Saturday, 29 August 2020

एकता की चीख-पुकार की आड़ में एकता का विध्वंस



यह एक ऐसी हक़ीक़त है जिसकी हर आदमी आसानी से जांच कर सकता है।
और यह एक ऐसी हक़ीक़त है जिससे यह साबित हो जाता है कि हमने त्रोत्स्की को उचित ही "गुटबंदी के निकृष्टतम अवशेषों" का प्रतिनिधि कहा था।

यद्यपि त्रोत्स्की गुटों से दूर रहने का दावा करते हैं, जो भी रूस के मजदूर आन्दोलन की ज़रा सी भी जानकारी रखता है उसे मालूम है कि त्रोत्स्की "त्रोत्स्की गुट" के प्रतिनिधि हैं। इस स्थल पर हम फिर गुटबंदी पाते हैं, क्योंकि यहां हम उसके दो मूल लक्षणों को देखते हैं : (१) एकता की नाममात्र के लिए मान्यता और (२) वास्तव में पृथक् गुट का अस्तित्व। यह गुटबंदी का अवशिष्ट भाग है, क्योंकि उसका रूस के मजदूर वर्ग के जन-आन्दोलन से कोई वास्तविक लगाव नहीं दिखाई देता।

और अंत में, वह गुटबंदी का निकृष्टतम रूप है, क्योंकि विचारधारा तथा राजनीति की दृष्टि से उसका कोई निश्चित और स्पष्ट चरित्र नहीं है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि निश्चितता तथा स्पष्टता 'प्राव्दा'-पंथियों का चारित्रिक लक्षण है ( हमारे बड़े पक्के विरोधी लेo मार्तोव तक यह मानते हैं कि हम सभी प्रश्नों पर औपचारिक रूप से किये गये सर्वविदित निर्णयों का "संहत तथा अनुशासनबद्ध रूप से" समर्थन करते हैं ) और विसर्जनवादियों का भी ऐसा लक्षण है ( उनका, बहरसूरत सर्वप्रमुख विसर्जनवादियों का एक सुनिश्चित, सुस्पष्ट चरित्र है, मार्क्सवादी नहीं, उदारवादी चरित्र )।

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि त्रोत्स्की गुट की तरह के कुछ गुट जो वास्तव में एकमात्र वियेना-पेरिस के दृष्टिकोण से स्थापित है, लेकिन रूसी दृष्टिकोण से हरगिज़ स्थापित नहीं है, एक हद तक स्पष्ट चरित्र रखते हैं। उदहारण के लिए, 'व्पेर्योद' के माखवादी गुट के माखवादी सिद्धांत निश्चित और स्पष्ट है; उसी प्रकार "पार्टी-पक्षीय मेन्शेविकों" द्वारा, विसर्जनवाद के सैधान्तिक खण्डन के अतिरिक्त, इन माखवादी सिधान्तों का प्रबल प्रत्याख्यान तथा मार्क्सवाद का समर्थन भी स्पष्ट और निश्चित है।

परन्तु त्रोत्स्की में सिद्धांत तथा राजनीति की दृष्टि से स्पष्टता तथा निश्चितता का अभाव है, क्योंकि, जैसा हम जल्द ही ज्यादा तफ़सील से देखेंगे, "गुटबंदी-विरोध" का उनका नुस्खा स्वछंद रूप से एक गुट से दुसरे गुट में विचरण करने का नुस्खा है।

संछेपतः
१) त्रोत्स्की विभिन्न मार्क्सवादी प्रवृत्तियों तथा गुटों के सैधान्तिक मतभेदों के ऐतिहासिक महत्त्व की व्याख्या नहीं करते, न ही वह उसे समझते हैं, हालांकि ये मतभेद सामजिक-जनवाद के बीस साल के इतिहास में बराबर रहे हैं और ( जैसा हम बाद में दिखायेंगे ) उनका सम्बन्ध वर्तमान समय के मौलिक प्रश्नों से है ;
२) त्रोत्स्की यह नहीं समझ पाते कि गुटबंदी का मुख्य विशिष्ट लक्षण है एकता की बराय नाम मान्यता और वास्तव में फूट ;
३) "गुटबंदी-विरोध" की आड़ में त्रोत्स्की विदेश के एक ऐसे गुट की हिमायत करते हैं, जो विशेषतः निश्चित प्रकार के सिद्धांतों से रहित है और जिसका रूस के मजदूर आन्दोलन के भीतर कोई आधार नहीं है।
हर चीज़ जो चमकती है सोना नहीं है। त्रोत्स्की के शब्दों में बहुत चमक-दमन है, लेकिन है वे निरर्थक ही।
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(त्रोत्सकी के बारे में लेनिन के विचार दर्शाते लेख का एक अंश)

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