Thursday, 6 August 2020

5 अगस्त. काॅ. शिवदास घोष स्मृति दिवस


5 अगस्त. काॅ. शिवदास  घोष (5 August 1923 – 5 August 1976) स्मृति दिवस के अवसर पर प्रस्तुत है उनका एक महत्वपूर्ण भाषण जो उन्होंने  8 नवम्बर 1974 को नवम्बर क्रान्ति की 57वीं वर्षगाँठ पर उनकी पार्टी की प. बंगाल राज्य कमेटी द्वारा आयोजित जनसभा में दिया था।

सर्वहारा दृष्टिकोण वर्ष-29 अंक-20 22 अक्तूबर से 5 नवम्बर, 2014

महान नवम्बर क्रान्ति जिन्दाबाद

(हम सर्वहारा के महान नेता और इस युग के अन्यतम माक्र्सवादी दार्शनिक काॅ. शिवदास घोष के एक अत्यन्त महत्वपूर्ण भाषण का हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत कर रहे हैं। यह भाषण उन्होंने 8 नवम्बर 1974 को नवम्बर क्रान्ति की 57वीं वर्षगाँठ पर हमारी पार्टी की प. बंगाल राज्य कमेटी द्वारा आयोजित जनसभा में दिया था। अनुवाद पार्टी के अंग्रेजी मुखपत्र 'प्रोलेटेरियन ऐरा' के 1 नवम्बर 1977 के विशेषांक से किया गया है। काफी सावधानी बरतने के बावजूद भी यदि अनुवाद में अभिव्यक्ति के कुछ खामियाँ रह जाएं तो उनके लिए सम्पादक ही पूरी तरह जिम्मेदार हैं।)
 
काॅमरेड्स, आप सभी जानते हैं कि हमारी पार्टी एस. यू.सी.आई. की पं. बंगाल राज्य कमेटी ने रूस की महान नवम्बर क्रान्ति की 57वीं वर्षगाँठ पर यह सभा आयोजित की है। आप लोगों ने सुना होगा और शायद जानते भी होंगे कि इस दिन 57 वर्ष पहले सन् 1917 में विश्व के इस एकमात्र देश में पहली समाजवादी क्रान्ति कामयाब हुई थी। बोल्शेविक पार्टी और उसके नेता काॅ. लेनिन के नेतृत्व में मजदूर किसान, सर्वहारा, वहाँ के बुर्जुआ वर्ग और उसके दल को सत्ता से उखाड़ फेंककर राजसत्ता पर कब्जा करने में सक्षम हुए थे। रूस की यह क्रान्ति जो बुर्जुआ वर्ग को राजसत्ता से उखाड़ फेंकते हुए 1917 में सम्पन्न हुई कई पहलुओं से तात्पर्यपूर्ण है।
वास्तव में इस क्रान्ति के पहले दुनिया के आम लोग यह कल्पना भी नहीं कर सकते थे कि भोले भाले मजदूर-किसान और निरक्षर मेहनतकश कभी शासक बुर्जुआ वर्ग या जारशाही जैसे अति निरंकुश राजतंत्रा को सत्ता से उखाड़ भी पाएंगे। जार या जारशाही को सत्ता से उखाड़ फेंकने की 1917 की फरवरी क्रान्ति असल में रूस की बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति की सफलता को चिन्हित करती है। यद्यपि फरवरी क्रान्ति के जरिए जारशाही को उखाड़ फेंका गया, फिर भी राजसत्ता बुर्जुआ वर्ग के हाथों में चली गई जो जारशाही के खिलाफ संयुक्त मोर्चे में भागीदार था। निस्संदेह, फरवरी क्रान्ति के माध्यम से रूस में बुर्जुआ केरेंस्की सरकार की स्थापना हुई लेकिन मजदूर-किसानों की सोवियतें भी लगभग दोहरी सत्ता के रूप में उसके साथ-साथ विद्यमान थीं। रूस की फरवरी क्रान्ति न केवल सामंतवाद-साम्राज्यवाद को समाप्त करने में असफल रही बल्कि इसके विपरीत, वहाँ के शासक बुर्जुआ वर्ग ने प्रशासनिक ढाँचे में मौजूद सामन्तवादी और साम्राज्यवादी विरासत को बरकरार रखने और उसके साथ नजदीकी समझदारी कायम करने में गजब की दिलचस्पी दिखाई। फलस्वरूप, हालांकि फरवरी क्रान्ति के जरिए जारशाही को उखाड़ फेंककर बुर्जुआ वर्ग ने सत्ता दखल की, फिर भी, सामाजिक क्रान्ति के इस दौर का आर्थिक पहलू से विश्लेषण किया जाए तो हम पाएंगे कि बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति के सामंतवाद-विरोधी व साम्राज्यवाद-विरोधी कार्यक्रम अधूरे ही रह गए।
इसने रूस के क्रान्तिकारी आन्दोलन से जुड़े हुए मार्क्सवादियों, यानी समाजवादी क्रान्तिकारियों, मेंशेविकों यहाँ तक कि कुछ बोल्शेविकों के बीच भी एक भ्रांत धारणा को जन्म दिया जिसके कारण इन लोगों ने  मार्क्सवाद को वस्तुतः आर्थिक निश्चयतावाद (इकोनोमिक डिटरमिनिश्म) में परिणत कर दिया। मार्क्सवादी सिद्धान्न्त की समझ के मुताबिक यानी मार्क्सवाद को कुछ हद तक जड़सूत्र (डोग्मा) की तरह अपनाए जाने के कारण, जिसका मार्क्सवादी विज्ञान की सही द्वन्द्वात्मक वस्तुवादी समझ से दूर का भी वास्ता नहीं है, उन्होंने कहना शुरू किया, चूँकि समाज की प्रगति और विकास की प्रक्रिया में सामाजिक क्रान्ति के चरणों को लांघा नहीं जा सकता, इसलिए बर्जुआ जनवादी क्रान्ति के सभी कार्यों को पूरा किए बिना, समाजवादी क्रान्ति के स्तर पर पहुँचना असंभव है। उनका  कहना था कि ऐसी अवस्था में, बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति के सामन्तवाद-विरोधी और साम्राज्यवाद-विरोधी कार्यक्रमों को पूरा करने के उद्देश्य से मजदूर-किसानों की सोवियतों को एक ओर केरेंस्की सरकार के साथ सहयोग करना चाहिए तथा दूसरी ओर इन कार्यक्रमों को लागू करवाने के लिए जन आन्दोलनों को संगठित करने के माध्यम से केरेंस्की सरकार पर दबाव डालते रहना चाहिए। अतः संसदीय राजनीति के रास्ते ही मजदूर-किसान और सर्वहारा को चलना होगा और इस प्रक्रिया को पहले बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति को पूरा करना होगा। जब तक बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति के ये काम पूरे नहीं कर लिए जाते, समाजवादी क्रान्ति के लिए संघर्ष करना व्यर्थ है। फरवरी क्रान्ति के बाद रूस में यह धारणा अत्यन्त प्रबल थी।
मार्क्सवाद आर्थिक निश्चयतावाद नहीं है लेकिन उस समय बोल्शेविक पार्टी का नेतृत्व सच्चे मार्क्सवादियों के हाथों में था। और लेनिन जैसे प्रतिभावान नेता उस नेतृत्व की बागडोर थामे हुए थे। वे उस किस्म के मार्क्सवादी नहीं थे जो अपने दावों को उचित ठहराने या विरोधियों को उल्लू साबित करने के लिए सुविधानुसार यहाँ वहाँ से संदर्भहीन कुछ पंक्तियाँ या उद्धरण पेश करने में विश्वास रखते हों। वे इस बात को बखूबी समझते थे कि मार्क्सवाद के पुरातन ग्रंथों में जो लिखा है वही मार्क्सवाद नहीं है। बल्कि मार्क्स, एंगेल्स या अन्य मार्क्सवादी तत्कालीन परिस्थितियों में जिस विज्ञान यानी जिस मार्क्सवादी द्वंद्वात्मक पद्धति एवं दार्शनिक दृष्किोण को हथियार बनाकर उन सब निष्कर्षों पर पहुँचे थे, उस विज्ञान को आत्मसात करते हुए मौजूदा वस्तुपरक परिस्थितियों में इस्तेमाल कर पाने का मायने ही है मार्क्सवाद के मर्म को समझना।  उद्धरण रटना, समान घटनाओं का बखान करना या समान ऐतिहासिक वृतांतों की दलील देना, इस सबका मार्क्सवाद से यानी मार्क्सवाद-सम्मत द्वंद्वात्मक विचार विश्लेषण पद्धति से कोई लेना देना नहीं है। यह सब मार्क्सवाद के नाम एवं मार्क्सवाद को विकृत करना है। लेनिन इसे बखूबी समझते थे। इसलिए उन्होंने अत्यंत साहस के साथ अपनी विख्यात रचना 'अप्रैल थीसिस' के माध्यम से मार्क्सवादियों के एक तबके में माक्र्सवाद के बारे में प्रचलित गलत धारणाओं के खिलाफ तीखा प्रहार किया। दुनियाभर के तमाम कम्युनिस्टों को उन्होंने साफ-साफ दिखाया कि मार्क्सवाद आर्थिक निश्चयतावाद नहीं है। इस पर लेनिन की एक अमूल्य सीख स्थापित हुई कि अर्थव्यवस्था और राजनीति के बीच हमेशा राजनीति को प्राथमिकता देनी होगी (पाॅलिटिक्स आलवेश सुपरसीड्स इकोनोमी) पूँजीवाद के असमान विकास की वजह से, क्रान्तिकारी आन्दोलनों के उतार-चढ़ाव, टेढ़े-मेढे़ रास्ते से आगे बढ़ना, कभी आगे बढ़ना, कभी पीछे हटना - इन तमाम उहापोहों और खींचतान के बीच राजनीति और राजनीतिक घटनाएं, आर्थिक घटनाओं को इस कदर प्रभावित कर रही हैं कि वे ही वास्तव में निर्णायक भूमिका निभा रही हैं। राजनीति और अर्थव्यवस्था के बीच परस्पर संबंध को इस ढंग से समझने के बजाए अगर कोई यूं समझे कि आर्थिक परिस्थिति बदलते ही राजनैतिक स्थिति भी बदल जाती है यानी राजनीतिक स्थिति में परिवर्तन आर्थिक परिवर्तन का प्रतिबिम्ब मात्र है, तो उसके लिए यह मार्क्सवाद को समझने से इन्कार करना होगा और मार्क्सवाद के अलावा कुछ और समझ लेना होगा।
राज्य सत्ता का वर्ग चरित्र निर्धरित करना ही क्रान्ति की राणनीति तय करने में बुनियादी सवाल है इस विश्लेषण के आधार पर लेनिन ने दर्शाया कि निकोलाई जार के सत्ताच्युत होने के साथ रूस में बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति सम्पन्न हुई। राजनैतिक तौर पर फरवरी  क्रान्ति के बाद निकोलाई जार के स्थान पर यानी पुराने वर्ग के स्थान पर नए रूसी बुर्जुआ वर्ग ने राजसत्ता दखल कर ली थी। हालांकि लेनिन जानते थे कि आर्थिक पहलू से रूस में तब तक बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति के अनेक कार्य अधूरे पड़े थे। पूँजीवाद के अनुप्रवेश के बावजूद ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सामंतवाद अभी तक एक प्रबल शक्ति के रूप में मौजूद था। आर्थिक तौर पर साम्राज्यवाद और धनी पूँजीवादी देशों के वित्तीय गुटतंत्र (फाइनैन्शियल आॅलिगार्की) के प्रति दासता अभी भी काफी मात्रा में  मौजूद थी। लेकिन यह जानते हुए भी लेनिन ने कहा था, 'चूँकि राजनैतिक तौर पर क्रान्ति का मूल प्रश्न राजसत्ता हथियाने के सवाल से जुड़ा हुआ है, अतः निकोलाई जार को सत्ताच्युत कर राजसत्ता जिस क्षण रूसी बुर्जुआ वर्ग के हाथों चली गई यानी एक पुराने वर्ग के स्थान पर नए वर्ग ने सत्ता दखल कर ली-उस हद तक और उस मायने में बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति सम्पन्न हो चुकी थी और रूस समाजवादी क्रान्ति के चरण में प्रवेश कर चुका था। अतः उन परिस्थितियों में बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति की रणनीति और रणकौशल की पुरानी अवधारणा के साथ चलने का मतलब होता बुर्जुआ वर्ग की दासता स्वीकारना, मजदूर-किसानों की शहादत को बुर्जुआ वर्ग के कदमों में डाल देना और क्रान्ति के प्रति भारी गद्दारी करना। इसलिए उन्होंने बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति के पुराने नारे के स्थान पर समाजवादी क्रान्ति का नया नारा दिया और वर्ग-विन्यास (क्लास-अलायंस एण्ड क्लास अलाईंमेण्ट आफ फोर्सेस) के क्षेत्र में नई अवधारणा प्रस्तुत की। 'अप्रैल थीसिस' में प्रस्तुत इस महत्वपूर्ण विश्लेषण से मार्क्सवादी आन्दोलन अभी तक अपरिचित था। इसलिए उस समय मार्क्सवादियो के बीच यह मुद्दा पर्याप्त विवाद की वस्तु बन गया।
बहरहाल इसके सारतत्व को साफ-साफ समझना होगा। हमारे देश में जो लोग अर्थ व्यवस्था में थोड़ा सा भी सामंतवाद ढँूढ़ पाने से क्रान्ति के स्तर को बुर्जुआ जनवादी या राष्ंीय जनवादी ठहराने लगते हैं और कहते हैं कि बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति के कामकाज पूरे किए बगैर, छलांग लगाकर, हम कैसे समाजवादी क्रान्ति के चरण में प्रवेश कर सकते हैं-नवम्बर क्रान्ति उन लोगों के लिए एक कीमती सबक छोड़ गई है। नवम्बर क्रान्ति के सबक को समझे बगैर जो लोग हमारे देश में आज भी द्वितीय इण्टरनेशनल के नेताओं की तर्ज पर या नवम्बर क्रान्ति के समय के मेंशेविकों, समाजवादी क्रान्तिकारियों और बोल्शेविकों के एक विभ्रांत तबके की तरह सोच-विचार रहे हैं (और बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति का राग अलापे जा रहे हैं-सं.), वे वास्तव में आर्थिक निश्चयतावाद का ही अभ्यास कर रहे हैं जो राजनीति व अर्थव्यवस्था के बीच द्वंद्वात्मक रिश्ते को ही नकारता है, जिसका मार्क्सवाद लेनिनवाद और द्वंद्वात्मक वस्तुवाद से दूर का भी नाता नहीं है।
मैं पहले ही कह चुका हूँ कि रूसी क्रान्ति ऐसी परिस्थिति में हुई थी जब सामंतवाद ग्रामीण अर्थव्यवस्था  पर छाया हुआ था, साम्राज्यवाद का प्रभाव मजबूती से बरकरार था और पूँजीवादी अर्थव्यवस्था साम्राज्यवाद की गिरफ्त से मुक्त नहीं हुई थी। इस सबके बावजूद लेनिन ने दिखाया कि बुर्जुआ केरेंस्की सरकार द्वारा सत्ता दखल कर देने के बाद, चूँकि मजदूर वर्ग को गरीब किसानों के साथ मिलकर बुर्जुआ वर्ग को सत्ता से उखाड़ कर सत्ता पर कब्जा करना था और चूँकि क्रान्ति का उद्देश्य सर्वहारा अधिनायकत्व कायम करना था, उस हद तक और उस मायने में रूस की क्रान्ति राजनैतिक तौर पर समाजवादी क्रान्ति थी। लेकिन चूँकि आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों में बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति के सामंतवाद-विरोधी और साम्राज्यवाद-विरोधी कार्यक्रम अपूर्ण पड़े हुए थे, उन्हें समाजवादी क्रान्ति की मूल राजनैतिक रणनीति के तहत व्युत्पादित कार्यों (डेरिवेटिव्स) के बतौर सम्मिलित करना जरूरी था।
बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति के अधूरे कार्यों को सत्ता पर कब्जा कर लेने के बाद सर्वहारा वर्ग के नेतृत्व के तहत पूरा करना होगा। अन्यथा किसानों को जमीन नहीं मिलेगी, कुलकों के प्रभुत्व का अंत नहीं होगा, न ही सामंतवाद को जड़ से नेस्तनाबूद किया जा सकेगा, न ही अर्थव्यवस्था के स्वतंत्र विकास की आधारशिला रखी जा सकेगी, न देश में अमन-चैन कायम किया जा सकेगा, न ही खाद्य-समस्या को हल कर पाना मुमकिन होगा। क्योंकि साम्राज्यवाद एवं सर्वहारा क्रान्ति के मौजूदा युग में यानी जब पूँजीवाद बुरी तरह प्रतिक्रियावादी हो चुका है, बुर्जुआ  वर्ग द्वारा, पिछले युग के बुर्जुआ वर्ग की तरह बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति के तमाम कामों को निबटाना संभव नहीं रह गया है। इसलिए, अगर किसान समुदाय को सामंती शोषण से पूरी तरह मुक्त करने का भी सवाल हो, तब भी सर्वहारा वर्ग का सत्ता पर कब्जा करना निहायत जरूरी होगा और समाजवादी क्रान्ति अपरिहार्य होगी। इसलिए हालांकि नवम्बर क्रान्ति या समाजवादी क्रान्ति का मूल रणनीतिक नारा और वर्ग विन्यास का आधार गरीब किसानों के साथ क्रान्तिकारी एकजुटता स्थापित करने का था, तो भी 1917 से 1919 तक सत्ता पर कब्जा जमाने के समय से रूस के क्रान्तिकारी सर्वहारा ने बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति के बचे हुए कामों को पूरा करने के उद्देश्य से केवल मध्यम दर्जे के किसानों के साथ ही नहीं बल्कि समूचे कृषक वर्ग के साथ एका कायम करने की चेष्टा की।
समाजवादी क्रान्ति का मूल नारा भले ही गरीब किसान वर्ग के साथ वर्ग-मैत्राी कायम करने का रहा हो, लेकिन चूँकि बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति के अपूर्ण कार्य व्युत्पादित कार्योंं की तरह अभी भी करने बाकी थे जिन्हें सत्ता दखल करने के बाद सर्वहारा वर्ग को पूरा करना था, मसलन सामन्तवाद का सम्पूर्ण खात्मा, जमीन का पुनर्वितरण, गरीब व मध्यम दर्जे के किसानों की चरम बदहाली को दूर करना और कदम-ब-कदम समाजवादी पुनर्निर्माण की ओर अग्रसर होना, उन्हंे नवम्बर क्रान्ति के उपरान्त भी काफी समय तक के लिए समूचे कृषक वर्ग के साथ एकजुटता कायम करने का नारा देना जरूरी हो गया था।
मजदूर वर्ग के नेतृत्व के अभाव में मौजूदा युग में बुर्जुआ जनवादी क्रान्तियाँ भी अपने तर्कसंगत लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकतीं नवम्बर क्रान्ति की यह ठोस सीख हमारे लिए अपार महत्व रखती है। इसके बाद से दुनियाभर के राष्ंीय मुक्ति संघर्षों पर मजदूर वर्ग का प्रभुत्व कायम करने का प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो उठा। प्लेखानोव के खिलाफ संघर्ष करते हुए, लेनिन ने इस सोच को सैद्धान्तिक  आधार दिया। प्लेखानोव का सोचना था, चूँकि बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति मूलतः बुर्जुआ क्रान्ति है, इसका नेतृत्व बुर्जुआ वर्ग के पास ही रहना चाहिए और जबकि अब विश्व सर्वहारा क्रान्ति को केन्द्र कर सर्वहारा वर्ग का उदय भी हो चुका है, तब मजदूर वर्ग को भी इस नेतृत्व में हिस्सा बंटाना होगा। यानी प्लेखानोव संयुक्त नेतृत्व का नारा बुलन्द करते हैं। लेनिन ने प्लेखानोव के इस विचार का खण्डन करते हुए कहा, हरगिज नहीं, या तो इन क्रान्तियों पर सर्वहारा वर्ग का प्रभुत्व कायम होगा या फिर बुर्जुआ वर्ग का। अगर बुर्जुआ वर्ग का प्रभुत्व कायम हुआ तो इसका मायने होगा क्रान्ति के प्रति गद्दारी और वह क्रांति  अध्कचरी ही समाप्त हो जाएगी। इसके विपरीत मजदूर वर्ग का प्रभुत्व कायम होने पर ये क्रान्तियाँ सफल गंतव्य की ओर ले जायी जा सकेंगी। सिद्धान्त के द्वारा लेनिन ने प्रतिपादित किया कि (1) साम्राज्यवाद और सर्वहारा क्रान्ति के वर्तमान युग में, विभिन्न मुल्कों की बुर्जुआ जनवादी क्रान्तियाँ भी दरअसल विश्व समाजवादी या सर्वहारा क्रान्ति का ही अंग बन गई हैं। (2) मरणासन्न पूँजीवाद के इस युग में जबकि विश्व पूँजीवाद साम्राज्यवाद के चरण में प्रवेश कर चुका है और घोर प्रतिक्रियावादी बन चुका है, विश्व के तमाम देशों में, उन औपनिवेशिक देशों में भी जहाँ राष्ंीय आजादी आन्दोलनों का दौर जारी है, बुर्जुआ वर्ग अपनी क्रान्तिकारिता गंवा चुका है, जो उसे 18वी, 19वीं सदी में हासिल थी। क्योंकि इन तमाम देशों के बुर्जुआ वर्ग आज विश्व प्रतिक्रियावादी बुर्जुआ वर्ग का अभिन्न अंग हो चुका है।
इसलिए हालांकि साम्राज्यवाद-विरोधी स्वाधीनता संग्रामों में कई मुल्कों में ये राष्ंीय बुर्जुआ सक्रिय रहेंगे, वे क्रान्ति के भय से साम्राज्यवाद और सामन्तवाद से सांठगांठ भी करते रहेंगे। नतीजतन, इनके जिम्मे स्वतंत्राता संग्रामों का नेतृत्व रहने से ये संग्राम या राष्ंीय जनवादी आन्दोलन कभी भी अपने निर्धारित लक्ष्य पर नहीं पहुँच पाएंगें। राष्ंीय आजादी आन्दोलनों में बुर्जुआ वर्ग में यह जो ढुलमुलपन है यानी कभी साम्राज्यवाद के साथ सांठगांठ करना, कभी उससे लड़ना, कभी सामंतवाद-विरोध्ी नारे लगाना, कभी उसके साथ समझौता करना, इधर लड़ाई के मैदान में उतरना, उधर लुकछिप कर समझौते के लिए बातचीत चलाए रखना, कभी जनता के प्रगतिशील नारों का समर्थन कर उसके साथ बने रहना तो कभी सीधे-सीधे उसकी मुखालफत करना - उसकी अंतर्राष्ंीय प्रतिक्रियावादी बुर्जुआ वर्ग के अंश के नाते यह जो अस्थिरता है, जो दोमुंही नीति है, जब तक इसे परास्त कर मजदूर वर्ग अपना नेतृत्व कायम नहीं कर लेता, ये राष्ंीय आजादी आन्दोलन अपने वांछित लक्ष्य पर कभी नहीं पहुँच सकते। मजदूर वर्ग का नेतृत्व कायम हुए बिना पिछड़े मुल्कों में, बुर्जुआ वर्ग के नेतृत्व में अगर स्वतंत्राता संग्राम सफल भी हो जाएं, तो भी बुर्जुआ जनवादी क्रान्तियाँ या ये स्वतंत्राता संग्राम अधकचरे और अधपके ही समाप्त हो जाएंगे। स्वतंत्राता तो आएगी मगर स्वतंत्राता का मूल लक्ष्य हासिल नहीं होगा। न तो साम्राज्यवादी पूँजी के चंगुल से देश को पूरी तरह छुटकारा मिल पाएगा और न ही सामंतवाद का सम्पूर्ण खात्मा कर कृषि अर्थव्यवस्था का क्रान्तिकारी परिवर्तन ही संभव हो सकेगा। इसीलिए बुर्जुआ जनवादी क्रान्तियों को सही अंजाम देने के लिए आज यह अपरिहार्य हो गया है कि उन्हें विश्व समाजवादी क्रान्ति का हिस्सा समझा जाए और मजदूर वर्ग के नेतृत्व में उन्हें निर्देशित व संचालित किया जाए। यह बात जो इतने दिनों तक महज सिद्धान्त  के तौर पर चर्चित थी, रूसी क्रान्ति या नवम्बर समाजवादी क्रान्ति के बाद से विभिन्न मुल्कों के क्रान्तिकारियों ने उसे समुचित मान्यता देना शुरू किया और उसके यथार्थ तात्पर्य को समझा। दुनिया भर के देशों में आजादी आन्दोलनों के अगुआ दस्तों और समाजवादी चेतना से लैस लोग तत्काल इस सच्चाई को समझने के लिए बेताब हो उठे। अब हम अपने देश की परिस्थितियों की तुलना तत्कालीन रूस के परिप्रेक्ष्य में करें। वहाँ बुर्जुआ वर्ग द्वारा सत्ता दखल करने के बाद अक्टूबर क्रान्ति के पहले तक या लेनिन द्वारा अप्रैल थीसिस पेश करते वक्त अर्थतंत्र में सामंतवाद का जो दबदबा था, यहाँ हमारे देश की अर्थव्यवस्था में सामंतवाद क्या उस पैमाने पर मौजूद है? आप स्वयं ही विचार कीजिए। मेरे विचार से, हमारे देश की कृषि अर्थव्यवस्था में जहाँ तक आर्थिक संबंध या उत्पादन संबंध से ताल्लुक है, सामंतवाद जैसा कुछ भी नहीं है। और सामंतवाद कहा जा सकने लायक अगर कुछ है भी तो वह है वर्तमान समाज के उपरी ढाँचे (सुपरस्टंक्चर) में मौजूद सामंती अवशेषों के साथ पुराने संस्कार, रीति रिवाज, रूचि, नीति-नैतिकता व मूल्यबोधों की मिलावट। आर्थिक आधार (बेस) बदलने के साथ-साथ उपरी ढाँचा भी बदल जाता है और इस वजह से पुराने समाज के उपरी ढाँचे के अवशेष नए समाज के उपरी ढाँचे पर थोड़े समय के लिए भी प्रभावशाली नहीं रहेंगे' -आधार व उपरी ढाँचे के बीच संबंध के बारे में जो इस ढंग से सोचते हैं वे कृपया गम्भीर सैद्धतिक चर्चा में शरीक न हों तो ही बेहतर है। वे सिद्धान्तों के सूक्ष्म निरीक्षण-परीक्षण में भाग न ही लें तो अच्छा है। मेरे विचार से वे इस तरह की गम्भीर सैद्धान्तिक चर्चाओं के काबिल नहीं हैं। वे इतना भी नहीं समझते कि आधार व उफपरी ढाँचे के बीच संबंध क्या है? यह कहना ठीक है कि आधार के उपर उपरी ढँाचा गठित होता है। लेकिन क्या इसका मायने यह है कि आधार बदलता है तो उपरी ढाँचा भी बदल जाता है। यानी आधार के प्रत्येक परिवर्तन के तदनुरूप तत्काल अपने आप पूरी तरह उपरी ढाँचा भी बदल जाता है? यह नया ढाँचा जिस आधार पर विकसित होता है, अपने में पुराने समाज के ढांचे के असर को काफी समय तक लिए रहता है जिसके पफलस्वरूप नए ढाँचे के भीतर ही गहरा अंतद्र्वन्द्व पैदा हो जाता है। आधार के बदलने के साथ ही पुराने समाज के ढाँचे की चीजें एकाएक गायब नहीं हो जाती।
इसके प्रतिकूल कोई भी चिन्तन अनैतिहासिक है और मैं नहीं समझता कि आधार व उपरी ढाँचे के बीच संबंध् में ऐसी विचित्र धारणा का मार्क्सवाद में कोई स्थान है। मैं मार्क्सवाद का पण्डित हूँ ऐसा दावा नहीं करता। देश में आज बहुत सारे मार्क्सवादी पण्डित हैं, मैं नहीं सोचता कि मैं उनसे ज्यादा मार्क्सवाद समझता हूँ लेकिन जितना भी मार्क्सवाद मुझे आता है, मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि जो वे कहते हैं, उसका आधार व उपरी ढाँचे के बीच संबंध की सही समझ से कोई वास्ता नहीं है।
हमारे देश में जनवादी क्रान्ति के हिमायती दरअसल आर्थिक निश्चयतावाद का अभ्यास कर रहे हैं मैं पहले ही कह चुका हूँ कि जो लोग सोचते हैं कि बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति के तमाम कार्यक्रम पूरे किए बिना हम लांघकर समाजवादी क्रान्ति की मंजिल में प्रवेश नहीं कर सकते वे दरअसल आर्थिक निश्चयतावाद का अभ्यास कर रहे हैं। इस संदर्भ में मैं एक और प्रश्न पर चर्चा करना चाहूँगा। तृतीय इण्टरनेशनल की द्वितीय कांग्रेस में बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति को राष्ंीय स्वाधीनता संगाम की संज्ञा दी गई थी। इन स्वाधीनता संग्रामों को बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति कह देने से कुछ लोग इसे लेनिनवाद से ही भटकाव मान बैठे हैं और चर्चा का विषय बनाए हुए हैं। सामाजिक क्रान्ति के इस दौर को बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति के तौर पर चिन्हित करने से ही एकदम लेनिनवाद से भटकना हो जाएगा, जो ऐसा सोचते हैं एवं मूल विषय छोड़कर ऐसे ही किसी नाजुक प्रसंग पर तर्क-वितर्क करने लग जाते हैं, उन्हें जानना चाहिए कि स्टालिन की कृति ''लेनिनवाद की समस्याएं'' एवं बाद में माओ त्से-तुंग के ढेर सारे लेखों में - अब के लिखे नहीं, उस समय के जब माओ त्से-तुंग को वे भी क्रान्तिकारी मानते थे - उनमें इस सामाजिक दौर को बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति का दौर कहकर बार-बार उल्लेख किया गया है। राष्ंीय स्वाधीनता संग्रामों को बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति की संज्ञा न देकर राष्ंीय स्वाधीनता संग्राम ही रहने देने का सुझाव तृतीय इण्टरनेशनल की द्वितीय कांग्रेस में दिया गया था। इस वजह से कि ये संग्राम कुछ पहलुओं में बुर्जुआ क्रान्ति से भिन्न थे। उस युग में बुर्जुआ वर्ग क्रान्तिकारी था, इस युग में नहीं रहा। अतः इसमें राष्ंीय स्वतंत्राता संग्रामों पर अगर बुर्जुआ वर्ग का नेतृत्व कायम हो गया तो क्रान्ति को भारी क्षति उठानी होगी।
लिहाजा राष्ंीय स्वाधीनता संग्रामों पर मजदूर वर्ग का नेतृत्व कायम करने की आवश्यकता पर विशेष   जोर दिया गया है। आज के युग की इन्हीं विशेषताओं को मद्देनजर रखते हुए ही तृतीय इण्टरनेशनल की द्वितीय कांग्रेस में इन राष्ंीय स्वाधीनता संग्रामों को बुर्जुआ वर्ग के प्रभाव से मुक्त करने की सिफारिश की गई थी। लेकिन क्रान्ति का स्तर निर्धारित करने से संबंधित किसी भी चर्चा में हर कोई बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति या समाजवादी क्रान्ति जैसी शब्दावली  का ही प्रयोग करता है। इससे रामायण या महाभारत कोई  अशुद्ध  नहीं हो जाती है। राष्ंीय स्वाधीनता संग्रामों को बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति कह देने से बुर्जुआ वर्ग पर कोई प्रगतिशीलता का ठप्पा नहीं लग जाता। कम से कम इस मान्यता के तहत तो उसे बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति नहीं ही कहते।
इस प्रसंग में आपको मैं चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के एक महत्वपूर्ण कथन की याद दिलाता हूँ। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी कह रही है, जब किसी प्रवृत्ति या भटकाव विशेष के खिलापफ संघर्ष छेड़ा जाता है तो कभी-कभी उस संघर्ष के भीतर ही कोई दूसरी प्रवृत्ति या भटकाव छुपा हो सकता है। मार्क्सवादी आन्दोलनों में यह लम्बे समय से होता आया है। तृतीय इण्टरनेशनल की द्वितीय कांग्रेस का उदाहरण ही ले लीजिए, एक उलझन को सुलझाने का कदम उठाया गया था लेकिन इसका हश्र देखिये!
यह सर्वविदित है कि सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक पहलुओं से सम्पूर्ण बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति, सामाजिक क्रान्ति का एक और सिर्फ एक ही चरण है। मान लीजिए यह बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति बुर्जुआ वर्ग के नेतृत्व में कुछ दूर तक चलती है। तत्पश्चात देखा जाता है कि वह आगे बढ़ ही नहीं रही, एक डग भी नहीं और बिना मजदूर वर्ग के नेतृत्व के बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति का शेष भाग पूरा कर पाना या उस दौर के क्रान्तिकारी कार्यक्रमों को भी सपफलतापूर्वक जारी रख पाना अब किसी भी तरह से मुमकिन नहीं लग रहा। तब यह स्पष् तौर पर समझ लेना चाहिए कि आपने नेतृत्व में बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति के शेष भाग को अंजाम देने के लिए मजदूर वर्ग जो रणनीति ;स्टैंटेजीद्ध और रणकौशल ;टैक्टिक्सद्ध अख्तियार करेगा वह निश्चित ही बुर्जुआ वर्ग द्वारा बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति के प्रारम्भिक काल में अपनाई गई रणनीति और रणकौशल से भिन्न होगी। लेकिन सामाजिक क्रान्ति के दौर के परिपे्रक्ष्य में यह सम्पूर्ण काल एक ही अखण्डित दौर हैμबुर्जुआ जनवादी क्रान्ति का दौर। लेकिन हम देखते हैं कि माक्र्सवादियों का एक तबका इस मामले में अजीब घालमेल कर रहा है। माक्र्सवादी द्वंद्वात्मक प1⁄4ति को पकड़ पाने में वे बुरी तरह से नाकाम रहे हैं। वे कहते हैं कि आखिर क्रान्ति के चरण को तो लांघा नहीं जा सकता और चूँकि उसे लांघा या पफांदा नहीं जा सकता तो वे एक और चरण बीच में ठूँस देते हैं। उनके मतानुसार क्रान्ति अब दो चरणों, बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति और समाजवादी क्रान्ति में पूरी नहीं होगी। इन दोनों के बीच क्रान्ति का एक और चरण भी है जिसे वे जनता की जनवादी क्रान्ति ;पीपल्स डैमोक्रेटिक रेवोल्यूशनद्ध के नाम से पुकारते हैं।
उनकी यह भ्रांत धारणा दरअसल दो कारणों से पैदा  हो रही है। पहला कारण है, राष्ंीय जनवादी क्रान्ति के अर्थ एवं राजनैतिक मर्म को ये समझ नहीं पाए। वे ठीक-ठीक पकड़ नहीं पाए कि किस संदर्भ में, किन परिस्थितियों में और किस मकसद से लेनिन ने इस भाषा का प्रयोग किया, क्यों उसकी जरूरत पड़ी, उसकी सीमाएँ क्या थीं? अगर कोई उसे ठीक तरह से न समझ पाए तो गड़बड़ी तो होगी ही। उनके साथ भी वहीं हुआ है। दूसरा कारण है, वे आर्थिक निश्चयतावाद के प्रभाव में हैं और मान रहे हैं कि बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति के कार्यक्रम पूरे हुए बिना, किसी भी तरह से समाजवादी क्रान्ति के चरण को हासिल नहीं किया जा सकता। वे सोचते हैं कि आजादी हासिल कर लेने के साथ बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति का एक दौर समाप्त हो गया जिसमें विदेशी साम्राज्यवाद या राजतंत्रा के पुराने वर्ग को उखाड़ पफेंककर एक नए स्वाधीन राष्ंीय राज्य की स्थापना की गई। उनके मतानुसार, बुर्जुआ वर्ग जिस मुल्क में जिस ढंग का हो पूरी तरह या आंशिक तौर पर क्रान्ति के खिलापफ चला गया। अतः एक वर्ग के तौर पर वह अब क्रान्ति की मित्रा शक्ति नहीं रहा और अगर कहीं रहा भी हो, तो बड़े ढुलमुल रूप में बिना इस बात की गारण्टी के कि वह क्रान्ति में हिस्सा लेगा। परन्तु आर्थिक पहलू से तो क्रान्ति का स्तर अभी भी बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति ही है क्योंकि उसके सामंतवाद-विरोधी व साम्राज्यवाद-विरोधी कार्य एवं औद्योगिक क्रान्ति के कार्य अभी पूरे होने बाकी हैं। उस ठोस परिस्थिति में क्रान्ति का स्तर क्या होगा? उन्होंने स्वयं इसका समाधान भी खोज लिया है। उनका कहना है कि यह बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति और समाजवादी क्रान्ति के मध्यस्थ है। यही वह उद्गम है जहाँ से उनकी जनता की जनवादी क्रान्ति की भ्रान्ति उपज रही है। यानी वे लेनिन की उक्ति ''अर्थव्यवस्था व राजनीति के बीच हमेशा राजनीति को प्राथमिकता देनी होगी'' में निहित असल अभिप्राय को पकड़ने में बिल्कुल नाकाम रहे। वे नहीं समझ पाए कि प्रत्येक क्रान्ति का बुनियादी सवाल राजसत्ता दखल करने का सवाल है। स्टालिन ने इसे और भी साफ करके रखा है- कौन सा वर्ग किन-किन वर्गों के साथ वर्ग मैत्राी कायम करते हुए किस वर्ग या किन वर्गों को राजसत्ता से उखाड़ पफेंकेगाμहर क्रान्ति के सामने यही बुनियादी सवाल होता है।
अन्यथा इतिहास के हर छात्र को यह कैसे मालूम कि जब लेनिन नवम्बर समाजवादी क्रान्ति के लिए अप्रैल थीसिस का प्रारूप तैयार कर रहे थे, रूस में सामन्तवाद- विरोधी, साम्राज्यवाद-विरोधी सारे कार्यक्रम पूरे नहीं हुए थे। अगर कोई इससे अनजान हो या उसकी जानकारी केवल कुछ बातों तक ही सीमित हो जिसका स्टालिन ने दूसरों की गलतफहमियों का उत्तर देने के लिए 'लेनिनवाद की समस्याएं' नामक पुस्तक में जिक्र किया है-  फिर भी अगर वे इन जवाबों में निहितार्थ को समझने में नाकाम रहे हों, यानी स्टालिन ने किन भ्रान्तियों के क्या खास जवाब दिए, भांन्ति कहाँ रही, क्यों हुई, किन ठोस ऐतिहासिक मुद्दों को केन्द्र कर उस तरह की गलतफहमी हुई, स्टालिन ने इन तमाम बातों का जवाब किस ढंग से दिया है-अगर वे उसे भली-भान्ति नहीं समझ पाएं तो ये कभी नहीं समझ पाएंगे कि क्योंकर नवम्बर क्रान्ति एक समाजवादी क्रान्ति थी हालांकि फरवरी क्रान्ति के बाद रूस में सामंतवाद-विरोधी, साम्राज्यवाद-विरोधी अनेक कार्यक्रम अपूर्ण ही रह गए थे। अब चूँकि नवम्बर समाजवादी क्रान्ति से पहले सामंतवाद-विरोधी व साम्राज्यवाद-विरोधी कार्य अधूरे पड़े हुए थे और चूँकि नवम्बर समाजवादी क्रान्ति ने इन सबको सम्पन्न करने का बीड़ा उठाया और कार्यक्रम घोषित किया तथा उस किस्म के नारे दिए तो कई लोग इसे भ्राान्तिवश यह समझ बैठे कि यह तो बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति के अपूर्ण कार्यों को पूरा करने की क्रान्ति है, स्टालिन का उन्हें जवाब था-नहीं, नवम्बर क्रान्ति निश्चित तौर पर एक समाजवादी क्रान्ति थी उस हद तक और जहाँ तक कि बुनियादी राजनैतिक प्रश्न से ताल्लुक है, यानी यह बुर्जुआ वर्ग को सत्ताच्युत करने और सर्वहारा वर्ग द्वारा राजसत्ता पर कब्जा जमाने की क्रान्ति थी। इसमें आर्थिक क्षेत्रा के बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति के सामंतवाद-विरोधी, साम्राज्यवाद-विरोधी अपूर्ण कार्यों को व्युत्पादित या उपजात कार्यों ;डैरिवेटिव टास्क्स एण्ड बाय प्रोडक्टद्ध के बतौर सर्वहारा वर्ग के सत्तासीन होने के बाद, समाजवादी क्रान्ति के मूल कार्यक्रम के अंतर्गत सम्मिलित करना था। इन कार्यों के पूरे होने तक बोल्शेविक पार्टी को बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति की ये मांगंे उठानी पड़ीं और समूचे वृफषक वर्ग का समर्थन जुटाना पड़ा न केवल नवम्बर क्रान्ति की पूर्व अवधि में और उसके चलने के दौरान या उसके उपरान्त बल्कि 1919 में संविधान सभा के भंग हो जाने के बाद भी।
हमारे देश के मजदूरों, किसानों और नौजवानों के लिए, जो अपनी मुक्ति के लिए संघर्षरत हैं, नवम्बर क्रान्ति के पाठ का यह पहलू बहुत ही महत्वपूर्ण है। मजदूर लड़ना चाहते हैं, किसान और नौजवान भी लड़ने को तैयार हैं लेकिन वे किसके खिलापफ लड़ना चाहते है? संघर्ष के कलाकौशल को निर्धारित करने का सवाल यानी दोस्त और दुश्मन की पहचान करने का सवाल क्रान्ति के लिए रणनीति तय करने के बुनियादी सवाल से ओतप्रोत रूप में जुड़ा हुआ है। अगर वे मानते है कि देश में क्रान्ति का स्तर जनता की जनवादी क्रान्ति है तब मंचीय व्याख्यानों  से वे कैसे भी नारे क्यों न लगाएं, कितने ही जुझारू संघर्ष वे संचालित करें, यह तय है कि अपनी जनता की जनवादी क्रान्ति की वर्ग समन्वय संबंधी धारणा के मुताबिक ही वे अंदरूनी तौर पर गांवों के धनी किसानों के प्रति लगाव व सहानुभूति रखेंगे और उनके साथ एकता कायम करेंगे। फलस्वरूप, उनके द्वारा चलाए जाने वाले किसान आन्दोलन अनिवार्यतः धनी किसानों के प्रभाव और गिरफ्रत में आ जाएंगे। भारतीय क्रान्ति को जनता की जनवादी क्रान्ति मानने से वे धनी किसानों के साथ किसी न किसी तरह मेलजोल बढ़ाने की ओर अग्रसर होंगे या फिर अटकलें लगाएंगे। लेकिन इससे कोई काम नहीं बनेगा। बल्कि कृषि अर्थव्यवस्था में पूँजीवाद के संरक्षक धनी किसानों के खिलाफ गरीब, खेतिहर किसानों और मजदूरों का वर्ग संघर्ष कमजोर पड़ जाएगा और उनके हितांे की बलि धनी किसानों के कदमों पर चढ़ा दी जाएगी। दूसरी तरपफ जनता की जनवादी क्रान्ति के विचित्रा सिद्धान्त  के आधार पर, कहीं न कहीं प्रगतिशील राष्ंीय बुर्जुआ वर्ग के कल्पित अस्तित्व को स्वीकार कर वे उन्हें समाज के उच्च वर्ग यानी पूँजीवाद के समर्थकों में तलाशने की कोशिश करेंगे और इस तरह पार्टी और उनके नेतागण निरपवाद उनके साथ नजदीकी संबंध स्थापित करने में लग जाएंगे। भले ही बाहर से ऐसा दिखाई न दे, लेकिन होगा यही। उफपरी तौर पर, क्रान्ति के लिए पार्टी कार्यकर्ताओं ने कितनी ही कुर्बानियाँ क्यों न दी हों, लेकिन पार्टी में उनके नेतागण तो वैसा ही करेंगे जो कदाचित बलिदानी आम कार्यकर्ताओं की जानकारी के परे हो।
चूँकि जनता की जनवादी क्रान्ति में बुर्जुआ वर्ग की प्रगतिशील भूमिका को स्वीकारा गया है। इसकी वकालत करने वाले लोग पंूजीपति वर्ग को राजसत्ता से उखाड़ पफेंकने के इच्छुक नहीं हैं। उनका लक्ष्य इजारेदारे पंूजीपतियों को राजसत्ता से उखाड़ पफेंकने का है जिन्हें वे अलग वर्ग कहते हैं। इस विषय पर मैंने पहले भी कई बार कई मौकों पर विस्तार से चर्चा की है और दिखाया है कि इजारेदार पूँजीवाद का शासन दरअसल पूँजीवाद का शासन ही है और इजारेदार बुर्जुआ के प्राधान्य का मायने ही है एक वर्ग के रूप में बुर्जुअ वर्ग का ही प्राधान्य। पूँजीवाद के शासन के बिना इजारेदार पूँजी सत्ता नहीं संभाल सकती।
मार्क्सवाद की कैसी भी जानकारी से इसके सिवा और किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचा जा सकता। और मेरे लिए जो कुछ भी थोड़ा-बहुत माक्र्सवाद मै समझता हूँ किसी और निष्कर्ष पर पहुँचना नामुमकिन है। हो सकता है कि किसी अन्य सिद्धान्तकार के लिए किसी और निष्कर्ष पर पहुँचना नामुमकिन हो, लेकिन मेरे लिए नहीं है। यह मेरी समझ के बाहर है। क्योंकि इजारेदार पूँजीवाद, पूँजीवाद की ही एक निश्चित या खास अवस्था है, एक विकसित अवस्था का परिचायक है । एक बार जब इजारेदार पूँजीवाद को जन्म हो जाता है, तो बुर्जुआ शासन का मायने होता है इजारेदार पूँजी का शासन। ऐसा कहना कि देश में इजारेदार पूँजी का वर्चस्व है और उसी को उखाड़ पंेफकना होगा लेकिन साथ ही साथ राष्ंीय बुर्जुआ को क्रान्ति की मित्रा शक्ति मानने का असली मतलब होगा बुर्जुआ राजसत्ता के अस्तित्व को ही नकारना और क्रान्ति के जरिए राजसत्ता से बुर्जुआ वर्ग को उखाड़ पफेंकने के बुनियादी काम से ही इन्कार करना। हमारे देश में राज्य व्यवस्था पूँजीवादी है किसी भी पहलू से देखिए देश की संरचना पूँजीवादी व्यवस्था पर आधरित है। थोक खाद्यान्न व्यापार के राष्ंीयकरण के नारे लगाए जा रहे हैं। खाद्यान्न के थोक व्यापार को राष्ंीयवृफत करने के लिए सत्तारूढ़ दल कदम उठा रहा है, वे सपफल हों न हों अलग बात है। खाद्यान्न पर लेवी (उगाही) लगाई जा रही है। कृषि उत्पादन को राष्ंीय पूँजीवादी बाजार की पण्य वस्तुओं (कामोडिटीश) में तब्दील किया जा रहा है और इससे सम्बन्धित हर चीज राष्ंीय पूँजीवादी बाजार के कायदे-कानून से संचालित है। कृषि अर्थव्यवस्था पर मुद्रास्पफीति के दबाव को कैसे रोका जाए, इस पर विवाद चल रहा है। इन बातों को मद्देनजर रखते हुए अगर आप देश की परिस्थिति की जांच-पड़ताल करेंगे तो पाएंगे कि हमारी कृषि अर्थव्यवस्था पूरी तरह से पूँजीवादी उत्पादन सम्बन्धों से संचालित है। एक आम आदमी भी समझ सकता है कि एक औद्योगिक श्रमिक, पूँजीवादी उत्पादन संबंध के आधार पर उत्पादन करता है। लेकिन हमारी कृषि अर्थव्यवस्था में भी पूँजीवाद प्रवेश कर गया है यह हम किन चरित्रागत विशेषताओं के आधार पर पहचानेंगे? लेनिन ने इस बारे में एकदम स्पषट मार्गदर्शन किया है। उन्होंने साफ-साफ दिखाया है कि कृषि अर्थव्यवस्था का चरित्रा निर्धारित करने के लिए यह जानना कतई प्रासंगिक नहीं है कि वह पिछड़ी हुई है कि उन्नत या खेतीबाड़ी मशीनों के जरिए की जाती है अथवा वही पुराने दकियानूसी तौर-तरीके इस्तेमाल में लाए जाते हैं। खेती किसानी छोटे-छोटे टुकड़ों मंे बंटी हुई जमीन पर होती है या बड़े पैमाने पर, इससे भी यह तय नहीं किया जा सकता कि कृषि अर्थव्यवस्था का चरित्रा सामंती है अथवा पूँजीवादी। तब कृषि अर्थव्यवस्था का चरित्रा निर्धारित करने का मापदण्ड क्या है? लेनिन कहते हैं कि कृषि उत्पादित माल को लेकर व्यापार-वाणिज्य किस नियम से हो रहा है यही उसका चरित्रा निर्धारित करने का मापक हो सकता है। यानी देहातों में कृषि उत्पादित सामग्री का चरित्रा क्या हो गया है और उस वस्तु का व्यापार-वाणिज्य के साथ संबंध किस किस्म का है। ये तथ्य ही मुख्यतः कृषि अर्थव्यवस्था के चरित्रा को निर्धारित करेंगे कि वह सामंती है, पूँजीवादी है या समाजवादी। हमारी कृषि अर्थव्यवस्था सामंतवादी न होकर पूँजीवादी है, फिर भी यंत्राीकृत नहीं है, यह एक अलग सवाल है। यह सवाल पूँजीवादी बाजार संकट के साथ जुड़ा हुआ है, उन कारणों से जुड़ा हुआ है जो निर्बाध औद्योगिक विकास के रास्ते में बाधक हैं और बेकारी की विकट समस्या से भी उसका सीधा संबंध है जिसके चलते देश गहरे संकट की चपेट में है। इस प्रसंग में, मुझे मालूम है कि लोग अजीबोगरीब तर्क दे रहे हंै। सुना है कुछ लोग ऐसे तर्क  पेश कर रहे हैं कि चूँकि पूँजीपति वर्ग बेकारी की समस्या को बरकरार रखना चाहता है यानी जैसा कि मार्क्सवादी पुरातन साहित्य में वर्णित है पूँजीपति वर्ग इसलिए बेरोजगारों की 'रिजर्व फौज' तैयार रखता है ताकि मजदूरों के साथ बेहतर सौदेबाजी की जा सके। उन्हें हमारा यह तर्क कि भारतीय पूँजीपति वर्ग इस ऐतिहासिक दौर में इसलिए कृषि को यंत्राीकृत करने के पक्ष मे नहीं है क्योंकि इससे देहात में करोड़ों की तादाद में लोग बेकार पैदा हो जाएंगे जिससे राज्य के अस्तित्व को ही खतरा पैदा हो जाएगा-उन्हें वर्ग की प्रशंसा करने जैसा लगता है, मानो वे (पूँजीपति वर्ग) शायद बेकार पैदा करना नहीं चाहते। यह एकदम हास्यास्पद बात है। जो लोग इस ढंग से चीजों को ले रहे हैं और घालमेल कर रहे है मैं उनसे नम्र निवेदन करूँगा कि इतनी गंभीर चर्चा में पड़ने की नादानी न करें तो ही बेहतर है। उनको थोड़ा और जानना-समझना बाकी है।
यह इतना आसान नहीं है। बुर्जुआ वर्ग बेहतर सौदेबाजी के लिए बेकारी की समस्या बनाए रखना चाहता है- पूरी सच्चाई को जानने के लिए केवल इतना ही जानना काफी नहीं होगा। क्या हिटलर ने जर्मनी में, भले ही अस्थायी तौर पर ही सही, अर्थव्यवस्था के सैन्यीकरण के जरिए बेरोजगारी की समस्या को हल नहीं कर लिया था। इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है। खैर, यहाँ वह मेरी चर्चा का विषय नहीं है। यहाँ समस्या ही कुछ और है। यह कहना एक बात है कि पूँजीपति निश्चय ही बेकारी की समस्या को कायम रखना चाहेंगे क्योंकि यह पूँजीवादी अर्थव्यवस्था का आम नियम है। लेकिन यह समझना एकदम अलग बात है कि जब शहरों में ही बेकारी की समस्या ने इतना विकराल रूप धारण कर लिया है कि उसी को संभालने में शासक वर्ग को एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ रहा है, तब यह जानते हुए भी कि देहातों में करोड़ों-करोड़ लोग एक ही झटके में बेकार हो जाएंगे और राज्य पर दबाव और भी ज्यादा बढ़ जाएगा, क्या शासक वर्ग कृषि के आधुनिकीकरण-यंत्राीकरण के लिए कदम उठाएगाμयह एक ऐसा जोखिम भरा काम होगा जिसे उठाने की जहमत वह हरगिज मोल नहीं लेगा। इस डर से वे कृषि का आध्ुनिकीकरण-यंत्राीकरण करने से कतरा रहे हैं और उसके स्थान पर खेती-किसानी के प्राचीन तौर तरीकों और 'हरित क्रान्ति' जैसे नुस्खे-टोटकों को तजवीज कर रहे हैं। वे इतना अधिक डरे हुए हैं कि कृषि-उत्पादन में भारी कमी के बावजूद कृषि के  आधुनिकीकरण और यंत्राीकरण में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं है। क्या इन सब बातों का मतलब यह है कि बुर्जुआ वर्ग बेकारी की समस्या को बनाए नहीं रखना चाहता? या इसके विपरीत, चूँकि बुर्जुआ वर्ग बेकारों की समस्या को जारी रखना चाहता है इसलिए देश में पहले से ही शहरों में मौजूद बेकारी की भयावह समस्या के अलावा देहात में भी, अपनी पहलकदमी से एक ही झटके में करोड़ों और बेकार पैदा करेगा, कल-कारखाने बन्द कर देगा ताकि संकट इतना गहरा हो जाए कि क्रान्ति की प्रक्रिया गति पकड़ ले। मैं वाकई समझ नहीं पाता कि इस ढंग से जो लोग बकवास करते हैं वे गंभीर राजनैतिक चर्चा में हिस्सा ही क्यों लेते हैं। क्या वे इन विषयों पर चर्चा एवं वाद-विवाद करने के काबिल हैं? इस किस्म के 'अकाट्य' मार्क्सवादी तर्क आजकल व्यक्त किए जा रहे हैं सब सुनने में आ रहा है। मैं उनसे अनुरोध करना चाहूँगा कि इस तरह के गहरे ज्ञान की चर्चा वे खूब बघारते रहें और यह साबित करने की कोशिश करते रहे कि हमें मार्क्सवाद की रत्ती भर भी समझ नहीं है, इससे हमारा कोई अहित नहीं होने वाला। हमें जनता पर पूरा भरोसा है। लोगों में सोचने-समझने की शक्ति है। वे स्वयं सोचेंगे-विचारेंगे, निरीक्षण-परीक्षण करेंगे, फैसला लेंगे और अंततः सच्चाई को पकड़ कर रखने में कामयाब हांेगे। लेकिन मैं बार-बार कहूँगा कि ये सब गड़बड़ियाँ इसलिए हो रही हैं कि वे (बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति के समर्थक -सं.) नवम्बर क्रान्ति के सबक को ठीक ठीक पकड़ नहीं पाए।
...... शेष अगले अंक में

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