी बेब्यूफ़114 के अनुयायी मानते थे। 1880 के दशक के पूर्वार्ध में फ्रांसीसी बैब्यूफ़वादियों में सबसे प्रभावशाली व्यक्ति वह था जिसने 'बराबरवालों के षड्यंत्र' (कॉस्पिरेसी आफ़ इक्वल्स) में भाग लिया था। 115 यह व्यक्ति माइकैलेंजेलो का वंशज था, उसका नाम फ़िलिप्पो ब्यूनारोती था और उसने इस षड्यंत्र का एक इतिहास लिखा था।116 यह बात आम जानकारी का हिस्सा है कि वैब्यूफ़ तथा 'बराबरवालों का षड्यंत्र के दूसरे भागीदार घोर क्रांतिकारी थे। उन्होंने अपने घोषणापत्र में लिखा था: 'हम सच्ची समानता की मांग करते हैं या फिर मौत की। और हम इसे लेकर रहेंगे। इससे मतलब नहीं कि किस क्रीमत पर। बला टूटे उनके सरों पर जो हमारे और इसके बीच आकर खड़े हो जाते हैं,' वगैरह-वगैरह। 19वीं सदी के काल्पनिक समाजवादियों की भाषा और इस भाषा में कहीं कोई समानता ही नहीं। और जो अपेक्षाकृत बहुत थोड़े से फ्रांसीसी समाजवादी बेब्यूफ और उनके साथियों के वचन के प्रति सच्चे रहे, वे किसी भी तरह सामाजिक शांति के चाहनेवाले नहीं थे। आगस्त ब्लांकी ने अपने दौर के फ्रांसीसी समाजवादियों के इस रुझान की अपमानजनक निंदा की; रहे वे लोग तो वे भी इस पक्के पानी


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के अनथक क्रांतिकारी षड्यंत्रकारी को भय की दृष्टि से देखते थे।117 


 इस तरह हम देखते हैं कि यहाँ हम जिस प्रवृत्ति की विवेचना कर रहे हैं, यह कहाँ से आई। यह सीधे-सीधे 18वीं सदी की क्रांतिकारी आकांक्षाओं की निरंतरता में थी। चूँकि भारी क्रांतिकारी तूफ़ान ने फ्रांस की जनता को निढाल कर दिया था और प्रबुद्ध वर्ग के एक बड़े भाग को वर्ग संघर्ष के प्रति एक नकारात्मक रुख से मार दिया था, इसलिए यह प्रवृत्ति कुछ ज़ोर नहीं पकड़ सकी। यह फ्रांसीसी समाजवादी चिंतन की विशाल धारा में मात्र एक छोटे से हिलकोरे जैसी थी।118 यही कारण है कि इसे मैंने सामान्य नियम का अपवाद कहा है।


पाठक इस बात को समझ सकते हैं कि फ्रांसीसी बुद्धिजीवियों के थोड़े से प्रतिनिधि जो 1793 के महासंकट' से पैदा होनेवाले भय से अप्रभावित रहे, ये 18वीं सदी की वैचारिक संपदा को अस्वीकार करते, इसका कहीं कोई विशेष कारण नहीं था। फलस्वरूप धर्म के प्रति उनका रुख ठीक वही था जो प्रबोध के फ्रांसीसी दर्शन के सबसे प्रमुख प्रवक्ताओं को दूसरों से अलग ठहराता था। यही स्रोत है आगस्त ब्लांकी की इस चुनौती का 'न तो ईश्वर, न मालिक!' यही बात उनकी राजनीति को समझ के बारे में कही जाएगी; यहाँ भी उन्होंने 18वीं सदी वालों का अनुकरण किया और इन लोगों ने राजनीति की ओर से मुँह नहीं मोड़ा; उलटे, उन्होंने राजनीतिक कार्यकलाप को ज़रूरत से ज्यादा महत्त्व दिया। उन्होंने बड़ी सादगी से यह मान लिया कि 'विधि-निर्माता' अपने आदर्श के मुताबिक तमाम सामाजिक संबंधों का, बल्कि नागरिकों की आदतों, रुचियों और आकांक्षाओं तक का पुनर्निर्माण कर सकता है। यह बात स्वतः स्पष्ट है कि विचाराधीन काल के बेब्यूफ़वादी और ब्लांकीवादी, जिन्होंने 'विधि-निर्माता' की अधिकतर ऐसी ही धारणा अपना रखी थी, राजनीतिक उदासीनता की ओर प्रवृत्त बिलकुल नहीं थे। बात ठीक उल्टी है लाज़िम था कि अपने साम्यवादी आदशों को साकार करने के लिए वे खुद को ऐसे ही 'विधि-निर्माताओं' की स्थिति में लाने की कोशिश करें। गुप्त संगठनों और योजनाओं के सहारे वे इसी स्थिति को पाने की उम्मीद करते थे। इस तरह उनकी कार्यनीतियाँ, जो 'विधि-निर्माता' की भूमिका के बारे में उनकी धारणा की तार्किक उपज थीं, उन दिनों के काल्पनिक समाजवादियों की कार्यनीतियों की ठीक उलटी थीं। लेकिन उनकी कार्यनीतियों को एक ठोस आधार देने के लिए यही काफ़ी नहीं था। सेंत-साइमन या फूरिये, काबे या पियरे लेरो के समाजवाद की तुलना में बेब्यूफ़वादियों और ब्लांकीवादियों का साम्यवाद कुछ कम काल्पनिक नहीं था। हाँ, उनका कल्पनावाद एक अलग ही क़िस्म का ज़रूर था। 'विधि-निर्माता की, अर्थात् राजनीति की शक्ति में जो विश्वास उन्होंने 18वीं सदी से ग्रहण किया था, ठीक उसी ने उन्हें कल्पनावादी बनाया। इस सिलसिले में उस दौर का क्रांतिकारी साम्यवाद समाजवाद से बहुत पीछे था जो वर्गों में सुलह के सपने तो देखता था और जिसने राजनीति का निषेध करके एक भयानक सैद्धांतिक


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ग़लती की, पर फिर भी जिसने सामाजिक क्षेत्र संबंधी अध्ययनों से सिद्धांत को समृद्ध बनाया। नतीजा यह निकला कि कुछ काल्पनिक समाजवादियों ने, जो संख्या में सबसे अधिक थे, 'सामाजिक' सिद्धांत पर अपना ध्यान केंद्रित कर दिया जबकि सामान्य नियम के अपवाद का प्रतिनिधित्व करने वाले दूसरे लोगों ने राजनीतिक कार्रवाई पर ध्यान लगाया। यकतरफ़ापन का पाप दोनों ने किया। ऐसे यकतरफ़ापन का खात्मा भविष्य में चलकर ही संभव था। इसके लिए सिद्धांत के क्षेत्र में एक पूरी क्रांति दरकार थी। समाजवाद ने जब इतिहास की विचारवादी धारणा का त्याग किया और भौतिकवादी धारणा को अपनाया तभी जाकर उसमें कल्पनालोक से दामन छुड़ाने की संभावना पैदा हुई। लेकिन समाजवाद का कल्पना से विज्ञान में संक्रमण यथार्थ जगत् में कैसे संभव हुआ, इसकी कहानी दर्ज करना प्रस्तुत लेख के दायरे से बाहर है। 119


टिप्पणियाँ


1. अंग्रेज़ी और फ्रांसीसी साहित्य में 'समाजवाद' शब्द का प्रयोग सबसे पहले 19वीं सदी की चौथी दहाई में नज़र आता है। इनसाइक्लोपेडिया ब्रिटानिका (खंड 22, पृ. 205) में लेख 'सोशलिज्म' का लेखक कहता है कि इस शब्द को जन्म 'द एसोसिएशन आफ आल क्लासेज आफ आल नेशंस ने दिया जिसका गठन इंग्लैंड में 1835 में किया गया था पियरे लेरो का कथन है कि पहली बार इसका प्रयोग उन्होंने 1854 में एक लेख में किया था। जिसका शीर्षक दत इनदिविजुअल एन यू सोशलिज्म' (व्यक्तिवाद और समाजवाद) था। फिर भी यह बात कही जानी चाहिए कि उपर्युक्त लेख में लेरो ने इस शब्द का प्रयोग संगठन के विचार की अत्योक्ति के अर्थ में किया था। कुछ समय बाद इसका प्रयोग निचले वर्गों के कल्याण में वृद्धि के लिए और सामाजिक शांति सुनिश्चित करने के लिए समाजव्यवस्था के पुनर्निर्माण के किसी भी प्रयास के बारे में किया जाने लगा था। इस शब्द के अत्यंत अस्पष्ट अर्थ को देखते हुए प्रायः इसका प्रयोग शब्द साम्यवाद (कम्युनिज्म) के विरोध में किया गया है; यहाँ साम्यवाद से अभिप्राय उत्पादन के साधनों को, और कहीं-कहीं तो उपभोग की वस्तुओं को भी सामाजिक संपत्ति में रूपांतरित करके सामाजिक समानता की स्थापना के कहीं बहुत अधिक सुनिश्चित उद्देश्य से है। आजकल 'समाजवाद शब्द 'साम्यवाद' शब्द को लगभग पूरी तरह विस्थापित कर चुका है, लेकिन फ्रायदा यह हुआ है कि इसकी पहलेवाली अस्पष्टता समाप्त हो चुकी है। इसका मौजूदा अर्थ शब्द 'साम्यवाद' के अर्थ से काफी कुछ मेल खाता है।


2. कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिख एंगेल्स, पवित्र परिवार संपादक।


3. उपर्युक्त संपादक।


4. रिये का जन्म सानश्योन में 7 अप्रैल 1772 को हुआ था। 10 अक्तूबर 1837 को पेरिस में उनका निधन हुआ।


5. पुस्तक के मुखपृष्ठ पर 'लाइपजिम' छपा है।


6. फूरिये, उपर्युक्त, पृ. 51


7. यहाँ फूरिये का इशारा 1789 की फ्रांसीसी क्रांति के बाद 1793 में जैकोविनों की तानाशाही की स्थापना से है- संपादक। पूर्वोक्त पृ. 81


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9. फ्रांसीसी भाषा में फूरिये को संकलित रचनाएँ (1841), जिल्द दो का पृ. 319 देखें। 

10. उपर्युक्त, जिल्द चार, पृ. 254 देखें फ़रिये हमें विश्वास दिलाना चाहते हैं कि एक प्रति सिंह पर तयारी करते हुए कोई व्यक्ति पेरिस में नाश्ता,  ल्योन्स में दोपहर का भोजन और मार्सेइलीज में रात का भोजन कर सकता है। जरूरत बस यह है कि जब ये नेक पशु थक जाएँ तो उन्हें बदल दिया जाए।


11. उपर्युक्त पृ. 255 देखें।


12. यह पुस्तक 1808 में प्रकाशित हुई थी अर्थात् नेपोलियन प्रथम के शासनकाल में जो, जैसाकि सभी जानते हैं, 'आंदोलनकारियों के प्रति नरमी नहीं दिखाता था।


13. यह पुस्तक 1835 में प्रकाशित हुई थी और स्पष्ट है कि यह टिप्पणी (उसी वर्ष 28 जुलाई के रोज़) तुई फिलिप को मारने के लिए फ्रिएशी की कोशिश को नज़र में रखकर लिखी गई थी। 

14. इस पृष्ठ पर पृष्ठ संख्या नहीं पड़ी है, पर इसके बाद वाले पृष्ठ पर M-616 की संख्या पड़ी है। 

15. हम पहले ही देख चुके हैं कि इससे फूरिये की मुराद सभ्य समाजों के सामाजिक ढाँचे से है।


16. उपर्युक्त पुस्तक, पृ. 388 ।


17. उपर्युक्त, पृ. 8 । 

18. पेरिस में 17 अक्तूबर 1760 को जन्म वहीं 19 मई 1825 को निधन |


19. फ्रांसीसी भाषा में संत-साइमन की चुनी हुई रचनाओं (सेल्स 1859) की पहली जिल्द का पृ. 20 और 21 देखें। 


20. उपर्युक्त, पृ. 31


21. उपर्युक्त पृ. 27


22. जहाँ फूरिये दार्शनिकों के खिलाफ गरजते-बरसते हैं, वहीं सेंत-साइमन 'विधि-विशेषज्ञों' के ख़िलाफ़ झाग उगलते हैं। उनको राय थी कि इन्हीं के 'तत्त्वमीमांसी सिद्धांत' फ्रांसीसी क्रांति के असफल परिणामों को स्पष्ट करते हैं। Dusysteme industriel par Henri Saint-Simon (पेरिस, 1821, भूमिका, पृ. 1-8) देखें जिसके साथ यह उक्ति दर्ज है: प्रभु ने कहा एक-दूसरे से प्रेम और एक दूसरे की सहायता करो 'विधि विशेषज्ञों' या तत्वमीमांसी सिद्धांत के प्रतिनिधि के बारे में संत-साइमन की धारणा वैसी ही है जैसी 'दार्शनिक' या 'संदिग्ध विज्ञानों के प्रतिनिधि के बारे में (जैसी कि हमें उनकी पुस्तक से पता चलता है) फूरिये की धारणा है। हमारी राय में आज शब्द क्रांतिकारी प्रबुद्ध वर्ग इसी धारणा का परिचायक है।


23. इन शब्दों पर जोर स्वयं संत-साइमन का है। उपयुक्त पुस्तक में उनका परमार्थियों से संबोधन,' पू. 297, 298 और 302 देखें। जो लोग संत-साइमन के विचारों के विकास में दिलचस्पी रखते हैं उनके लाभार्थ में यह बात कहना चाहूँगा कि इसी पुस्तक में le noveau Christianisme और le Christianisme definitiy जैसी अभिव्यक्तियों मिलती है, और इसमें ही वे कभी-कभी ईसा को साथी संतों की शैली में अपनी बात कहते हुए नैतिक और राजनीतिक धर्मद्रोहियों को अपनी और बुलाते हुए (पृ. 310) नज़र आते हैं। धर्म को अपना आधार बनाने के संत-साइमन के प्रयासों को कैसे समझे, इसे हम आगे देखेंगे।


24. साम्यवादी जिस समानता के लिए प्रयासरत है, उसे साइमन में यही नाम दिया है। उनका दावा था कि ऐसी समानता सिर्फ पूरब के निरंकुशतंत्रों में समय है।


25.औधोगिक व्यवस्था, पृ. 205-07 


26 जन्म 1808 में निधन 1893 में


27. जोर हमारा


28. उपर्युक्त पृ. 2 और 52


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29. उपर्युक्त, पृ. 16; ज़ोर कॉसिदेरों का। 30. उपर्युक्त, पृ. 63; ज़ोर कोसिदेरों का।


31. उपर्युक्त, पृ. 147


32. में यहाँ याद दिला दूँ कि कीसिदेरों की पुस्तिका 1836 में प्रकाशित हुई थी, अर्थात् लुई फिलिप के शासन के सबसे तूफ़ानी काल में।


33. ये कहते हैं (उपर्युक्त, पृ. 24) के वे लोग हरेक उत्तम भावना के साथ एक पुलिसवाले को बिठा देने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं। यह बात सही अर्थों में और नाटकीय सीमा तक मुनासिब


34. उपर्युक्त, पृ. 57. जोर कॉसिदेरों का।


35. उपर्युक्त, पृ. 91 देखें उनकी रचना Priniciples du socialisme, manifeste de la democratic an XIX siecle ( समाजवाद के सिद्धांत 19वीं सदी में लोकतंत्र का घोषणा-पत्र), दूसरा संस्करण, पेरिस, 1847 देखें इस रचना में, जो उन दिनों लिखी गई थी जब राजनीति को खारिज करने की तरफ कोसिदेरों का रुझान कम हो गया था, क्रांतिकारी पक्ष को अन्यथा प्रतिक्रियावादी लोकतंत्र कहा गया है (पृ. 15) क्योंकि सिर्फ़ शांतिपूर्ण लोकतंत्र ही प्रगतिशील होता है। कॉसिदेरेंत ने तमाम क्रांतिकारियों में अपनी कठोरतम निंदा का पात्र राजनीतिक साम्यवादियों' को बनाया है (पृ. 46) जो "एक महान भौतिक क्रांति का रास्ता दृढ़ता के साथ स्वीकार करते हैं। इन कम्युनिस्टों के बारे में आगे चलकर कुछ कहूँगा।


36. फूरिये के एक और शिष्य थे ए पैगे जो पहले संत-साइमनवादी रह चुके थे। कहते हैं कि उनके सहकर्मियों ने 'सामाजिक प्रश्नों जैसी अधिक उपजाऊ जमीन में अपनी बुद्धि खपाने के लिए राजनीति के क्षेत्र को त्याग दिया था। (Introduction etude de la science sociate समाजविज्ञान का अध्ययन एक परिचय, पेरिस, 1838 देखें।) यहाँ राजनीति को दोटूक ढंग से सामाजिक प्रश्नों के क्षेत्र में होनेवाली गतिविधियों के मुक़ाबल रखा गया है। राजनीति के मुकाबले सामाजिक प्रश्नों को यूं रखना काल्पनिक समाजवादियों के एक भारी बहुमत की साझी विशेषता है। आगे हम देखेंगे कि इस सामान्य नियम के अपवादों की व्याख्या किस बात से होती है। लेकिन काल्पनिक समाजवादियों की लाक्षणिक विशेषता अपवाद नहीं, ठीक यही नियम है। राजनीति के मुकाबले सामाजिक प्रश्नों को यूं रखने का चलन, जो पश्चिम से उधार लिया गया है, माक्र्सवाद की विजय से पहले तक रूसी साहित्य में भी हावी रहा है।


37. इसी पत्रिका की दूसरी जिल्द में इनप्रतिन का लेख पृ. 479 देखें। 38. दिसंबर 1828 में इनफ्रेंतिन, बाजेयर और दूसरे सेंत-साइमनवादियों ने पेरिस में सार्वजनिक व्याख्यानों की एक श्रृंखला आयोजित की थी जिन्हें 'तारानी मार्ग के व्याख्यान' कहा जाता था। संत-साइमनवादी संप्रदाय के नेताओं का एक तंग का ही प्रत्येक व्याख्यान की विषयवस्तु पर बहस करता था। संत-साइमनयादी सिद्धांत परिचय का पहला संस्करण पेरिस से 1830 में प्रकाशित हुआ था। इसमें 17 दिसंबर 1828 से 12 अगस्त 1829 के बीच दिए गए व्याख्यान शामिल थे।


39. संत-साइमनवादी संप्रदाय ने 1829 के अंतिम दिनों में एक धार्मिक संप्रदाय का रूप ले लिया तथा बाजेयर और इनप्रतिन इसके 'फ्रादर' घोषित किए गए। 1830 के अंत तक संत-साइमन के विचारों के सबसे पक्के समर्थक एक परिवार की तरह एक अलग इमारत में रहने लगे थे। आगे चलकर इनफ्रेंतिन और बाज़ेयर अलग-अलग हो गए और सेंत-साइमनवादी संप्रदाय का अंत हो गया।


40. संत-साइमन और इनफ्रेंतिन की रचनाएँ (फ्रांसीसी संस्करण), जिल्द चार, पेरिस, 1865. पृ. 58-59


देखें। 41. जोर लाशे का


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42. उपर्युक्त, पृ. 70, 71 और 721


45. उपर्युक्त पृ. 581


44. जन्म पेरिस में 1797 में यहीं 1871 में निधन।


45. उनका से ग्लोब के नाम खुला पत्र देखें। (यह पत्रिका -साइमनवादियों का मुखपत्री जी 1824 में शुरू की गई और 1832 में बंद हो गई-संपादक ) 40. जन्म 29 अक्टूबर 1811 के रोत; 6 दिसंबर 1882 को निधन


47. श्रम का संगठन (फ्रांसीसी मूल), चौथा संस्करण, पेरिस, 1845 प्रस्तावना, पू. पाँच और 31-32 देखें इस पुस्तक का पहला संस्करण 1849 में प्रकाशित हुआ था। 48. जन्म 15 जनवरी 1809 के रोड, 19 जनवरी 1865 को नियन


49. ढों के पत्र हाथ में न होने के कारण में यह उद्धरण Abrege des oewares de Proudhon मे दे रहा हूँ जिसमें पृ. 414-15 पर यह पत्र छपा है हालांकि, बदनसीबी से पूरा नहीं उस है।


50. अराजकबाद राज्य को एक व्यर्थ की ऊपर से आरोपित कोई वस्तु माननेवाला सिद्धांत। जहाँ मार्क्सवाद के अनुसार ऐतिहासिक विकास के एक लंबे क्रम में ऐसी परिस्थितियों पैदा होगी कि राज्य की उपयोगिता न रहे और धीरे-धीरे उसका क्षय हो जाए, वहीं अराजकवादियों के अनुसार थोड़े से व्यक्ति कुछ विशेष प्रकार की कार्रवाई करके राज्य का नाश कर सकते हैं। यहाँ दों, बाकुनिन आदि जो नाम लिखे गए हैं उनके अलावा अग्रजकवादियों में एक प्रमुख नाम वास्त का भी है। कुछ अवसरों पर गाँधी के विचार भी, मुख्यतः तालस्वाय के प्रभाववश, ऐसे रहे हैं कि वे बहुत से पाठकों को अराजकवादी महसूस होते हैं संपादक।


51. संयवाद (सिंडिकलिज़म): 19वीं सदी के अंतिम और 200वीं सदी के आरंभिक दशकों में पश्चिमी यूरोप के मजदूर आंदोलन की एक निम्न-पूँजीवादी प्रवृत्ति अराजकवाद से कुछ हद तक मेल खाती यह प्रवृत्ति मज़दूर वर्ग के लिए राजनीतिक संघर्ष की कोई आवश्यकता नहीं समझती थी। संचवादियों का विचार यह था कि मात्र एक आम हड़ताल करके ट्रेड यूनियनें उत्पादन के सभी साधनों को अपने हाथ में ले सकती हैं तथा इस तरह पूंजीवाद का विनाश कर सकती हैं। संघवादियों के विचार में मज़दूर वर्ग के लिए न तो किसी राजनीतिक संगठन (पार्टी) की आवश्यकता है, न किसी वैचारिक और सांगठनिक प्रशिक्षण की, और न ही किसी क्रांति की संपादक


52. फ्रांसीसी गणराज्य (1848) के आरंभिक दिनों में राजकीय झंडे का सवाल भी उठाया गया। मजदूर तो लाल झंडे के पक्ष में थे मगर पूँजीपति वर्ग तिरंगे के पक्ष में या जो फ्रांसीसी क्रांति का और नेपोलियन के साम्राज्य का झंडा रह चुका था। आखिर मजदूरों के प्रतिनिधियों को मन मारकर


तिरंगे को ही फ्रांसीसी गणराज्य के परचम के रूप में स्वीकार करना पड़ा-संपादक। 53. ए देस्यार्टिन्स, पी जे प्रूदों, जिल्द एक, 1896, पृ 90 की टिप्पणी देखें।


54. उपर्युक्त, पृ. 99 से उद्धृत


55. जनता की आवाज़ शीर्षक वाला यह दैनिक पत्र प्रूटों द्वारा अक्तूबर 1849 से 14 मई 1850 तक पेरिस से प्रकाशित किया जाता रहा।


56. पी जे प्रूदों, साइने लेहरे डंड साइन लेबेन (पी जे प्रूदों उनका कृतित्व और उनका जीवन), जिल्द तीन, येना, 1896 में पृ. 100 पर कार्ल डोहूल द्वारा उद्धृत।


57.वोयेज एन इकारी, पेरिस, 1845, पृ. 565 देखें। ज़ोर लेखक का अपना है। काबे का जन्म 2 जनवरी 1788 को हुआ था और ये 8 नवंबर 1856 को दिवंगत हुए। उनकी इस पुस्तक का पहला संस्करण मार्च 1942 में प्रकाशित हुआ था। (यहाँ प्लेखानोव गलती पर हैं। कावे की पुस्तक का पहला संस्करण पेरिस से 1840 में ही प्रकाशित हुआ था तब इसका शीर्षक Voyage et aventures delord William Corisdall en Icarie था। 1842 में वास्तव में इसी पुस्तक का दूसरा संस्करण


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Paavegeen Icaric, Roman Philosophique et sociale के शीर्षक से प्रकाशित हुआ-संपादक ) 

58. हम धार्मिक है, अर्थात् शांतिप्रेमी हैं और सभी व्यक्तियों, सभी वर्गों, सभी पक्षों से प्रेम करते हूँ...हम समझते हैं कि हिंसा हमेशा घृणित, हमेशा अनीश्वरीय होती है। यह बात शार्ल लेमोनिये ने संत-साइमनवादियों का आह्वान करते हुए 7 जुलाई 1832 को कही थी। उन्होंने आगे यह भी ऐलान किया कि सेत-साइमनवादी सभी पक्षों से प्रेम करते हैं लेकिन उनमें से किसी से नाता नहीं जोड़ते। फिर उन्होंने अपना खुद का कार्यक्रम प्रतिपादित किया जो उनकी राय में सभी राजनीतिक मतों वाले व्यक्तियों को एकजुट करने में समर्थ था (1) पेरिस से मार्सेइलीज़ तक एक रेल लाइन का फ़ौरन निर्माण, (५) पेरिस में जल आपूर्ति और गंदे पानी की निकासी की व्यवस्था में सुधार, (3) लोने से बास्तील तक एक सड़क का निर्माण, आदि।


59. फैलेस्तरियों उन प्रासादों को दिया गया नाम था जिनकी योजना फूरिये ने बनाई थी। उनकी योजना के अनुसार एक आदर्श समाजवादी व्यवस्था में उत्पादक संघों और उपभोक्ता संघों के सदस्य इन्हीं प्रासादों में रहेंगे और मिलकर काम करेंगे-संपादक। 


60. संत-साइमन और इनफ़तिन की रचनाएँ (फ्रांसीसी संस्करण), जिल्द आठ, पेरिस, 1866, पृ. 168 देखें। उपर्युक्त पत्र इसी जिल्द के पृ. 165-66 पर छपा है। बेरी की डवेज़ को 6 नवंबर (1852) को गिरफ्तार किया गया था और यह पत्र 9 नवंबर (1832) को लिखा गया था। इससे पता चलता है कि इनफ़तिन स्त्रियों को 'राजनीति में खींचने के लिए बेचैन थे। लेकिन जो कुछ कहा गया है उसके बाद यह कहने की शायद ही ज़रूरत पड़े कि यहाँ शब्द 'राजनीति' का एक बहुत ही अजीब-गरीब अर्थ था।


61. जारशाही रूस, आस्ट्रिया और प्रशा के राजतंत्रों द्वारा 1815 में कायम किया गया प्रतिक्रियावादी गठबंधन 'पवित्र गठबंधन' (होली एलायंस) कहलाता था। इसका उद्देश्य यूरोप के विभिन्न देशों में क्रांतिकारी आंदोलनों को कुचलना और वहाँ राजतांत्रिक व्यवस्था बनाए रखना था। 


62. संत-साइमन और इनफ़तिन की रचनाएँ, पूर्वोक्त, जिल्द दस, पृ. 118-191


63. लेकिन ओलिंदे रोद्रिग्बे जैसे प्रमुख सेंत-साइमनवादी तक की इस पत्र पर अनुकूल प्रतिक्रिया रही।


[एस शालेत, सेंत-साइमनवाद का इतिहास (फ्रांसीसी), पृ. 315 की टिप्पणी देखें]


64. इस विषय पर संत-साइमन और इनफ़तिन की रचनाएँ, जिल्द दस, पृ. 200, 205 देखें। 


65. उन्होंने अपना अराजकता का सिद्धांत सेंत-साइमन के इस विचार से प्राप्त किया कि सामाजिक जीवन में शासन की भूमिका ऐतिहासिक विकास के क्रम में घटती जाती है और कालांतर में शेष नहीं बचेगी। 


66. ए. देस्यार्दिन्स, पी जे प्रूदों, जिल्द एक, पृ. 1901


67. यहाँ इशारा 2 दिसंबर 1851 के रोज़ नेपोलियन बोनापार्त के भतीजे लुई बेनापात द्वारा किए गए। प्रतिक्रांतिकारी तख्तापलट की ओर है। इसी लुई ने फिर नेपोलियन तृतीय के नाम से खुद को फ्रांस का बादशाह घोषित किया। लुई बोनापार्त की अठारहवीं यूमेयर में मार्क्स ने इस तख्तापलट का एक विस्तृत वर्गीय विश्लेषण प्रस्तुत किया- संपादक। 


68 पदों की उपर्युक्त पुस्तक के पाँचवें संस्करण का पृ. 99 देखें।


69.देखें Opinions litteraires, Philosophiques et industrielles, पेरिस, 1825, पृ. 144-45; संत-साइमन की रचनाएँ... पेरिस, 1832, पृ. 18 भी देखें। 


70. मिसाल के लिए कोसिदेरों की रचना समाजवाद के सिद्धांत (फ्रांसीसी), पृ. 20-21 देखें।


71. रचनाएँ पूर्वोक्त पृ. 59


72. यह रचना Organisateur में 1819 में प्रकाशित हुई थी और इसके कारण सेंत-साइमन पर मुकदमा भी चला प्रसंगवश इस साहित्यिक मुकद्दमे का अंत अभियुक्त की जीत पर हुआ और ज्यूरी ने


72 / काल्पनिक समाजवाद की धाराएँ


उन्हें दोषी नहीं पाया।


73. उत्पादक (फ्रांसीसी), जिल्द एक, पृ. 245 ।


74. ज़ोर हमारा।


75. उत्पादक, पूर्वोक्त, पृ. 245


76. उपर्युक्त, पृ. 558|


77. एक बहुत प्रमुख संत-साइमनवादी आइज़क पेरेइरे थे जो बाद में एक प्रसिद्ध वित्तपति बने। 1831 में राजनीति अर्थशास्त्र पर दिए गए व्याख्यानों में से एक में उन्होंने समकालीन समाज में धन के वितरण के सवाल की छानबीन करने का वादा करते हुए स्पष्ट कहा था 'हम इस जगत्-व्यवस्था की नैतिकता की छानबीन करेंगे। संत-साइमनवादी धर्म उद्योग और चित्त के लिए इसके सबक़ (फ्रांसीसी), पेरिस, 1832, पृ. 3 देखें। यह मत सोचें कि यहाँ 'नैतिकता' शब्द का आलंकारिक प्रयोग किया गया है। अपने व्याख्यानों के संकलन की भूमिका में पेरेइरे कहते हैं 'पहले तो व्याख्यानों में हम मूल्य की उस धारणा का खंडन करेंगे जिसकी आज के अर्थशास्त्री शिक्षा देते हैं; हमने इसके खिलाफ़ लड़ाई इसलिए की कि वह आज के समाज में मौजूद संघर्ष की, शत्रुता की अभिव्यक्ति है।' यह पूँजीवादी उत्पादन-संबंधों का विश्लेषण करने की बजाय पूँजीवादी अर्थशास्त्रियों को नैतिकता की घुट्टी पिलाना है, और कुछ भी नहीं।


78. उपर्युक्त, पृ. 14 ।


79. प्रकाशित पांडुलिपियों (फ्रांसीसी), जिल्द 2, पृ. 23 बोर्गिन कृत फूरिये, पेरिस, 1905, पृ. 207 से उद्धृत।


80. शार्ल फ़रिये की संपूर्ण रचनाएँ (फ्रांसीसी), जिल्द तीन, पेरिस, 1841, पृ. 163-701 


81. उपर्युक्त, जिल्द चार, पृ. 193 ।


82. उपर्युक्त, जिल्द चार, पृ. 191-92 ।


83. प्रकाशित पांडुलिपियाँ, पूर्वोक्त, जिल्द तीन, पृ. 4 योगिन कृत फूरिये, पृ. 231 से उद्धृत 


84. ले सोशलिज्मे देव ते बियो मंदि, ओ ले वियों देखा लेस मोस, पेरिस, 1849, पृ. 13; समाजवाद के सिद्धांत (फ्रांसीसी), पूर्वोक्त, पृ. 6 से तुलना करें। 


85. समाजवाद के सिद्धांत (फ्रांसीसी), पृ. 22-23, 9-11।


86. फ्रांस के रेल कारोबार में इनफ़तिन ने खुद भाग लिया और लगता है इसे सुधारने में उन्होंने सहायता दी। 1846 के अंतिम दिनों में उन्होंने स्वेज नहर अध्ययन समिति का गठन किया, लेकिन यह उद्यम जब सफलता की ओर बढ़ रहा था, फ़र्दिनांद दे लेसेप्स ने इसे उनके हाथों से ले लिया। इस बारे में शालेंती, संत-साइमनवाद का इतिहास (फ्रांसीसी), पूर्वोक्त, पृ. 372, 398, 399 आदि देखे।


87. कॉसिदेरों की बेहद दिलचस्प पुस्तिका Deraison et dangers de I'engovement pour les chemins en fer, पेरिस, 1838 देखें फैलेंस्तरिया में उत्पाद का विभाजन इस तरह होना था : श्रम को 5/12, पूँजी को 4/ 12 और प्रतिभा को 3/12 भाग इस तरह तमाम बातों के बावजूद फरियादी इस अर्थ में सेंत-साइमनवादियों जैसे ही थे कि अपनी समाज निर्माण की योजना में उन्होंने भी पूँजी द्वारा श्रम के शोषण की गुंजाइश रखी। उन दिनों तमाम धाराओं के साम्यवादियों ने यह बात कही भी थी।


88. शालेती, पूर्वोक्त, पृ. 368।


89. यहाँ प्लेखानोव का इशारा रूस के क़ानूनी मार्क्सवादियों के प्रमुख सिद्धांतकार प्योत्र बर्नहार्दोविज स्त्रुवे  के एक कथन की ओर है। रूस में पूँजीवाद के विकास का विरोध कर रहे नरोदनिकों के खिलाफ़ अपनी पुस्तक रूस के आर्थिक विकास पर आलोचनात्मक टिप्पणियाँ (रूसी, सेंत पीतसंवर्ग,


काल्पनिक समाजवाद की धाराएँ / 73


1894) में स्त्रुवे  ने लिखा 'आइए हम अपने संस्कृति के अभाव को स्वीकार करें और प्रशिक्षण पाने के लिए पूँजीवाद की ओर चलें। 

90. श्रम का संगठन (फ्रांसीसी), दूसरा संस्करण, पृ. 10, 11, 50, 56 और 64 देखें।


91. दशक 1830-1840 का इतिहास (फ्रांसीसी), जिल्द एक, चौथा संस्करण, पृ. 8 की टिप्पणी देखें।


92. पियरे लेरो की रचना कुबेरतंत्र (फ्रांसीसी), बोसक, 1848, अध्याय 34 (सर्वहारा और पूँजीपति) में रेनो के उल्लेखनीय लेख के कुछ अंश पुनर्प्रकाशित किए गए हैं। लगता है लेरो की कृतियाँ (फ्रांसीसी), के असमाप्त संस्करण, पेरिस, 1850 की पहली जिल्द में पृ. 346-64 पर यह लेख पूरा का पूरा प्रकाशित किया गया था।


93. लेरो को बखूबी पता है कि उद्योगवाद पर उनके विचार संत-साइमन के विचारों से दुनियादी तौर पर भिन्न थे। वे अपने भूतपूर्व गुरु से शास्त्रार्थ तक करते हैं। 


94. उनकी पुस्तक के दूसरे संस्करण का पृ. 23-24 देखें, पहला संस्करण 1843 में प्रकाशित हुआ था।


95. उपर्युक्त, पृ. 97 और 167 ।


96. उपर्युक्त, पृ. 25


97. मेरा ख़याल है कि मिसाल के लिए, श्री पेशेखोनोव उस तर्कपद्धति को पूरी तरह स्वीकार करते। 

98. लेखों का संग्रह माल्थस और अर्थशास्त्री (फ्रांसीसी), जिल्द एक देखें। 99. उपर्युक्त, जिल्द एक, दूसरा संस्करण, पेरिस 1847, पृ. 286-90 देखें।


100. वर्ग संघर्ष के विचार का संत-साइमन द्वारा अस्वीकार ठीक-ठीक कहें तो कातिकारी कार्यकलाप का अस्वीकार था। जो लोग पुरानी व्यवस्था के अवशेषों के रक्षक थे उनके खिलाफ तीसरे जनवर्ग के शांतिपूर्ण संघर्ष की बात उन्होंने अस्वीकार नहीं की, बल्कि इसकी पैरवी ही की। सिर्फ मजदूरों और मालिकों के बीच एक संघर्ष का विचार ही उनकी तीखी और दोटूक निंदा का पात्र बनता। संत-साइमन अपने शिष्यों के मुकाबले राजनीति की ओर से कम उदासीन थे।


101. यह एक ऐसी गलती थी जो सिर्फ काल्पनिक समाजवादियों के यहाँ ही नहीं पाई जाती। राजनीतिक अर्थशास्त्र की विशेषताएँ (प्रारंभिक विवेचना) (फ्रांसीसी) में जे बी से कहते हैं: 'संपदा बुनियादी तौर पर राजनीतिक संगठन पर निर्भर नहीं होती। एक सुसंचालित राज्य किसी भी प्रकार के शासन में फूल-फल सकता है। ऐसे राष्ट्रों की मिसाले भी पता हैं जो निरंकुश राजाओं के शासन में समृद्ध बने, और ऐसे राष्ट्रों की भी जो जनता की सरकारों के अंतर्गत तबाह हो गए वगैरह-वगैरह। हम सब जानते हैं कि विज्ञान के क्षेत्र में जे बी से फ्रांसीसी पूँजीपति वर्ग के एक मिसाली प्रतिनिधि थे। 


102. निम्न-पूँजीपति वर्ग की 'पर्वत' (माउंटेन) पार्टी ने इटली की क्रांति को कुचलने के लिए फ्रांसीसी फ्रीजों को भेजे जाने के खिलाफ़ 18 जून 1849 को एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन का आयोजन किया। फौजियों ने प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर कर दिया। 'पर्वत' पार्टी के अनेक नेता गिरफ्तार कर लिये गए, अनेक को निर्वासित कर दिया गया था फिर फ्रांस छोड़ने पर मजबूर किया गया। 


103.संत-साइमन और फूरिये के काल की तुलना में उन दिनों प्रबुद्ध वर्ग के प्रति उनका रवैया कुछ अधिक ही उदार था। लेकिन आम तौर पर क्रांतिकारी कार्यकलाप की निंदा दे करते ही रहे। 


104 में यहाँ यहूदियों के खिलाफ़ जनता और राजतंत्र के बीच गठजोड़ के बारे में तोसेनेल द्वारा प्रस्तावित योजना की याद दिलाना चाहूँगा


105. मेरा यह लेख देखें जिसमें वैज्ञानिक समाजवाद की संभावना पर बर्नस्टाइन की रिपोर्ट के ख़िलाफ़ आपत्ति की गई थी एंगेल्स की पुस्तिका समाजवाद काल्पनिक और वैज्ञानिक के तीसरे रूसी संस्करण में एंगेल्स की अपनी भूमिका के साथ एक भूमिका प्लेखानोव की भी थी। यह संस्करण


74 / काल्पनिक समाजवाद की धाराए


जेनेवा से 1902 में प्रकाशित हुआ था। यह मूलतः एडुआर्ड बर्नस्टाइन के लेख 'क्या वैज्ञानिक समाजवाद संभव है?" का जवाब था-संपादक )


106. Le socialisme devant le vieux monde, पृ. 29 ।


107. मिसाल के लिए, हमें पता है कि रियेवादी पत्रिका Ln Phalange को समाज-विज्ञान का मुखपत्र कहा जाता था। (यह पत्रिका 1832 से 1849 तक प्रकाशित होती रही और रिवेवादियों का मुखपत्र थी। पूरा शीर्षक Lo Phalarge Revue de la science sociale, politique, industrie sciences, arts and litterature था-संपादक) 


108. उन्होंने युपूई द्वारा 1798 में प्रकाशित एक पुस्तक Abrege de 1' origine de tous les cultes का जोरदार अनुमोदन किया जिसमें धर्म के बारे में ऐसा ही दृष्टिकोण व्यक्त किया गया था। 


109. इसका पहला संस्करण 1846 में प्रकाशित हुआ और कहते हैं कि मज़दूरों के बीच इसे भारी सफलता मिली।


110. जन्म 19 जून 1782 के रोज़: 28 फ़रवरी 1854 को देहावसान (यहाँ प्लेखानोद गलती पर हैं,


वे जिस लेखक की बात कर रहे हैं उसका नाम फेलिसिते-रोवेयर लामेनाइ था-संपादक)।


111. जन्म 1796 और देहावसान 1865 में ।


112. उनके मुक़ाबले सचेत पूँजीवादी विचारकों, जैसे गीज़ो, थियेरी, मिग्ने और बहुत से दूसरे लोगों ने, जो निश्चित ही 1793 के राजनयिकों की जरा भी सराहना नहीं करते थे, तब तक वर्ग संघर्ष के पक्के और सचेत पैरोकार रहे जब तक वर्ग-संघर्ष कुलीनों के खिलाफ़ पूँजीपति वर्ग का संघर्ष रहा। उन्होंने सामाजिक शांति का उपदेश 1848 के बाद ही देना शुरू किया जब सर्वहारा की कार्रवाई शुरू हुई। मैंने अन्यत्र इसकी विस्तृत विवेचना की है। मैंने कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र का जो अनुवाद किया था उसके दूसरे संस्करण में मेरी भूमिका देखें। 


113. जन्म 1805 में, देहावसान 1880 में।


114. दुनिया की पहली मज़दूरवर्गीय क्रांति (18 मार्च 28 मई 1871) में, जिसे पेरिस कम्यून के नाम से जाना जाता है, फ्रांसीसी क्रांतिकारी ब्लांकी की भी एक भूमिका रही। ब्लांकी अपने समाचार पत्र के पहले पृष्ठ पर शीर्षक से ठीक नीचे यहाँ दिए गए नारे का उपयोग करते थे संपादक। 


115. वैव्यूफ का जन्म 1764 में हुआ। उन्हें मृत्युदंड दिया गया और 24 फ़रवरी 1797 को फाँसी पाकर उनकी मृत्यु हुई मृत्युदंड दिए जाने से कुछ ही घंटों पहले उन्होंने आत्महत्या की एक असफल कोशिश की थी (अगले लेख में वैब्यूफ के बारे में कुछ जानकारी और मिलेगी-संपादक ) 


116. बराबरवालों का षड्यंत्र 1795-96 के दौरान फ्रांस का एक काल्पनिक साम्यवादी आंदोलन था। इसका संचालन 'बराबरवालों के एक गुप्त दल ने किया जिसके मार्गदर्शक बैव्यूफ थे। क्रांति की तैयारी करना, क्रांति संपन्न करना तथा समाज के साम्यवादी पुनर्गठन के जरिये व्यक्तियों के बीच पूर्ण समानता स्थापित करना इस दल का उद्देश्य था। इस दल के साम्यवाद की कुछ मोटा-मोटी समतावादी विशेषताएँ थीं। जल्द ही इस दल का भेद खुल गया और आगस्तिन डार्थ (1769-1797) को मृत्युदंड दिया गया जबकि बाकी सदस्यों को देशनिकाला दे दिया गया-संपादक 

117.  ब्यूनारोती की यह पुस्तक 1898 में प्रकाशित हुई थी। इसका शीर्षक Conspiration Pour l'egalite dite de Babeuf … था। 


118. ब्लांकी राजनीतिक साम्यवाद की इस प्रवृत्ति के प्रतिनिधि थे जिसे कोसिदेरी सबसे घातक मानते थे।


119.  मैं ज़ोर देकर कहूँगा कि 18वीं सदी के अंत के क्रांतिकारी तूफान ने ही वर्ग संघर्ष के प्रति एक नकारात्मक रुख को जन्म दिया। कभी-कभार क्रांतिकारी कार्यकलाप के प्रति एक रुझान इस से नहीं था। आगे चलकर जी दो व्यक्ति से साइमनवाद के सर्वोच्च 'फ़ादर' बने उनमें


काल्पनिक समाजवाद की धाराएँ / 75


एक, अर्थात् बाज़ेयर, कभी कार्बोनेरी में शामिल थे। दूसरे बहुत से भावी समाजवादी भी कार्बोनेरी में शामिल थे। लेकिन कार्बोने की आकांक्षाएं शुद्ध 'राजनीतिक थी। मतलब यह कि उनका संपत्ति के संबंधों से कोई सरोकार नहीं रहा और इसलिए उनसे इस बात का कोई खतरा नहीं था कि वे 'अमीरों के गरीबों की लड़ाई का आह्वान करेंगे। समाजवाद मे संपत्ति के संबंधों से अवश्य सरोकार रखा और फलस्वरूप लोगों को उस लड़ाई की याद दिलाता रहा। यही कारण है कि बाजेयर, ब्यूशेतज  और दूसरे भूतपूर्व षड्यंत्रकारियों ने जैसे ही वे समाजवादी बने, तुरत-फुरत खुद को सामाजिक शांति के समर्थक घोषित किया। एक बार फिर कह दिया जाए: जो भी व्यक्ति फ्रांसीसी बुद्धिजीवियों के मन पर '1793 के महासंकट' के प्रभाव को भूल जाता है, फ्रांस में काल्पनिक समाजवाद के इतिहास को नहीं समझ सकेगा।




76 / काल्पनिक समाजवाद की धाराएँ


To be continued






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