Monday, 14 September 2020

जीने के बारे में (नाज़ि‍म हिकमत)



फ़र्ज़ करो कि हम बीमार हैं, हमें सर्जरी की ज़रूरत है—
मतलब हो सकता है कि हम 
उस सफ़ेद टेबल से कभी उठ ही न पाएँ।
हालाँकि यह मुमकिन नहीं कि हमें
वक्‍़त से पहले ही गुज़र जाने का ग़म न हो, 
फिर भी हम मज़ेदार लतीफ़े सुनकर हँसेंगे,
हम खिड़की से झाँकेंगे 
यह देखने के लिए कि बारिश हो रही है या नहीं,
या बेसब्री से 
ताज़ी ख़बरों का इन्तज़ार करेंगे….

फ़र्ज़ करो कि हम किसी ऐसी लड़ाई के मोर्चे पर हैं—
जिसे लड़ा जाना ज़रूरी है। 
मुमकिन है कि हम पहले ही हमले में
धराशायी होकर मौत के मुँह में समा जाएँ।
यह जानकर हमें अजीब ग़ुस्सा आएगा,
लेकिन फिर भी हमें फ़ि‍क्र होगी 
जंग के नतीजों की, जो सालों चल सकती है।

फ़र्ज़ करो हम क़ैदख़ाने में हैं
और हमारी उम्र पचास के क़रीब है,
और लोहे के दरवाज़े के खुलने में
अभी अठारह साल और बाक़ी हैं।
फिर भी हम जियेंगे बाहरी दुनिया के साथ,
उसके लोगों और जानवरों, जद्दोजहद और हवा के साथ—
यानी दीवारों के पार बाहर की दुनिया के साथ,
मतलब, हम जैसे भी हों और जहाँ भी हों,
हमें जीना इस तरह चाहिए मानो हम कभी मरेंगे ही नहीं।

पेंटिंग: Phoenix the Bird of Life by Igor Paley

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