आज ही के दिन, 11 अगस्त 1908 में खुदी राम बोस की फाँसी हुई । 17 साल के इस नौजवान के सर्वोच्च बलिदान ने पुरे अविभाजित बंगाल को इतना झकझोर दिया था कि बंगाल के गाँव , कस्बे और शहर के मुहल्लों में सन्यासी , वैरागीऔर फकीर हाथ में एक तारा लिये खुदीराम की शहादत का एक बहुत मार्मिक गीत गाते थे घर घर ,
" एक बार बिदाई दे माँ , घूरे आसी ,
हाँसी हांसी पड्बो फाँसी , देखबे भारत वासी '
( खुदी राम अपनी माँ से आज्ञा ले रहे है कि एक बार मृत्यु से आलिंगन करने मुझे जाने दे । वो कहते है कि सारा देश देखेगा कि जब खुदी राम फाँसी के तख्ते पर था तो हँस रहा था ।
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